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Showing posts with the label निगम झा

लौट चलो अभी भी

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गुबार उठ चला, चराग़ बुझ चला गरजी तोपें तो आसमान हुआ पहले लाल,  फिर काला,  फिर जाने किस- किसका वजूद मिट चला,  झुलसे, जले, हुए कोयले इंसान इंसानों की खातिर,  जरूरत ही थी क्या जो, स्वयं के अहं में हुए हम,  इतने क्रूर और शातिर,  तेरी- मेरी जिद्द के पाटों बिच,पिस रहे सब, बाल-वृद्ध, नर और नारी रण दावानल विकराल, बन काल बढ़ रहा  जला रहा दुनियाँ सारीl कल इन्हीं कोयलों की राख पर  कर अट्टाहास् जीत का जश्न मनायेगा कोई,  कोई  टेक घुटने चरणों में उसके नतमस्तक हो जायेगा ,  पर इस दृश्य में पराजित होगी केवल मानवता इतिहास के पृष्ठों में युगों- युगों तक यही अमानवीय कृत्य जगह पायेगा l गर लौट सको तो लौट चलो अभी भी,  उन्मुक्त, मधुर विश्व शांति के गीत हम गाएंगे,  टैंकों से दबी- कुचली,जली धरा पर फिर से , जीवनदायिनी फ़सलें उगायेंगेl   -निगम झा  सशस्त्र सीमा बल  सिलीगुड़ी

दास्तान ए बेरोजगारी

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सुनो जरा, वह कह रहा है.....  खर्च जोड़ने,बीमार माँ,उपचार भी नहीं लेती,  तब कहीं जा बेटा उसका पढ़ रहा है  सुनो जरा, वह कह रहा है .......l   छोटी सी दम घोंटू कोठरी,  श्वसन हेतु भी असक्षम सी,  अंधकार में जलते,झिलमिलाते,  नन्हें जुगनूं सी रौशनी में भी,  रट पुस्तकें रोजगार समर में बिन रुके, थके, डट रहा हैl   सुनो जरा , वह कह रहा है....... अर्थाभाव से बना बेटिकट,  रैन कटे बिछा चादर प्लेटफॉर्मों पर,  भूक प्यास से आकुल- व्याकुल,  अनगनित परिक्षाएं दे -देकर संपूर्ण भारत भ्रमण कर रहा हैl  सुनो जरा, वह कह रहा है....... है भरोसा उसपर कितनों का,  कितनों का विश्वास लिए,  करने अपने, अपनों के पूरे सपने,  अभाव, असफलता, अथक परिश्रम की अग्नि में स्वर्ण दीप्ति लिए तप रहा है l सुनो जरा, वह कह रहा है..... पेपर लीक, भर्ती स्कैम् की ठोकर खाकर भी,  धीर ,वीर, गंभीर खड़ा,  एक दिन तो  बन हीरे सा ,  जा सकता है कहीं भी जड़ा,  नये अवसर की तैयारी में अध्ययन के नये तरीके गढ़ रहा हैl सुनो जरा, वह कह रहा ह...

का बा एक पत्र

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आदरणीय लोक गायिका जी,           आपने जब कभी"का बा" गाया, अनायास ही मुझे वर्षा कालीन असंख्य पीले टर्राते हुए उन मेंढकों का स्मरण हो आया जो सुना है मादा मेंढ़की को रिझाने,लुभाने अपना रंग रूप बदलते फिरते हैं l          तर्कसंगत तथ्यों, पंक्तियों के लिए सराहना करती हूँ परंतु इन्हें गाने और बनाने के पीछे जो भी आपने तर्क दिए उन से पूर्णतः असहमत हूं, यूं मानिए बिल्कुल असंगत से लगते है l        इन गीतों में जिन घटनाओं का जिक्र है,वह जब घटित हो रही थी तब काश ! आपने इससे संबंधित एक भी गीत गाया होता तो शायद परिस्थितियां कुछ अलग सी,  कुछ संतोषप्रद सी होती जब आपके गीतों से लोग जागृत हो लोग एकजुट हो जाते, पीड़ित  मरहम और न्याय दोनों समय पर पाते और तब हुक्मरानों के कानों पर जूं नहीं बिच्छु रेंगता "बिच्छु"l       पर  अफसोस कि तब यह आपके लिए यह जन चेतना का विषय नहीं था, इनसे पीड़ितों की पीड़ा की तड़प आपको झकझोरना तो दूर , छू कर भी न जा सकी और तब आप सिर्फ ननद-भोजाई और देवरा- पियवा के गीत गाने में इस क...

