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मेरे इश्क़ के ख्यालात

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मेरे इश्क़ के ख्यालात अब जेब नहीं देते, पहले ही लूट चुके है अब फरेब नहीं देते, करना चाहता हूं जिंदगी को फिर से शुरू, पर  ये  दर्द को  देने  में  देर नहीं  देते,मेरे  ख्यालात अब जेब नहीं देते, हमारे  वक्त को  लूटते है  हर दम,उनकी  याद में, काम में मसरुफ़  होना  चाहते  तो है पर ये होने नहीं देते, गुजरा हुआ दौर है ये समझकर भूलना चाहते है मगर ये ख्याल रोज पैदा होते और  जवां  जीते  है ,देते  है  दर्द  मुझे  हद से ज़्यादा,, मुझे जीने नहीं देते है मेरे ख्यालात  मुझे  पल पल मौत देते है मैं मारना चाहता हूं और निजात चाहता हूं इश्क के दर्द से,मगर ये ख्याल मुझे मरने नहीं देते। तेरी  यादों  को  भूलना चाहता हूं और  चाहता हूं फिर से नई जिंदगी सुरु करू मगर कमबख्त ये ख्यालात किसी का  होने नहीं देते।                                "कुमार"

अपनी यादों का पाबंद कर गया

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वो इस क़दर अपनी यादों का पाबंद कर गया,,, मैं  चल  रहा  था होल होले अपनी ज़िंदगी वो एक  झटके  में,,मेरी  चाल  बुलंद  कर  गया,,, पता नही मेरे लिए क्या आग थी,,, उसमें,, मैं अपनी रफ्तार से बुझ रहा था,,,कहीं से आया,, और मेरे दिल के चरागों को रोशन कर गया,,, इश्क़ की ख़ामोशी में रह कर,, ख़ुद में हार बैठा था उसके इक अल्फ़ाज़ ने क्या जादू किया,, जो इश्क़ खातिर फ़िक्र मंद कर गया,,, दुनियां के झमेलें कुछ इस क़दर छा गए थे,,, दिल पागल सा हो गया था,,कुछ तो बात थी,, उसमें  यारों  जो  इस  नासाज  दिल को,,, दानिशमंद कर गया,,, चाहें दुनियां बदल ले कोई भी पैंतरे,,,मुझे लेकर,, मैं अब उसका हूं और ताउम्र उसी का हूं वो अपनी हर अदा से अपना कर गया,,,                                       कुमार

हम अपनी मनोदशा क्या लिखें

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इश्क़ के सुलगते अंगारों में,,हम अपनी मनोदशा क्या लिखें,,,ढलता हुआ सूरज लिखें,,या उगती  हुई शाम लिखें,,,हम अपनी मनोदशा क्या लिखें??? सुबहा  की  तन्हाई  लिखें,,,या  रातों अंगड़ाई लिखें,, लिखें क्या समझ नही आता,,जीवन  बेतरतीबी  में गुजर  रहा,,कहां  मोहब्बत  की  भरपाई  लिखें,,, आठों  पहर  दसों  दिशाएं,,,और  हृदय में गुमनामी की  शहनाई,,,बताओ   यार  हम  अपनी मनोदशा क्या लिखें,,, अब जीने कहां देती है ये तन्हाई की तरुनाई,, हम अपनी मनोदशा क्या लिखें,,,                                     ®कुमार

तुम लौट आना

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भूली हो इन गलियों को !! याद आ जाए तो एक बार आ जाना,, हम ठहरें है उन्हीं पलों में,,तेरे लौट आने की खातिर हो सके तो लौट आना,, नमक सी दारुण हो गई जिंदगी हो सके तो  चुटकी  भर थोड़ा  सा आटा ले आना,, ये भी न हो सके मुमकिन तो कुछ पलों के लिए ही सही तुम लौट आना,, हम आज भी उन्हीं  यादों में बैठे है तुम आते वक्त यादों का पिटारा ले आना,, ए मेरें हमरूह तुम लौट आना,, अब मुमकिन नहीं तेरे बगैर सांस लेना भी, तुम अपनी आहट ले आना,, निवेदन करते है आते वक्त थोड़ी लबों पर मुस्कराहट  ले आना,,ये  सब  हो  या ना हो तुम लौट आना ।।                                    ® "कुमार"

कयामत का इंतजार कौन करता है"

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  "मोहब्बत के कौल में वफ़ा दारी              कौन करता है। मोहब्बत  का  खेल  खुद, किसी        कयामत से कम नहीं     कयामत आने का इंतजार            कौन करता है" इश्क सफ़र में कोई खुद को           भुला भी दे कोई, उसे खुद का ख्याल नहीं भला     उसे याद कौन करता है। ज़माने में कोई वफ़ा करने       की भी सोचे तो, उसे नरक की ज्वाला में जलना पड़ता है भला उसे बचाने की     भी जुर्रत कौन करता है                                      "कुमार "

पार नज़रों के एक सूरज ढलता है

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पार  नजरों  के एक  सूरज  ढलता  है, जीने  का इच्छुक मगर कौन सहारा है उसका, ख़ुद में वह कहां  संभलता है! ख़ुद से ख़ुद में जलकर आग्नेय हो चलता है, रोना आता है पर रोता नहीं ख़ुद में वो कहां पिघलता है,,  पार नज़रों के एक सूरज ढलता है! देखती उन्मुक्त गगन को आंखे उसकी, पाती जहां के पैमाने, ढूंढता है खुद को उनमें, बरबस,... उसे  बस दलदल ही मिलता है,, पार नज़रों के एक सूरज ढलता है। यादें बहुत है ताजा तकदीरों की और उनकी तदबीरों की,पर बहती उन परछाइयों से भी  वह कहां मिलता है, पार नज़रों के एक सूरज ढलता है💔                            ® कुमार

