आँखें

प्रेम रस से भरी आँखें,
मधुपूरित स्वप्निल आँखे
मानों इनमें भर दिया हो,
नेह का काजल कोई।

अलसित से मुंदे मृग नयन,
मुखरित होती बाँकी चितवन।
मानों इंद्रधनुषी प्रत्यंचा ने,
छोड़ दिया हो  तीर कोई।

रसभरे नयन मदिरा पूरित,
खुमारी से होते  झंकृत।
मानो थिरक उठा होठों पर,
 चपल मधुर संगीत कोई।

मुस्काती रतनारी आंखें,
मौन में भी मुखरित बातें।
मानों यूँ हीं विहँस रहा हो।
आते जाते  मीत कोई।

देख इनकी बाँकी अदा,
हो गया दिल यूँ फ़िदा।
मानों प्रियतमा से मिलने
आया हो प्रेमी अधीर कोई।

लाज हया से नीची ऑंखे,
प्रेम आमंत्रण को स्वीकारें
मानों तिरछी चितवन ले, ,
खिल गई हो कली कोई।
,
स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'

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