बधाई नव वर्ष की

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हर पल मीठा हो जीवन में इतना,  खीर जैसे गन्ने के रस की,  बधाई नव वर्ष की लहलहाये सदा मुस्कान की खेती,  बातों में हो खुशबु सी खस की,   बधाई आनंद वर्ष की दरवाजे सफलता के खुले हो सदा, फैले धूप सी किरणें यश की,  बधाई उन्नति वर्ष की,   छाँव में स्नेह ममता की, हो उम्र हजारों बरस की,  बधाई आरोग्य वर्ष की - निगम झा सशस्त्र सीमा बल सिलीगुड़ी

सह- अस्तित्व

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सुंदर सुसज्जित प्रकृति सा आंगन, नन्ही संध्या - दीप मैं  नेह बिन बुझती सी बाती, कैसे कुछ रचना रचे?  है असीमित गगन आगे,पृष्ठ केबल क्षितिज कोर  पथ मध्य, पथिक थके हैं, दिखे ना पथ का कोई छोर विकल प्यासा, जल की आशा, मिले केवल ओस भोर  तीव्र हो चली गति जीवन की, अनुभव रहे अधूरे से   रोज मिलते अनजान चेहरे, है भले हम उम्र से   मगन - मस्त सब व्यस्त खुद में, यहाँ कौन किसकी सुने?   ज्योति  ज्यों- ज्यों बढ़ती जाए , तम भी उतना ही घिरे शूल हो सब फूल ऐंठे, राई बन पर्वत अड़े श्रम,विवेक, सुकाम बिन क्या सीप मोती से मिले?   ढूँढूँ स्नेह सदैव सबमें, हर बार जाऊँ हार मैं   बढ़े पग  अवलंब हेतु, घिरते मगन मझधार में  रहूँ जहाँ कहीं, सदा सत्य यही, है सह- अस्तित्व संघर्ष और  मध्य मेरेl निगम झा स. उप निरीक्षक, स. सी. बल सिलीगुड़ी

अवतार लो

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  घिर चला यूँ घोर तम,  डूबा सा विश्व अधमतम  हे ज्योतिर्मय ,लो अवतार पुनः हो प्रकाश- पुंज l है  पथ भ्रमित मानव ,  पथ न सूझे न पथ- कर्म  हे पार्थ सारथी, प्रकट हो फिर दो गीता सा ज्ञानl अमानवीयता मानो कालिया नाग सी, भू जलधि पर तांडव में लगी, हे जगदीश्वर, ला मानवता करो इसका मर्दनl चहुँओर बिछी है चौसर, अस्मिता है लगी दाँव पर हे दयानिधि,आर्द्र विनय सुन रखलो लाज आज फिर नारी कीl    घट भर छलके पाप की,  माखनचोर आ फोड़ो मटकी हे चक्रधर, करो संहार एक बार फिर गहि चक्र सुदर्शनl  मधुर प्रेम की तान सुना दो,  मैं को मेरे चित्त से मिटा दो हे मुरलीधर,सत् चित आनंद रत करो जन- गण- मन कोl निगम झा स. उप निरीक्षक, स. सी. बल सिलीगुड़ी