प्रेम राही

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ज्यादा न सही भले, थोड़ा प्यार तो करना, कलमें  बांचें  हैं  हमनें  अहल- ए - दिल  से इश्क की राह में,तुम थोड़ा एतबार तो करना,, ज्यादा न सही,,भले कम ही सही तुम प्यार तो करना,, गर रजा हुई उसकी तो ता उम्र साथ रहेंगे, न भी हुई तो कोई बात नहीं, हम साथ न होकर भी साथ हो रहेंगे,, बस तुम उसपर थोड़ा एहतराम करना, ज्यादा न सही भले थोड़ा ही सही हमसे प्यार तो करना,, हम टूटकर भला तुमसे कहां जाएंगे,कोई भी पड़ाव हो उम्र का हमें तुम बस अपना पाएंगे।। हम प्रेम रहा के इस सफ़र पर उम्र भर साथ निभाएंगे,,                                  "कुमार"

निकले है ग़जलों के सफ़र,,,

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निकले  है  ग़जलों के सफ़र,,, देखते है क्या क्या मिलता है,,, मधु भरी  मुस्कां  मिलती  है,,, या दर्द भरा कोई अल्फाज़  मिलता  है,,, गीत  संगीत,,,बन  उपवन,,, भंवरों की गुन्जन,,,फूलों का उजास मिलता है,, मयूर का नृत्य,,चातकी का प्रेम,, मिलता है,, और देखते हैं क्या क्या मिलता है तोतों सी हरियाली,,,इंद्रधनुष सी शोभा न्यारी,,, चारों तरफ है फुलवारी,,,नव पाल्वित बसंत,, डारी डारी,,कोयल का मधु संगीत का राग मिलता है,, देखते है क्या क्या मिलता हैं,,, और ये क्या गजब हो आया है,,मधु सी प्यारी,,, नायिका का यौवन का उन्माद,,झलक आया है, आंखे है कजरारी,,, गेसुओं की घटा है चिंगारी,, मद भारी आवाज़ में प्रेम उमड़ आया है,,, देखते हैं गजल को नायिका में कोनसा राग नजर आया है,,जो उसने जहां को भरमाया है,, चारों तरफ इस चित चोर कनक कामिनी ने सबको उलझाया है,,, निकले है गजलों के सफर पर,,,देखते है क्या क्या मिलता है,,,खुश नुमा शमा मिलता है या दर्द में डूबा जहां मिलता है,,,                            ...

इश्क़ की इस फटी चादर पर,

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अब लग रहा है इश्क़ की इस फटी चादर पर, अब पैबंद लगाएं जाएं,,,,जो हवा बह रही है, इश्क़ की सुरमयी,,इसको थोड़ा पाबंद किया जाए,, मैं पागल सा हूं तेरी दीवानगी में,,अब मुझे थोड़ा अकलमंद  बनाया  जाए,,जो चुनता फूल  ख्वाबों  में  और  खुश  हो  जाता  हूं अब  इस  नादान दिल को थोड़ी हकीकत बताई जाए,, रुका हूं मैं जिस जगह,,मेरे मतलब की नहीं, यहां  दीवानगी  की  हदें  पार  होती  है,अब थोड़ा  आगे  बढ़ा  जाए,,,ताकि  मैं  मंजिल पाऊं,,,  मेरी    खुमारी   की   अब   हसरतें  बदली जाए,, "अब इश्क की इस बहती हवा में थोड़े पाबंद लगाएं जाएं" तेरे रुखसार से मद की टपकी वो बूंद याद आती है,, तेरे होठों की वो सुर्खी बहुत तड़पाती है,,मैं क्या करू कैसे उतारूं तेरी खुमारी दिल से,,तेरी  हर अदा बहुत तरसाती है,,                                      मि.कुमार

अल्फ़ाज़ कहां से लाऊं,

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कहना तो बहुत कुछ है पर अल्फ़ाज़ कहां से लाऊं, रोता है दिल दर्द से,सुनाना चाहता हूं तरंग दिल की पर साज कहां से लाऊं मिटा दी मेरी हस्ती जमाने ने,और उनकी तोहमतों ने, अब तुम ही बताओ मै खुशी का पैग़ाम कहां से लाऊं, बहक गई हो तुम रकीबों की बातों में, तुम पर जाहिर हो सके ऐसा राज कहां से लाऊं अब  कुछ  करने के मन में नहीं हूं, तुमसे मोहब्बत में हर चीज़ तो हार चुका हूं, अब  जीने की चाह कहां से  लाऊं, हो  तुम फिर  मेरी, अब  शायद ख्वाबों में ही मिलना लिखा है, जबसे  तुम गई  हो  मेरे शरीर को छोड़कर बिन  रूह  के  जीने  का  हौसला  मै  कहां  से लाऊं, अब  राह  हीन  हूं  ख़ुद  को खोकर, आगे चलने की राह कहां से लाऊं......                                   "कुमार"