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Showing posts with the label Urmila Tiwari

वृध्दाश्रम भाग- 8

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पापा जी के मन को थोड़ी राहत मिली.. अमन को हमारे जाने से कोई एतराज नहीं है.! रक्षाबंधन नजदीक है.. वहाँ से अभिनव के साथ जाकर अर्चना के पसंद का  गिफ्ट भी खरीद लूंगा..कितनी भोली है अर्चना..अपनी माँ जैसी..इतना स्वस्थ हूँ मैं..फिर भी उसे दूबला ही नजर आता हूँ.. यहाँ बाहर निकलने का कोई मार्ग नहीं नजर आता.. अमन बड़ा आदमी हो गया है.. उसके पास फूर्सत भी कहाँ है अब..इसमें बुरा ही क्या है..? मैं भी तो यही चाहता था..बहू- बेटे सुखी हैं इससे बड़ी खुशी और क्या हो सकती है !"  पापा जी को अमन का बचपना याद आने लगा और चेहरे पर मुस्कान आ गई!  फोन के रिंग ने अतीत से पुनः वर्तमान के धरातल पर ला दिया!  अभिनव का फोन था.!  पापा जी फोन रिसीव करते ही बोल पड़े -  "हाँ बेटा! कैसे हो?" पापा जी की उत्साहित ध्वनि आई!  "पापा जी प्रणाम!"  "सुखी रहो बेटा!"  "घर आ गए हो न?" "नहीं पापा जी! रानी को बेडरेस्ट की जरूरत है.. पिछले हफ्ते इसके मम्मी के पास लेकर आया हूँ.. डीलीवरी  तक रानी यहीं रहेगी!" और मैं भी.. घर आता जाता रहता हूँ..आप भईया के पास हैं तो मुझे आपकी चिंत...

वृद्धाश्रम भाग-7

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पापा जी को अमन के बंगलू में रहते हुए एक महीने हो गए थे! राहुल और रुही  दादा जी का सामीप्य पाकर अति प्रसन्न थे! बहू- बेटे पूरा ख्याल रखते थे! प्रति दिन अर्चना फोन कर हालचाल लेती रहती!  इस बीच अभिनव और रानी कहीं बाहर  घुमने  चले गए ! अभिनव ने बताया था कि घर वापसी में दो महीने लग जाएंगे!  अर्जुन और उमा एक दिन मिलने भी आ गए!  "पापा जी आप फिर से दादा बनने वाले हैं..!" उमा ने चहकते हुए कहा!  अच्छा! तब तो मेरा बुढापा छू हो जाएगा! दादा बनने की भावी प्रसन्नता चेहरे पर जाहिर हो रही थी!  " हाँ पापा जी! रानी से मिलकर आ रही हूँ मैं..!  ट्रीटमेंट चल रहा है.. कल अभिनव ने अल्ट्रासाउंड भी करवाया था  सब कुछ नार्मल भी है!"  इसी बीच पापा जी के घुटनों में दर्द होने लगा.. सुगर लेबल भी बढ गया था.. अमन ने डाक्टर को दिखाया तो डाक्टर ने पापा जी को मेडीसिन के साथ टहलने का परामर्श भी दे दिया! पापा जी घर पर थे तो अपने बगीचे में घुमते रहते थे! यहाँ सीढ़ी से उतरने की समस्या थी!  कहीं जाना होता तो अमन हाथ पकड़ कर सीढ़ी पार करा देता!  " बेटा! तुम ...