राष्ट्रीय पशु बाघ: दियर सर्वाइवल इन अवर हैंड

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        सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया.........की अवधारणा युगो-युगो से भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग रही है। उस संस्कृति का जिसमें  सह अस्तित्व का भाव न केवल इंसानों अपितु सभी जीवो के लिए भी है,विशेषकर वन्यजीवों के लिएl जिनके साथ रहने की क्षमता यहाँ लोगों के हृदय में गहरी पैठ बनाए हुए हैं l            परंतु "जियो और जीने दो" के सिद्धांत वाले इस देश से 20 वीं सदी के मध्य तक आते- आते हैं एशियाई नस्ल के चीते और शेर दोनों ही लुप्त प्राय हो गए थे और अब बारी थी बाघों कीl यह वह दौर था जब रैशेल् कार्सन  सभी वन्य जीवो के संरक्षण हेतु यूरोप में अभियान चला रही थी जिसने कहीं न कहीं तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी काफी प्रभावित किया, फलस्वरुप वर्ष 1971 में उन्होंने सिर्फ बाघों के शिकार पर ही पाबंदी लगाई बल्कि वन्य जीव संरक्षण कानूनों को भी शक्ति प्रदान कीl टाइगर रिजर्व( जिनकी संख्या प्रारंभ में 9 थी पर अब 50 तक हो चुकी है)और टाइगर टास्क फोर्स का गठन उनकी इसी मुहिम का  हिस्सा थे।       ...

जीवन वीणा

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मिलता नहीं निर्मित करना होता है जीवन,  जो मिलता है वो जीवन नहीं केवल जन्म है,   तरतीब से छूने होते है संगीत के सब तार,  बस यही जीवन की वीणा का मर्म हैl सही वादन न सीख पाये अभी, तभी तो इतनी उदासी,पीड़ा और दुःख घनेरा है,  घृणा, हिंसा, वैमनस्य, शत्रुता से,  जग में इतना अंधेरा हैl हो चला विसंगीत जो होना था संगीतमय,  पर रँग रोगन ही सीखा वीणा का और कुछ फूल , कुछ हीरे- जवाहरात जड़ दिये,  हीरे -मोतियों से कभी बजती नहीं वीणा,  बिना यह ध्यान एक पल भी कियेl सजी हुई अलंकृत वीणा प्यास,अहंकार देती है,  देती है महत्वाकांक्षायें,  और पड़ी रह जाती है बिन छेड़े तब यह ,  जब प्रारंभ होती है प्रथम आने की अंध प्रतियोगिताएंl तभी जीसस ने कहा धन्य है वो जो अंतिम पँक्ति में समर्थ है खड़े होने में,  क्योंकि अंत में खड़े होने के अर्थ बड़े होते है,  बजाते है बड़ी तल्लीनता और तत्परता से सुमधुर,  सुंदर जीवन वीणा, जो औरो को पछाड़ते नहीं, सँवारने व उबारने के हेतू ही जीवन जीते है l -निगम झा  स. उप- निरीक्षक स. सी. बल सिलीगुड़ी

भारत की बेटी:मीराबाई चानू

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"हौसले के तरकस में कोशिश का वो तीर जिन्दा रखो, हार जाओ चाहे जिन्दगी में सब कुछ लेकिन फिर से जीतने की उम्मीद जिन्दा रखो."              हां, कुछ यही पंक्तियां मेरे जहन में उस वक़्त आयी जब भारतीय वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने टोक्यो ओलंपिक में अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए भारत को और खुद को पहला रजत पदक दिलाया और इसके साथ ही वह वेटलिफ्टिंग में रजत पदक लाने वाली पहली भारतीय एथलीट बनीl यह पदक चानू ने 49 किलोग्राम भार वर्ग में जीता है जिसके लिए उन्होंने इस प्रतियोगिता में 202 किलोग्राम वजन उठाकर चीन की होऊ जहुई के बाद अपना स्थान निश्चित कियाl         आज हम सभी जिस मीराबाई चानू की प्रशंसा करते नहीं थकते, उस मीरा की 2016 रियो ओलंपिक में बेहद खराब प्रदर्शन से टोक्यो ओलंपिक में मेडल लाने तक की कहानी न केवल जबरदस्त और धमाकेदार है बल्कि सभी के लिए प्रेरणादाई भी हैl                 ओलंपिक में दूसरे खिलाड़ियों से पिछड़ना अलग बात है पर अपना खेल ही न पूरा कर पाना किसी भी खिलाड़ी का मनोब...

