मेरी कलम से
कुछ पल फुरसत के निकाल लेती हूँ, अपनी भावनाओं को शब्दों में उतार देती हूँ।
फिर उनमें ही कहीं खो जाती हूँ, अपनी कविताओं को नया विस्तार देती हूँ।
गृहिणी हूँ, ये भूल जाती हूँ, अब घर के साथ रचनाओं को भी सँवार देती हूँ।
माँ हूँ, ये भी भूल जाती हूँ, अब बच्चों के साथ अपनी कविताओं को भी प्यार देती हूँ।
मानती हूँ घरवालों को जरूरत है मेरी,पर अब खुद की जरूरतें भी जान लेती हूँ।
कुछ पाठक करते है इंतजार मेरी रचनाओं का, इसका भी ख्याल रख लेती हूँ।
कभी-कभी आईने में देखकर, कुछ पंक्तियां गुनगुना लेती हूँ।
तो कभी-कभी सपनों के मंच पर, कुछ कविताएं बुदबुदा लेती हूँ।
कभी-कभी पंखों में अपनी उड़ान भर देती हूँ, कभी खुद से खुद की पहचान कर लेती हूँ।
विख्यात लेखिका बनने का स्वपन ये मेरा, मैं कभी-कभी खुली आँखों से देख लेती हूँ।
रंजना सोनी
(स्वरचित एवं मौलिक)
Comments
Post a Comment