वृद्धाश्रम-6

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"जी पापा.. मुस्लिम चाचा का ये सपना आपके जरिए अवश्य पूरा होगा.. किंतु आप अभी किसी से उनके निवेश की यह चर्चा मत कीजिएगा.. कहीं फिर कोई ब्यवधान न हो जाए.. समय आने पर सबको जानना है..!"  अर्चना ने अपनी बात पूरी कर ली!  "हाँ बेटा!  वर्षों पहले तुम्हारी माँ ने भी कुछ ऐसा ही परामर्श दिया था..अब मैं शीघ्र ही इस क्रियान्वयन की योजना बना रहा हूँ.. स्वास्थ्य ठीक रहा तो पुनः मंदिर शिलान्यास के अवसर पर सबको एकत्रित करुंगा..!" "पापा ये देखिए.. उमा दीदी ने ब्यूटी पार्लर खोला है.. पेपर में एड निकलवाई है.. दीदी का फोटो भी है.!".रानी ने चहकते हुए कहा!  हाँ भईया के फर्नीचर का एड भी है यहाँ..अभिनव ने पेपर दिखाया!  "अच्छा है न.. बेटा-बहू तरक्की करें तो माता-पिता को बहुत खुशी होती है..!" अर्चना ने खुशी जाहिर की!  " हाँ बेटा! तू भी अपने दुकान पर बैठा कर.. मैं चाहता हूं हमारे तीनों बेटे सफल जींदगी जिएं.!"  एक पिता के मन का उदगार निकल पड़ा!  " मैं कन्टीन्यू कैसे जाउँ पापा..? माँ के साथ कई वर्षों तक हमने हास्पीटल का चक्कर लगाया.. अब आपकी सेहत ठीक नही...

वृध्दाश्रम भाग -5

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रानी बहू.. सभी काम निपटा कर आना मेरे कमरे में..  आज बड़ा बाक्स खोलना है.! माँ जी के शब्दों के साथ ही  चेहरे पर प्रसन्नता के भाव थे!"  "क्या हुआ माँ जी.? अर्चना आ रही है क्या.?" रानी ने पुनः प्रश्न किया!  " सबको आना है  बेटा..तुम सहयोग करोगी तो मैं साड़ी और धोतियाँ  गिन कर रख लूंगी! जो कम पड़ेगा वो मंगाया जाएगा.. अब बड़ा बाक्स तो मुझसे खुलेगा नहीं.. कमर सीधी नहीं हो रही..!"  " कोई फंक्शन होगा माँ जी.?.मुझे तो किसी ने कुछ नहीं बताया अब तक.?" रानी आश्चर्यचकित हो रही थी!  "अरे हां रानी! मैं तो तुमसे बताना ही भूल गया.. बड़े भईया का फोन आया था.. अगले वर्ष राहुल का उपनयन.. और साथ में भागवत् कथा का आयोजन भी होगा.!" अभिनव एक सांस में पूरी बात बोल गया!  "वाह! ये तो बहुत अच्छी बात है.. तभी तो माँ जी इतनी एक्साइटेड है बाक्स खोलने के लिए..!"  रानी बोल पडी़!  "और कमर का दर्द भी छू हो गया है इनका.. पोते का नाम सुनते ही डबल एनर्जी आ जाती है!" पापा जी ने बहू बेटे का समर्थन किया!  सभी लोग हंसते हुए अपना  कार्य संपन्न करने में लग गए...

वृध्दाश्रम भाग-4

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"अमन.. अर्जुन,. अभिनव.. सब आओ यहाँ..!  जी पापा जी.?" पापा जी की एक आवाज सुन तीनों बेटे पास आ गए! "बेटा ! अगले हफ्ते शरत पूर्णिमा है.. इस बार की तैयारी भब्य  होनी  चाहिए.. रात भर कीर्तन का आयोजन होगा और सुबह खीर का प्रसाद वितरण होगा! तुम सभी अपना-अपना कार्य संभाल लो!" दादाजी निर्देश दिए!  "हाँ पापा जी! मैं कीर्तन मंडली को बुला दूंगा!" अमन भैया ने कहा!  "मैं हलवाई का प्रबंध करता हूँ पापा!" अर्जुन भैया ने कहा!  "मैं अर्चना को बुलाने जाउंगा  फिर सबको होस्ट कर लूंगा!"  अभिनव भैया ने कहा! और पूजा की तैयारी के लिए मैं हूँ ना! नीलू भाभी ने कहा!  दादाजी के मन में लड्डू फूटने लगे!  "इसबार बेटी के साथ जमाई भी हमारे घर पूजा में शामिल होंगे...हमारे कहने से पहले ही तुम्हारे बच्चों ने अर्चना को बुलाने की पहल की.. अब हमारे बहू बेटे अपना दायित्व समझने लगे हैं.. ये सब तुम्हारे परवरिश की देन है अमन की माँ !"  दादाजी ने अपना मनोभाव ब्यक्त किया!  "हाँ! और बच्चों के प्रति आपका  अनुशासित ब्यवहार भी  बहुत मायने रखता है!"  दादी ज...