ये कैसा मौसम आया

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गाये मेघ मल्हार ये कैसा मौसम आया,  बरसे मोती के हार ये कैसा मौसम आयाl सातों रँग में रँगी सुहागन धरती रानी,  मान ली मनुहार,  ये कैसा मौसम आयाl ऐसी जवानी आयी माने रीति- नीति न कोई,  उमड़े- डूबे नदी किनार, ये कैसा मौसम आयाl तन की लगी हेठ, गाँठ मन की सुलझाई,  विरह की राई हुई पहाड़,  ये कैसा मौसम आयाl झंकृत मन की समेट सके न मन के माँझे, बौराया हृदय सितार,  ये कैसा मौसम आयाl   -निगम झा  स. उप- निरीक्षक स. सी. बल सिलीगुड़ी

-: किमाश्चर्यम :-

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एक तरफ भयंकर महामारी,  मृतक शरीरों से पटी,ढकी ये धरती  और  प्राण वायु की आश में बैठी या लेटी  जिंदा लाशें है और  वही उसी वक्त, उसी जगह मुनाफाखोरी, जमाखोरी,कालाबाजारी और मानव अंग तस्करी जैसे  घृणित तमाशें है l सहसा मुझे यूँही बस याद हो आया  महाभारत का एक प्रसंग,  पूछ बैठे मानो यक्ष आज फिर कहो युधिष्ठिर - किमाश्चर्यम?  पर  लगा युधिष्ठिर दशा देख यह मानवता पर रोने चला शोकाकुल चित्कारों और असंख्य साईकलों पर लदी  खाक होने,कोख में सोने की जगह तकती,  दर दर भटकती लाशों के बीच भी, सब मनुजता छोड़ ,नैतिकता सिकोड़, धन बटोरते, उत्सव विलासी मनुष्यों पर  कर दृष्टिपात कहो ओ यक्ष!  क्या इससे भी अधिक हो सकता है कुछ आश्चर्य भला?                                                                                       ...

इंसानियत ब्लैक मार्केट में

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"मुश्किल घड़ी में आश खोज पाएंगे क्या?   साथ,प्यार, लोगों का विश्वास खरीद पाएंगे क्या ? जिन पैसों के खातिर ब्लैक कर रहे हैं दबाएं और सिलेंडर,  मौत आएगी जब इन्हें, उनसे सांस खरीद पाएंगे क्या? "            एकाएक नजर सोशल मीडिया में घूम रही इन पंक्तियों पर जा ठहरीl देखा ,पढ़ा और सोचा क्या इस संसार में कोई भी ऐसा व्यक्ति है जो इन प्रश्नों के समुचित उत्तर न दे पाए ?क्या कोई है जिसे यह ज्ञात न हो कि उसे " अमरत्व "नहीं मिला है? वह मानव है,जीव है,ईश्वर की बनाई एक नश्वर कृति। फिर इस अज्ञानता ने उसे कैसे आन घेरा  कि वह दूसरों के आंसुओं पर अट्टाहास करें, दूसरों की मजबूरियों से अपनी जेब में भरे और दूसरों के रक्त से सोलह श्रृंगार करेंl           इसमें न तो कोई शक और शुबह नहीं कि हम मानव है दुनिया के सबसे बुद्धिमान जीवl बुद्धि अर्थात सोचने समझने की क्षमता और साथ ही विवेक भी,जो ना केवल बुद्धि का पूरक है बल्कि हमें सही और गलत में भेद करना भी सिखाता है और सत्यम शिवम सुंदरम का पथ भी दिखाता हैl आप सोच रहे होंगे मैं यह सब क्यों बता र...

खेलभाव

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है जीतता खेल में  कोई ,  खेल में कोई हारता है पर सत्य विजेता है वही जो,  अपने प्रदर्शन पे सबकुछ वारता हैl न होता जिसे जय का मोह ,  दुःख पराजय का न जिसे विचलित करता प्रयत्न में रत रहे  हरपल,  असफलता से उद्विग्न न चित्त करता l साहस उसे सँवारता है,  युग,कर्तव्य, उत्तरदायित्व और पौरुष उसे पुकारता है  प्रतिकूलता से डरता वो नहीं, बस अनुकूलता को स्वीकारता है l अपने विवेक के प्रकाश का कर अवलंबन   वो  स्वयं आगे बढ़े कौन विरोध करता है, कौन समर्थन,   इसकी गणना कौन करें?  जब भी कभी हार का भय  आकर उसे सतायेगा अपना दृष्टिकोण बदलेगा ज्यों ही, दूसरे ही क्षण  वह भय का भूत अंतरिक्ष में तिरोहित हो जायेगाl लोभ,मोह,मद दबाव के झोंके  उसे नहीं भटकायेंगे,  भीतर उगा था जब श्रद्धा का अंकुर  खुद को उसी मनःस्थिति में जब ध्यायेंगे किसी की आपत्ति से, कहने - सुनने से  आत्म विश्वास न जिसका डगमग होगा आत्म श्रद्धा कायम कर बढ़ेगा जो निरंतर,   चढ़ेगा देर या सवेर,किसी एक दिन वही स्वप्न सौपान  हेतु जिसके समस्त संसार...

