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Showing posts with the label Snehlata Pandey

विरह की रात

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तेरे विरह की रात अब कटती नहीं मैं क्या करूँ । प्रिय से मिलन की आस लगे जगती रही मैं क्या करूँ। बिंदी लगा कैसे लगूँ कोई न देखे मन व्यथा। सज के ललाट भाई नहीं चुभती रही मैं क्या करूँ। वेणी सजा ली केश में प्रिय के विरह के पुष्प से। अब दंश बन चूसे मुझे घुलती रही मैं क्या करूँ। चूड़ी चुभे कंगन चुभे श्रृंगार भी भाते नहीं। पायल बजे गंभीर स्वर बजती रही मैं क्या करूँ। संगीत की धुन नहि लुभाती, साज भी सजते नहीं। इस पीर में पीड़ा घुसी जलती रही मैं क्या करूँ। अति व्यथित थी देखकर उस दिन तुम्हें जाते हुए। अश्रुधारा नयनकोरों से बहती रही मैं क्या करूँ। बेला विरह की अति भयानक डर बहुत लगता मुझे। सखियाँ कहें कुछ कान में सुनती रही  मैं क्या करूँ। किस्मत  हमारे क्यों नहीं मेरे पिया का प्यार पाना। तकदीर में तड़पन लिखा ये ही सही मैं।क्या करूँ।। स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह' नई दिल्ली पूर्णतः मौलिक एवम स्वरचित

चन्द्रशेखर आज़ाद

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वीर सपूत थे भारत माँ के, नाम चंद्रशेखर आज़ाद। चबवा दिए चने गोरों को, फैलाएं जो सदा  विवाद।। सीना ताने  अकड़  चाल में,कर न सके कोई भी वार। धूल चटा दी अंग्रेजों को, जड़ें हिलाकर फेंके पार।। आजाद बोले नाम अपना, स्वतंत्रता  है बाप नाम। भारत माता का बेटा हूँ, जेल कहा निवास का नाम।। शौर्यपुंज थे शक्ति पुंज तुम, करते नमन  झुका कर माथ। सदियों तक पूजेंगे भ्राता, अर्ध्य चढ़ाएं दोनों हाथ।। वंदे मातरम गरज सुनके ,  दहली अंग्रेजी सरकार। सहमे शातिर धूर्त फिरंगी, जो थे बहुत बड़े मक्कार।। दिए प्राण आजादी खातिर, आये नहीं फिरंगी हाथ।। अंतिम गोली मारी खुद को, छोड़ गए हम सबका साथ।। क्रांति वीर हे लाल धीर , गए मात का कर्ज उतार। माँ भारती हो गई आहत,अल्फ्रेड बहा खून की धार। बिना बताए किरिया कर दी, आ गया जनता में उबाल। निकल पड़े घर से सब बाहर, आँखन आँसू रहे निकाल।। माटी खन के घर को ले गए,और लगाया अपने भाल। वह भूमि अति पावन हो गई, सोया जहाँ देश का  लाल।। याद करेंगे श्रद्धा  पूर्वक, प्यारे प्रखर  वीर आजाद।  सभी शोक में डूबे तेरे, तुमपर सदा देश को नाज।। शौर्यपुंज ...

दस्तान ए दर्द

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सुनाने जाएं किसे उस  दर्द की दास्तां। जो मेरे अज़ीज़ ने यूँ ही दे दिया। अल्फ़ाज़ उसके यूँ असर कर गए दिल पर। जैसे किसी ने हजारों सुई चुभो दिया। पी गए दर्द को कड़वी दवाई की तरह। लिख दिया अशआर और रुबाई की तरह। झेलते हुए उसे खुद में सिमट से गये। मिल गए अक्स में रोशनाई की तरह। बेरुखी उनकी यूँ सताती रही। वक्त वेवक्त खंजर चलाती रही। कभी हल्के कभी गहरे ज़ख्म होते रहे। जर्बों  के तोहफ़े जब तब बदलते रहे। उनके हर छोटे बड़े कदमों पर , फूलों को बिछाया राहों को सजाया मैंने। उनकी जरूरत जब जियादा लगी, अश्कों के साये में खुद को पाया मैंने। ज़र्ब- घाव अक्स-चित्र स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'