वृध्दाश्रम भाग -3

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"कुछ नहीं भाभी.. मैं वाशरूम गई थी..!" सुरभी सकपकाते हुए बोली!  अच्छा! एनी वे..अब शादी संपन्न कराई जाय! सुर्योदय से पहले ही विदाई का मुहूर्त भी है!  ओके भाभी! कहते हुए सुरभी हाल में चली गई!  विभिन्न रस्मो को निभाते शादी संपन्न हुई.. अब विदाई की घड़ी भी आ गई. !  अरे! विदाई का कपड़ा कहाँ है..? कौन रखा है? दादी ने याद दिलाया!  माँ जी! वो अभी उपर ही है बाबूजी के कमरे में सीटू लेकर आया और वही रह गया! मंगाती हूँ अभी!  शैली जाना उपर.. !  सुरभी चल न जल्दी.. शैली ने हाथ पकड़ कर खींचा!  दोनों कमरे तक गईं!  डोर नाक किया तो अंदर से बंद था! शैली ने कई बार खटखटाया.    ".जल्दी कपड़े लाओ ..!" उमा भाभी ने पीछे से आवाज दी!  "भाभी ये डोर लाक है अंदर से..!" सुरभी ने कहा!  सुबह होने वाली थी! "सीटू.. खोल.. सीटू.. उमा भाभी ने आवाज दी तब फाटक खुला!"  उमा भाभी के साथ सुरभी और शैली भी कमरे में प्रवेश कर गई!  भाभी ने विदाई का कपड़ा लिया और नीचे चली गई!  अरे आप यहाँ.? एक साथ सुरभी और शैली बोल पड़ी!  मैं सपने में तो नहीं हूँ...

वैवाहिक वर्ष गांठ

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आज हमारी शादी की  सत्रहवीं वर्ष गांठ है..आप सभी का आशीर्वाद शिरोधार्य है! .चंद पंक्तियाँ निवेदित करती हूँ!  सोलह सावन बीत गए कब  प्रणयमास की ललिता में  आया मधुर मनोहर दिन यह  सौभाग्य सुंदर प्रवर ललिता में  ये प्रणय ग्रंथ पढते - पढते  जब नाम तुम्हारा आया मन वीणा के झंकार बजे  मन का सावन हर्षाया  प्रिय से प्रियतम बन बैठे तुम  जीवन का रथ तेरे कर में  दाता से तुमको मांग लिया सांसो में हर पल में क्षण में  तेरी अनुरागी बडभागी निज नैन केंद्र तुम मेरे हो  तुम तप्त हृदय में शीतलता के आयामी बहुतेरे  हो  स्पंदित हिय की अभिलाषा तुम हो पावन वह जिज्ञासा  जिसमें हम खोये जाते हैं  संगम तेरा ही. पाते हैं!  गुंजार गीत के तार सुगम उर के सरिता का तू संगम  निज श्वांस प्रखर की सुधा वेणु  कल- कल करती  संकल्प वेणु  तुम सांसो की हो डोर बने  परिभाषित उर के भाव घने  कर से करते निर्मल वंदन  है प्रणय काल का अभिनंदन! 

वृध्दाश्रम भाग २

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भाग -2 "अच्छा!  यह जान कर दिल को तसल्ली मिली पर...हम आपके हैं कौन.?" सौरभ  मजाकिया लहजे में बोला!  "शैली-   वी आर जस्ट अ फ्रैंड! सुरभी ने भी  हामी भरी!  सौरभ- " माशाअल्लाह! यही तो मैं सुनना चाहता था...!" " माय सेल्फ सौरभ मेहता.. नाईस टू मीट यू!" सौरभ ने हाथ आगे  बढाया!  सुरभी -"जी धन्यवाद!" उसने हाथ जोड़ लिया!  सुरभी- "मैं देख रहा हूँ तभी से आपके चेहरे पर हवा ईयां उड़ रही है.. वैसे डरना मुझे चाहिए.. कहाँ जा रही हैं आप दोनों?"  मेरठ!  शैली ने संक्षिप्त उत्तर दिया और विंडो से बाहर देखने लगी!  "अच्छा! तो आपने दूसरी सीट पर कब्जा किया है..?" कबसे हैं आप इस प्रोफेशन में..?" सौरभ ने शैली की खींचाई की.!  सुरभी- "अभी तो हम प्रोफेशन से बहुत दूर हैं..मेरठ जा रहे हैं हम दोनों कजन  की शादी में.. हम दोनों वहीं पढते हैं..! सुरभी-"मेरा एम बी ए फायनल है और मेरा सी ए ...शैली बोल पड़ी!"  सौरभ-"अच्छा! अब हमारा स्टेशन आ गया आप कहें तो आपके गंतव्य तक छोड़ दूं.?"  "नो  थैंक्स! अंकल आएंगे हमें पीक करने!...