सत्य एक द्वंद

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सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् क्योंकि सत्य,  एक परीक्षण है,  एक द्वंद है,  वक्ता के साहस और श्रोता की सहनशक्ति का  जिसमे एक सत्य कह नहीं पता और दूसरा,  सत्य सुन ही नहीं पाता और गर इस मूक बधिरता पर अभिमन्यु सा पार पाता दिखे सत्य  तो फिर घेर लेते है अन्याय के सात नहीं,  सहस्त्र कोटि महारथी l शुरू होते है अगणित वार जिनका कोई अंत नहीं होता फूट पड़ता है जैसे असाध्य सी  पीड़ा का कोई हृदय विदारक सोताl तो फिर आखिर क्या मिला इस अभिमन्यु को? क्या वीरगति?  नहीं ,अभी कुछ शेष है अर्धमुर्छित, अर्ध विक्षिप्त सा  कड़ाहता हुआ  क्या वही सत्य?  हाँ पर साथ लिए  न ब्रूयात् सत्यं अप्रियम भी l                                                       - निगम झा सब इंस्पेक्टर, एस. एस. बी. सिलीगुड़ी

परिवार नामक संस्था समाप्ति की कगार पर

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         अपने स्कूल के दिनों में कुरुक्षेत्र या फिर गुरु की कॉपी(ठीक से याद नहीं) की पिछली जिल्द पर एक प्रेरक प्रसंग पढ़ा था, जिसमें महाभारत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् द्वारिका लौटने की अनुमति मांगते श्रीकृष्ण से कुन्ती कहती है कि वह चाहती है कि उसपर विपत्तीयाँ  हमेशा आती रहे, क्योंकि जब - जब विपत्तीयाँ आयेंगी तब- तब उसके निवारणार्थ भगवान भी आयेंगे और इस प्रकार उन्हें बारंबार भगवान श्री कृष्ण के दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त होता रहेगा l         वर्तमान परिपेक्ष्य में यह तो नहीं ही कहना चाहूँगी कि कोरोना सदृश्य बिमारियाँ या परिस्थितियाँ पुनः कभी किसी युग अथवा काल खण्ड में आये परंतु इस संपूर्ण कोविड काल में रिश्तों की जो पुनर्विवेचना हुई है, नये आदर्श स्थापित हुए है उसे देखते हुए ऐसी परिस्थितियों का उत्पन्न या घटित होना अवश्यक  ही जान पड़ता है ताकि हमें उन संबंधों कि महत्ता का ज्ञान हो जो आज के समय में हमें महत्वहीन प्रतीत होने लगे है l            प्राचीन समय में रिश्तों का अलग ही मूल्य था l सतयुग, त्रेता ...

-:प्रकृति का संतुलन:-

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बनने चले थे हम कुदरत के नियंता और नियामक पर जाने क्यों भूल गये थे एकांत स्वार्थ के मानक पर वह क्या कोई मानव है जो, अपने में सबकुछ भर लिया  प्रकृति तो प्रकृति ठहरी खुद अपना संतुलन कर लिया l उसे यकीन था हम नहीं कभी कर पायेंगे स्वच्छ धरा जल, थल, पवन, वातावरण या फिर, चाहे हो अपना ही घर ही दूषित पड़ा एहसान फरामोश जो ठहरे हम, आदत सी हो चली दूसरों पे छींटे उड़ाने की छेद करना उसी थाली में, जो है खुद ही के खाने की पर सुना है अब बाहर मलयानिल,भीनी सी सुगंध बिखराती  है थी मैली पतित सी,हो ध्वलित सब नद निर्झर, सागर से मिलने जाती है  उसे पता था कस नहीं सकते हम अपराधों की नकेल, क्योंकी  कभी उसने किसी दुः शासन को द्रोपदी की ओर, चीर बढ़ाते न पाया लूटते-कटते और मिटते रहे, भीड़ से घिरे रहे लोग पर हर बार हस्तिनापुर के दरबार सा रहा, मौन छाया लेकिन अब सुना है राह में गिरे नोटो को भी, कोई कही नहीं उठाता है सड़को पर पहले सा डर नहीं, हाँ, बस केवल सन्नाटा है उसे लगा था वे नहीं जोड़ पाएंगे टूटे नाते रोजमर्रा की आपाधापी में जो थे, हर रिश्तों से कतराते बुजुर्गों के लिए वृद्धाश्रम, बच्चों के लिए बोर्...