अभिव्यक्ति की उड़ान प्रथम वर्षगाँठ

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वर्षगाँठ मनाय रहा, समूह उड़ान आज। उत्सव का माहौल है, मन सबके उल्लास।। मन सबके उल्लास, खूब सज धज कर आये। निज आसन गए बैठ,मुदित मन हो बतियाये।। कहती स्नेह विचार, देख लो इनके ठाठ। गाएँ खुशी के गीत, सदा आये वर्षगाँठ।। स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'

चमकेले टिकुली तोहार गोरिया रे

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 लगावेलु टिकुली  कमाल गोरिया रे। चमकेले  टिकुली  तोहार गोरिया रे। दूनों भौहँन के बीचे में बिंदी लाल-लाल। चमकेला तोहर जगमग सगरो लिलार। बढ़ जाला तिरिया  के  श्रृंगार गोरिया रे। चमके लाल-लाल टिकुली तोहार गोरिया रे। गोरखपुरवा से हमसे से टिकुली मंगवलू। सज-संवर के सुन्नर  टिकुली लगवलू। अंखियन में भर लेहलू खुमार गोरिया रे। चमके लाल-लाल टिकुली तोहार गोरिया रे। साड़ी पहिन ले लू जब भागलपुर वाली। अँगिया के उपरा ले लू  पल्लू के डारी। कजरा लगा ले लू  मरकार गोरिया रे। चमके लाल-लाल टिकुली तोहार गोरिया रे। ओंठवा पर लगाई के लाल लाल लाली। कनवा में पहिन के सोनवा के बाली। रूपवा निहार के लजालू गोरिया रे। चमके लाल-लाल टिकुली तोहार गोरिया रे। लाल -लाल कँगना खन खनकावेलू। बजनी पायलिया छन छनकावेलू। चलेलू मटक के ई दिल निकार गोरिया  रे। चमके लाल-लाल टिकुली तोहार गोरिया रे। नागिन नीयर लट आपन जब लहरावेलू। कारी बदरिया के खूब लजवावेलू। अँखियाँ के बढ़ेला पियास गोरिया रे। चमके लाल-लाल टिकुली तोहार गोरिया रे। तिरछी नज़रिया से जब मुसकइलू। जियरा पर हमरे छूरी चलईलू। बोले...

प्रखर व्यक्तित्व-स्वामी विवेकानंद12 जनवरी - युवा शक्ति दिवस

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शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में जिस महापुरुष ने सभा को "मेरे अमरीकी भाइयों और बहनों " शब्दों से संबोधित किया तो वातावरण तालियों की गड़गड़ाहट से गुंजायमान हो उठा।उनकी ओजपूर्ण वाणी से सभी देशों से आये धर्म प्रतिनिधि प्रभावित हुए बिना न रह सके। इस भाषण से भारत को एक नई पहचान मिली। आपलोग अबतक समझ चुके होंगे कि मैं किसकी चर्चा करने जा रही हूँ। जी हाँ! इस महान महापुरुष का नाम स्वामी विवेकानंद था।  जिन भारतीयों  को विदेशों में हेय दृष्टि से देखा जाता था। जिनके तहज़ीब और तमीज़ की निंदा की जाती थी। स्वामी विवेकानंद के विचारों को सुनने के बाद लोगों की धारणा बदल चुकी थी। आज के दिन ये महापुरुष भारत मे अवतरित हुए थे।  इनका जन्म 12 जनवरी सन 1863 कोलकाता में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। इनके पिता विश्वनाथ दत्त एक वकील थे। माता पिता ने इनका नाम नरेंद्र नाथ रखा। इनके आध्यात्मिक गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस जी ने इन्हें विवेकानंद नाम दिया था। ये अति कुशाग्र बुद्धि के एवम चपल थे।माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं जिनका पूर्णतया प्रभाव बालक नरेंद्र पर पड़ा। घर में सदा ही धार्म...

