इश्क़ की इस फटी चादर पर,

अब लग रहा है इश्क़ की इस फटी चादर पर,
अब पैबंद लगाएं जाएं,,,,जो हवा बह रही है,
इश्क़ की सुरमयी,,इसको थोड़ा पाबंद किया
जाए,,


मैं पागल सा हूं तेरी दीवानगी में,,अब मुझे
थोड़ा अकलमंद  बनाया  जाए,,जो चुनता
फूल  ख्वाबों  में  और  खुश  हो  जाता  हूं
अब  इस  नादान दिल को थोड़ी हकीकत
बताई जाए,,

रुका हूं मैं जिस जगह,,मेरे मतलब की नहीं,
यहां  दीवानगी  की  हदें  पार  होती  है,अब
थोड़ा  आगे  बढ़ा  जाए,,,ताकि  मैं  मंजिल
पाऊं,,,  मेरी    खुमारी   की   अब   हसरतें 
बदली जाए,,

"अब इश्क की इस बहती हवा में थोड़े पाबंद लगाएं जाएं"

तेरे रुखसार से मद की टपकी वो बूंद याद आती है,,
तेरे होठों की वो सुर्खी बहुत तड़पाती है,,मैं क्या करू
कैसे उतारूं तेरी खुमारी दिल से,,तेरी  हर अदा बहुत
तरसाती है,,

            
                        मि.कुमार

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