पर्यावरण पेड़ और प्राण

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क्यों न कई नई, कोमल पौध लगा बनायें, 'दशपुत्रों समों द्रूम' अब जीवन मंत्र  नहीं तो ढोती रहेंगी जिंदगियाँ यूँ ही,जीने को  प्राण वायु यंत्र और दौड़ता, दम तोड़ता रहेगा, हर प्यासा मृग तृष्णा के पीछे जब बचा खुचा पानी धीरे से, बोतलों में नप जायेगा फिर होगा कौन वृक्ष बिना जो, झूम- झूम मेघों को मल्हार सुनाएगा,  और जिसकी एक मुनहार पे घन, धरा पे मोतियों सी धार लुटायेगा पर्ण की शीतल छतरी ताने, कौन धूप में बाट तकेगा सोई सी,अधखुली सी कलियों को मुस्काकर, करेगा कौन बसंत का श्रृंगार उसकी असंख्य बाँहों में कसे बिना फिर, क्या रुक पायेगा मृदाक्षरण,  और बहती माटी में भला कभी उपज पायेगा कोई अन्न?  खट्टे मीठे सरस फ़लों बिन कैसे सजेंगी टोकरियाँ, अपनी शाखों पर सावन के झूले कौन झुलयेगा?   शेष बचेगा क्या कोई जंतु  जंगल घर से बेघर होकर,  कितने दिन रहेगी चुनचुन चिड़ियाँ, बिजली के खंभे -तारों से लटके घोंसलों पर फिर एक दिन, प्यास क्षुधा से दग्ध, श्वास रहित मानव  मेट देगा खुद धरती से अपना अस्तित्व ,अपने निशान आओ प्रण ले पेड़ लगा बचायें, ये पृथ्वी, पर्यावरण और सब जीवों के...

अन्याय के विरुद्ध

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संग चलते नहीं एक भी कदम, न मिलाते स्वर से स्वर गर कोई जो हो जाए खड़ा अन्याय के विरुद्ध   कुछ कहने को, कुछ कर गुजरने को  अत्याचारों का सैलाब पुरजोर कोशिशों से तैर पार करने को  क्यों शेष हो जाते हैं अपने कोश  शब्दों से   और घरघराना, फुस फुसाना भी मुनासिब न समझती है स्वर ग्रंथियाँ या फिर राह रोक लेती है मनो- मस्तिष्क की कुछ भ्रांतियाँ और देती है सदा हो मूक , कर आंखें बंद सो जाओ  जब तक नहीं ढाता कोई तुम पर जुल्म न होता इन मुश्किलातों का तुम्हें  जरा भी इल्म   अरे अपना दिन जब आएगा उस रोज देखा जाएगा  या फिर क्या पता ये वक्त तुम्हारे जीवन में न आयेगा पर याद रहे गर हो एक साथ आज हम ये कुरीतियाँ,ये अत्याचार जो रोक न पाएं तो कल  हो आतिशबाजी सी यही चहुंओर मंडराएंगी  छप्पर हमारा भी उस दिन ना बचेगा जब सारी बस्ती लपटों   में घिर जायेगी और इस दावानल में झुलसती हुई हर पीढी़ रोज  किया करेगी हमसे ये प्रश्न  सुलगी थी जब ये चिंगारी तो क्या बजा रहे थे तुम नीरो सी बाँसुरी या मना रहे थे इंसानियत की सुपूर्दे खाक पे ख़ुशीयों का ...