सिंधु ताई - ममतामयी माँ

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अनपेक्षित संतान मानकर, नाम रख दिया था चिन्धी। किसी तरह से शिक्षा पाई, चतुर्थ कक्षा तक  सिंधु। इच्छा क्या है एक बेटी की, कौन पूछता है कब उससे। किसी भी खूंटे से बाँध दिया, बकरी, गाय भी भले इससे। सुकुमारी  अल्हड़ बाला को, अधेड़ पुरूष से ब्याह दिया। सगे जनक और जननी ने, कैसा ये घोर अन्याय किया। लड़ने चली गाँव के हित में, सिंधुताई गाँव के मुखिया से। मुखिया ने पति को भड़काया, पति ने विमुख किया घर से। आस लिए गई माँ के पास, हर लेगी जननी दुख सारा। पर हाय दैव की लीला देखो, सगी जननी ने ही दुत्कारा। थी गर्भवती उस समय ताई, प्रसव काल अति निकट था। आश्रय लिया एक तबेले में, बेटी को दिया जहाँ जन्म था। इससे बड़ी विडंबना क्या होगी। एक विवश माँ के जीवन की, पत्थर मार मार कर अलग किया। नाल को नाभि से बेटी की। भीख माँगती थी वो दिनभर, श्मशान में रात बिताती थी। सोचा करती थी कितनी बातें। कुछ यादें उसे सताती थीं। बेटी को ट्रस्ट को सौंप दिया। बनी हज़ारों अनाथों की माँ जो खुद ही एक बेसहारा थी, बनी  सहारा देने वाली माँ। ऐसा एक परिवार बनाया कर्मठ देवी सिंधु ताई ने, जाति ,धर्म के भेद से परे रिश्ते महकाये...

नव वर्ष मंगलमय हो

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हर सुबह स्वर्ण सी चमक उठे , हर दोपहरी मोती बनकर। हर शाम मधुर यादों की हो, हर रात कटे चंदन शीतल। दिन श्वेत हो रजतपर्ण सा, हीरक सम जगमग हो यामिनी। मौसम हेमंत और वसन्त रहे, खुशियों की छाये दामिनी। आँखो में सतरंगी सपने हों, मन में उल्लास की कली खिले। बिछी सेज हो कोमल फूलों की, जीवन में उन्नति की फली मिले। कुछ नए हाथ हों नए साथ हों, सबका बेमिशाल कारवां बने। नीड़ में अपने अविरल खेलें, नवजात किलकारी की समां बंधे। नव रत्नों से दीप्त रहें, नवज्योति जले नवजीवन में । नवल पुष्प से महक उठें, नव वर्ष के नव आँगन में। स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'

अलविदा सन दो हजार इक्कीस

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सन इक्कीस जी आज, तुम्हें विदा हम करते हैं। अलविदा इक्कीस जी आज, तुम्हें विदा हम करते हैं। अब तुम न आओगे पास, तुम्हें विदा हम करते हैं। जब तुम आये पहली बार, स्वागत किया हमने अपार। नाचे गाये खुशी मनाएं, केक मिठाई खाये खिलाएं। लेकर मन में नई आस, तेरा स्वागत हम करते हैं। उम्मीद बंधी थी आओगे तुम, जग में कुछ खुश हाली लेकर। पर पड़े तुम सन बीस से भारी, जा रहे हो बहुत पीड़ा देकर। कितने दुख पाए सबने, जिसे हम अबतक सहते हैं। करते रहे काम तुम अपना, जरा दया न दिखलाई। क्रूर काल कितनों को खाया, तुमको दया नहीं आई। खड़े विवश से देख रहे सब, गिला तुमसे हम करते हैं। कितनों के संजोए सपने, पल में तुमने चूर किया। रोजी रोटी के लाले पड़ गए, भूखों मरने पर मजबूर किया। मिली थोड़ी सी राहत थी पर, अब ओमीक्रोन से डरते हैं। जाओ तुम्हें विदा करते हैं, तेरी इसमें गलती भी क्या। सहना पड़ता है सबको जितना विधि ने लिखा हुआ। लेकर जाओ अच्छी यादें दुआ हम दिल से करते हैं। सन बाइस से कह देना, खुश होकर वह आएगा। बाँटेगा ख़ुशियाँ सभी को, सबको सुखी बनाएगा। जी भर उसके साथ जियेंगे, वादा हम तुमसे करते हैं। स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह...

