पर्यावरण पेड़ और प्राण




क्यों न कई नई, कोमल पौध लगा बनायें, 'दशपुत्रों समों द्रूम' अब जीवन मंत्र 
नहीं तो ढोती रहेंगी जिंदगियाँ यूँ ही,जीने को  प्राण वायु यंत्र

और दौड़ता, दम तोड़ता रहेगा, हर प्यासा मृग तृष्णा के पीछे
जब बचा खुचा पानी धीरे से, बोतलों में नप जायेगा

फिर होगा कौन वृक्ष बिना जो, झूम- झूम मेघों को मल्हार सुनाएगा, 
और जिसकी एक मुनहार पे घन, धरा पे मोतियों सी धार लुटायेगा

पर्ण की शीतल छतरी ताने, कौन धूप में बाट तकेगा
सोई सी,अधखुली सी कलियों को मुस्काकर, करेगा कौन बसंत का श्रृंगार

उसकी असंख्य बाँहों में कसे बिना फिर, क्या रुक पायेगा मृदाक्षरण, 
और बहती माटी में भला कभी उपज पायेगा कोई अन्न? 

खट्टे मीठे सरस फ़लों बिन कैसे सजेंगी टोकरियाँ,
अपनी शाखों पर सावन के झूले कौन झुलयेगा?  

शेष बचेगा क्या कोई जंतु 
जंगल घर से बेघर होकर, 
कितने दिन रहेगी चुनचुन चिड़ियाँ, बिजली के खंभे -तारों से लटके घोंसलों पर

फिर एक दिन, प्यास क्षुधा से दग्ध, श्वास रहित मानव 
मेट देगा खुद धरती से अपना अस्तित्व ,अपने निशान
आओ प्रण ले पेड़ लगा बचायें, ये पृथ्वी, पर्यावरण और सब जीवों के प्राण। 


-निगम झा
स.उप-निरीक्षक, 
स.सी. बल

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