वृद्धाश्रम भाग १

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उपन्यास से एक अँश-  "क्या होता है वृद्धाश्रम..?" एक बुजुर्ग दंपत्ति चाहता है कि जीवन के उत्तरार्ध में वह अपने पौत्र-पौत्रियों के साथ पुनः अपना बचपन जी ले.. अपने बनाये घरौंदे में खेले.. पर अफसोस कि अब ये सपने अधुरे से लग रहे हैं...आज हमारे देश में शिक्षा पर बहुत जोर दिया जा रहा है.. माता पिता अपने बच्चों को किताबी ज्ञान से परिपूर्ण कर देते हैं.. अनेकानेक मुसीबतों का सामना कर के धनार्जन कर अपने पाल्यों  की ख्वाहिशें पूरी करते हैं..  जिन प्रश्नों का उत्तर बड़े बुजुर्गों के सान्निध्य में प्राप्त हो जाता है, उन प्रश्नों में बच्चे  अकेले उलझ जाते हैं.. उँची उपाधियाँ प्राप्त करने के बाद भी जब बच्चे संस्कार जैसे तत्व से पृथक रहते हैं..ऐसे परिवेश में आवश्यकता होती है वृद्धाश्रम की.. जहाँ कुछ पल के लिए हमारे बुजुर्ग अपनी ब्यथा को एक दूसरे से बाँट सके..!" सुरभी-"थोड़ा खिसक जा यार.. खड़े हो कर थक गई मैं..!  इतनी भीड़ में भी जगह मिल गइ तुझे? मैं तो तबसे धक्के खा रही हूँ.!"  शैली-"हाँ यार बड़ी मुश्किल से यहाँ तक पहुँची हूँ मैं...पीछे नजर दौड़ाया तो यही एक सीट खा...

मजदूर दिवस

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अम्बर से छाया मिल जाती, भू पर आ जाती नींदे हैं.. कुछ मेरी भी आशाऐं है हैं, मेरी भी कुछ उम्मीदें हैं..। कितने सारे हमउम्र मेरे, गुरु कुल में पढने जाते हैं. सूनी नजरों से देखा फिर अपने अरमान जलाते हैं. इक क्षुधा मिटाने की खातीर मिलती हर रोज दलीलें हैं. कुछ मेरी भी आशाएं हैं, मेरी भी कुछ उम्मीदें हैं। जी तोड़ परिश्रम करते पर,मालिक के टूकड़ों पे पलते  किसने देखा है हश्र मेरा, मेरे इन राहों पे चल के.। क्यूँ छिन लिया मेरा बचपन, क्यूँ हमसबसे नीचे हैं मेरे भी कुछ आशाएं हैं मे री भी कुछ उम्मीदें हैं । मेरे हाथों नाकलम मिली ना विद्या कामंदिरदेखा  कैसे बदलू ये धूंधली सी अपने हाथों की यह रेखा  आरति होती इस दूनियासे जिसमें हम जलना सीखें हैं मेरी भी कुछ आशाएं हैं कुछ मेरी भी उम्मीदें हैं प्रारब्ध हमारा बोल उठा तुम हो मां के राजा बेटा  मां के इस पावन आंचल मे किसने है कब कीचड़ देखा. कांटो से घिर के रहते हैं हम भी तो फूल सरीखे हैं कुछ मेरी भी आशाएं हैं मेरी भी कुछ उम्मीदें हैं.। ,,उर्मिला तिवारी देवरिया