चाय की चाह

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बहुत चाह है चाय की, कोई पिला दे आज। पूस  कड़कती  ठंड  में, जाये मिल अब राज।। सुबह सुबह की ठंड में, हाथ कड़कती चाय। जो सुख मिले शरीर को, गाथा कही न जाय।। लगे चाय मेरी प्रिया, मिल लूँ  कितनी बार। मिलता मन को चैन नहि, करता अतिशय प्यार। सज कर आती सामने, सुगंध तुलसी  वास। वश में कब  यह मन रहे, आलस होता नाश। तीखे नज़रें  ले बना, अदरक सखि के साथ। गले को मिले सुख बहुत, दर्द होत नहि माथ।। घूँट घूँट कर मैं करूँ,  रूप मधुर रस पान। उस सुख की क्या बात हो, कैसे करूँ बखान।। घर जब आये प्रिय सखा, दूँ उससे मिलवाय। देखें आतुर नैन वे  , जब तक न गले जाय।। गर्मी  में  पीते  बहुत, शीतल   ठंडी  चाय। बर्फ डाल पीते इसे, मन को अति है भाय। मौसम हो बरसात का, रिमझिम पड़ती वारि। आनंद लेते चाय  का,नर  हो  या  हो   नारि।। जानी जाती  नाम से, लिए  बहुत है रूप। कड़क, श्वेत या श्याम सी, देती मीठी धूप।। कोई सभा या मंच हो, होती इसकी पूछ। दर्शन   देत न सुंदरी, लगती संगत छूछ। मोटे लोगों की सखी, रखती इ...

प्रोफेसर नीना गुप्ता

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कठिन परिश्रम रंग ले आती इसका है कोई तोड़ नहीं। प्रो.नीना गुप्ता जी ने कर दिखाया, परिश्रम व्यर्थ कभी जाता नहीं।। रामानुजम पुरस्कार को पाकर, देश का नाम बढ़ाया है। युवा गणितज्ञ ने इस विधा में, अभूतपूर्व पहचान बनाया है।। कलकत्ता में पली - बढ़ीं जन्म को अपने सार्थक किया। कर्मभूमि भी यहीं बनाया, सतत कर्म अविराम किया।। शिक्षा पूरी कर गृह नगर में, शोधकार्य का लक्ष्य चुना। कार्यरत वे अभी यहीं पर, गणित शोध का विषय चुना।। अलजेब्रिक जियोमेट्रो और  कम्यूटेटिव अल्जेब्रा में, किया शानदार कार्य नीना ने। मेहनत से कभी पीछे हटी नहीं, पाया उसका प्रतिफल नीना ने।। शांतिस्वरूप भटनागर और यंग साइंटिस्ट पुरस्कार, उन्हें मिल चुका इससे पहले। प्रो.नीना गुप्ता छा गई नभ पर प्रसिद्धि के पूरे जग के।। प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, देश की इन ललनाओं में। ज़रूरत है खुला आसमान मिले, उन्मुक्त हो जाएँ वे वर्जनाओं से।। स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'

बोझ ढोता बचपन

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बस्ते  का बोझा सहे, सुंदर  कोमल गात। बचपन ये मुरझा रहा, चिंतित होती मात। चिंतित होती मात, बहुत उपाय वे करतीं। लाल स्वस्थ हो जाय, प्रार्थना प्रभु से करतीं। बोझा कम हो शीघ्र , रहें बच्चे सब   हँसते। माँ भी  खुशी मनाय, जाय  हो हल्के बस्ते। स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'

देश के सैनिक

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जीवन करते नाम देश के, जिन्हें देख अरि थर्राते हैं। भारत माता के सैनिक वीर, देश हित निज सर्वस्व लुटाते हैं। नहीं देखते माँ की ममता, माँ भारती की ममता दिखती। नहीं देखते पत्नी का दिल, सीमा उनकी राह देखती। नहीं देखते मौन पिता का, जब हाहाकार मचा हो युद्ध भूमि में। नहीं लुभाती तोतली भाषा शिशु की, जब देश का अभिमान कराह रहा हो। त्योहार मनाने की लालसा नहीं, उन्हें रक्त से तिलक लगाना है। संधान शत्रु का करना है। विजय शौर्य का जश्न मनाना है। सैनिक होने का फ़र्ज़ सदा, भली भाँति निभाते हैं। सोते हैं हम यहाँ चैन से, वे सीमा पर डट रात बिताते हैं। तापमान का भान नहीं, ठंडी रातों में भी कर्तव्य निभाते हैं। वर्दी में सज जाते दुश्मन से लड़ने, ज़बाज़ी ग़ज़ब की दिखाते हैं। धूल चटा देते हैं अरि को, विजय का परचम फहराते हैं। रण में पीठ कभी न दिखलाते, जान की बाजी लगाते हैं। हँसते हँसते कुर्बानी देते, तिरंगे में लिपटे वापस आते हैं। नमन करते हम उन्हें, श्री चरणों में शीश झुकाते हैं। इतनी सारी खूबियों से विभूषित, सैनिक भारत के कहलाते हैं। स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'

सपनों का घर

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था वह मेरे सपनों का घर, मेरे चहेते अपनों का घर। वहाँ नहीं लगता था डर, होती सबसे चटर पटर। कितने सपने थे पलते, उन्मुक्त गगन सी बातें थीं। उछल कूद के दिन थे प्यारे, सपनीली मधुरिम रातें थीं। कूलर ए. सी नही वहाँ पर, नींद गहरी बहुत आती थी। डनलप के गद्दे की सेज नहीं, पतली दरी बहुत सुहाती थी। जाने कितने सारे सपने, ये छोटी आँखे देखा करतीं, कभी खेलती कभी कूदती। कभी परीलोक विचरा करतीं। कभी देखतीं ये आँखे डॉक्टर बनने का सपना। कभी भूत से डरकर, सोते से उठकर जगना। बाबूजी जाते ऑफिस जब, एक चवन्नी वो दे कर जाते। लॉलीपॉप,लेमन जूस लेकर बड़े चाव से थे हमसब खाते। नहीं किसी  से डर वहाँ पर, दादीगिरी थी चलती अपनी। कोईं न मन का काम हुआ तो, आँखों से लगती गंगा  बहनी। आता है याद बहुत अब भी, वह मेरा   सपनों  का घर। सुंदर से रिश्ते थे जहाँ पर, माँ-बाबा जैसे फरिश्तों का घर। स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'

यादों की बारात ले चली

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बाबुल इस घर स यादों की बारात ले चली। आँखो  में  सजाकर  सपने  हज़ार  ले  चली। यादों इस घर की रखूँगी संजो दिल में। आएँगी याद अक्सर ये मुझे तन्हाइयों में। जी लूँगी इनके साथ यहाँ बिता पल जो चली। बाबुल इस घर से यादों की बारात ले चली। गुड़िया की शादी कर सीख देती थी बहुत। ससुराल में   रहेगी कैसे सिखाती   बहुत। सीखों को आज मन में  अपने उतार चली। बाबुल इस घर से यादों की बारात ले चली। चली पिया के देश  संस्कार लिए साथ में। साथ बिताए  क्षण आपलोगो के साथ में। माँ की सभी सीखों को बाँध गाँठ ले चली। बाबुल इस घर से यादों की बारात ले चली। आँखो  में  तेरे आँसू  क्यूँ  बहते    बाबुल। आती रहूँगी मिलने दुखी मत करो ये दिल। होती  बेटियाँ   पराई  समझा के ये  चली। बाबुल इस घर से यादों की बारात ले चली। पड़ता  है सभी को जगत  के रसम निभाना। चाहती  नहीं मैं   आप   सब  से   दूर जाना। मुश्किल की  घड़ी ये  रखकर धीरज मैं  चली। बाबुल इ...

आँखें

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प्रेम रस से भरी आँखें, मधुपूरित स्वप्निल आँखे मानों इनमें भर दिया हो, नेह का काजल कोई। अलसित से मुंदे मृग नयन, मुखरित होती बाँकी चितवन। मानों इंद्रधनुषी प्रत्यंचा ने, छोड़ दिया हो  तीर कोई। रसभरे नयन मदिरा पूरित, खुमारी से होते  झंकृत। मानो थिरक उठा होठों पर,  चपल मधुर संगीत कोई। मुस्काती रतनारी आंखें, मौन में भी मुखरित बातें। मानों यूँ हीं विहँस रहा हो। आते जाते  मीत कोई। देख इनकी बाँकी अदा, हो गया दिल यूँ फ़िदा। मानों प्रियतमा से मिलने आया हो प्रेमी अधीर कोई। लाज हया से नीची ऑंखे, प्रेम आमंत्रण को स्वीकारें मानों तिरछी चितवन ले, , खिल गई हो कली कोई। , स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'

संकल्प

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तिमिर व्याप्त सर्वत्र, उद्दिग्न अति हृदय। दिखता नहीं है पथ, पथिक है हतप्रभ। बढ़ाए कदम किधर, मन में है दुविधा। सफल या असफल, लगी है यह चिंता। झंझावात का है शोर, आंधियाँ चहुँओर। तरंगे उद्वेलित हो रही, डगमगाए नाव की छोर। प्रेम पथ अति विकट, प्रिय से मिलन दुर्लभ। प्रेयसी विरह में रत, नयन ताके एकटक। नहीं मिला है कभी , कुछ अधीर होने से। पाने की सोचो सदा। पहले कुछ खोने से। मिल जाये कहीं से, आस  की एक रश्मि। पकड़ लो उसे कसकर, न हो जाना तुम भ्रमित। नवीन संकल्प के साथ, नैनों में भर लो आस। हृदय प्रदीप्त कर लो, नए विश्वास के साथ। तिमिर का जाल काट दो, आंधियों का रुख मोड़ दो। तरंगों को जड़वत कर दो, प्रेम को पल्लवित कर दो। संकल्प से ही होता है। आंधियों का सामना। कायरों के लिए कभी, कोई मार्ग नहीं बना। उत्साही जीत लेता है। जंग बड़े और मुश्किल, संकल्प दीप  प्रज्ज्वलित तो, क्या कर लेगा गहन तिमिर। सुदृढ कर लोगे संकल्प, हृदय के हर कोने में, कोई रोक सकता नहीं, तुम्हें कामयाब होने से। सत्य पथ को चुनकर, असत्य को ठुकराकर। नैतिक मूल्यों को गहकर, हो विजय पथ पर अग्रसर। स्नेहलता पाण्डेय "स्नेह"✍️✍️ नई द...

प्यार एक अहसास

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प्यार  इक अहसास है,ये कोई तीन हर्फ नहीं, है ये इक जज़्बात जो लफ्जों में हो  बयां नहीं। दिल में अगर प्यार है, निगाहों  से बयां कर दो, वो ग़र शर्मा जाते हैं, तुम ही कुछ पहल कर दो। प्यार मिल जाने पर इस,  दिल को धड़कने दो, दिल अगर बेताब हो, इस बेताबी। को बढ़ने दो। प्यार सौन्दर्य है उसे,किसी आईने की ज़रूरत नहीं, दिल किसी श्यामा  पे फ़िदा है, श्वेता भायेगी नही। प्यार की तारीफ़ क्या,वो इक चेहरे पर फ़िदा होता है, महब़ूब की नश़ीली आंखों के, नश़े पे  कुर्बां  होता है। अहसास ए प्यार को हमेशा, दिल मे जवां रखो। वे अगर कुम्हलाने लगे तो, उन्हें स्नेह से तर रखो। इक़रारे इश्क होने पर, उसे शिद्दत से निभाना सीखो, प्यार में ज़ी तो सभी लेते हैं,हद से गुज़र जाना सीखो। स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'

प्रथम मिलन

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प्रथम मिलन की स्मृति, ह्रदय प्रफुल्लित कर देती है । मन मंदिर में आज भी वह छवि हर्षित कर देती है। तव  रूप निरख कर प्रथम बार, हृदय को आभास हुआ। जन्मों  से हम साथी थे, अब  पुनः प्रेम मिलाप हुआ।     सौंदर्य की देवी आ रही,करने को प्रिय से अभिसार।  कामनीय अप्रतिम सौंदर्य ,मैं रहा विमुग्ध रूप निहार। मन वीणा में हुआ झंकार,देखा जब तुमको प्रथम बार। तुम्हें देखता ही रह जाऊं , जी में आया  था बार-बार।  देख मुझे तुम शरमाई थी, कुछ सकुचाई ,घबराई थी। अति हर्षित हो संध्या ने निज ,लाली  तब बरसाई थी। बात कुछ आगे बढ़ी तो ,तुम थोड़ी सहज हों गई थी।। मुझे यूं प्रतीत हुआ ,ज्यों जूही की कली  झूम गई थी। मृदुल मुस्कान  देख तेरा, मन  विवश अति हो चला था। टेसू पुष्प समअधरों से,जब प्रिय शब्द उच्चरित हुआ था। घनी केशों काली भौहों ने,  इस  मन को भरमाया था। स्वप्निल अलसाई पलकों में ,सौंदर्य छंद बन छाया था। सागर जल की गहराई में,जब प्रतिबिंब तेरा निहारा था। मन जोरो से धड़का था, अस्फुट स्वर में तुम्हें पुकारा था। तेरे कोमल हाथों को,जब मेरे हाथ...

माँ की ममता

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वात्सल्य का अनुपम उदाहरण है जगत में माँ। सोए हुए शिशु को अति प्रेम से चूमती है माँ। सो रहा आँचल में लिपट निरखती है वह उसे। गा रही लोरी हो विह्वल कुछ और न सोचती माँ। सपने लिए कुछ आँखों में उन्हीं का वह गान करती। संतति के पूर्ण अस्तित्व को अपनी आंखों में समेटती। प्रेम,ममता  वात्सल्य  हिलोरें उठ रहीं है हृदय में। निश्चिंत हो सो रही संतति, माँ के आँचल  को पकड़ती। मैला हो जाएगा आँचल इसकी उसे चिंता नहीं। बच्चे सोए सुख की नींद इससे बढ़कर कुछ नहीं। सोचती है कि क्या करूँ जिससे सुखी संतान हो। सारी विपदा मुझ पर आएं किन्तु संतान पर  नहीं। माँ की ममता की तुलना कोई शक्ति कर सकती नहीं। गाथा लिखें तो थके लेखनी,स्याही पूरी पड़ सकती नहीं। बुढ़ापे में करना सम्मान उनका जब वो थक चुकी हों। उनके आशीर्वाद से बढ़ जन्नत की भी कोई नेमत नहीं। स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'