प्रायश्चित

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" आप भी मेरे साथ चलेंगे बाबूजी  , क्या रखा है गाँव की गलियों. में   ? "  सोहेल ने आग्रह पुर्वक बाबूजी से  कहा! बाबूजी अभी भी शांत मुद्रा में बैठे थे,उनका मौन रहना ही अस्वीकृती का संकेत था फिर भी सोहेल बाबूजी को मनाने का भरसक प्रयास करता रहा।  ऋचा, पिता - पुत्र की बातें सुनकर वापस अपने कमरे में चली गई।  "पता नहीं कौन सा अमृत मिल रहा है यहां, जो बाबूजी ये,घर छोड़ने का नाम नहीं ले रहे।" सोहेल बड़बड़ाता हुआ अपने कमरे  में  आ गया।  " आप शहर  जाने की जिद क्यूं कर  रहे हैं?"   एक घंटे तो  लगते हैं शहर जाने मे     हम यहां से। भी। अ पना कार्य  कर  सकते हैं । "      ॠचा।    ने  समझाया  । पर  सोहेल ने  किसी की नही  सुनी। चंद्रशेखर बाबू एक सरकारी कर्मचारी रह चुके थे।     एक संपन्न और खुशहाल परिवार था उनका । विगत वर्ष श्री मती का स्वर्गवास हो गया था। जहां हर पल उन्हे अकेला पन खलता वहीं , बेटा- बहू उनकी सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ते। नन...

उपवास का विज्ञान

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सहृदयता..  सुलभता.. सुवासित..  वह आत्मज्ञान..  घेरे हैं चहुँ ओर से  ढूंढते हैं कहीं -  " उपवास का विज्ञान !" अंतर्निहीत ये शक्ति है  समभाव है विरक्ति है  कह रहा अवचेतन मन  अवरोध है या उन्नयन ?  आंख मीचे चल रहा  निस्तेज सा क्यूँ ढल रहा ?  कर रहे हिय तले संचय  उदगम है या है अवसान ?  आस का पंक्षी चला  उच्छ्वास भरते  ओस की बुंदो से करता प्रश्न अकुलाहट भरा  नश्वर जगत का मेल है ये  नियति का ऋण खेल है ये है समाया दंभ अंतर में  उठी ज्वाला महान  खोजता है उर्ध्व  में  है ढुंढता "उपवास का विज्ञान " अन्न जल का कर रहे उपवास जब  दूर होता है अधिक संत्रास तब  हो विलय इस क्षितिज में तृष्णा तिरोहित  अल्प है संकल्प  का आगाज तब  कर सके उपवास  तम को दूर करके  घृणा द्वेष कपट कलह  का त्याग कर के  हो कभी उपवास  रसना के रसों का  अपभ्रंश का परित्याग कर उपवास का आनंद भर   हो परिवर्तित मानव महामानव में  भर जाए अक्षुण्ण प्रेम का सागर च...

सत्यमेव जयते

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संविधान पे गर्व हुआ, है आज मिला इंसाफ उसे  नारी का कर दे चीरहरण, करता नही अल्ला माफ उसे । शकुनि का पासा पलट गया. जब न्याय -निति मे जंग हुआ, "सत्यमेव जयते "कहने को  हर प्राणी स्वछंद हुआ। नारी शोषण करने वाले को मिला सबक कुछ ऐसा है , अब उस पर गाज गिरेगी जो अब छुपाए चेहरा बैठा है  । दुष्कर्मी का जो पक्ष करे वो भी दुष्कर्मी जैसा है . .  आहत मन को , आहत करके अब विषधर बन कर बैठा है. ।  

महिला दिवस

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औरत को आइने मे यू उलझा दिया  बखान कर के हुस्न का यू बहला दिया  न हक दिया जमीन नही घर दिया गया  गृह स्वामिनी के नाम का रूतबा दिया गया  छूती रही जब पांव परमेश्वर पती को कह फिर कैसे गृह लक्ष्मी का दर्जा दिया गया  चलती रही चक्की और जलता रहे चुल्हा  क्या खूब लिखा और अन्नपूर्णा बना दिया  ये डाक्टर इंजीनियर सैनिक भी बन गई  फिर घर के जलते चूल्हे ने औरत बना दिया  ब्यभिचार वार आदमी जब रोक न सका  सिंगार साज वस्त्र पर तोहमत लगा दिया  खुद घुमते है लोग शौक से खुले खिले  औरत की टांग क्या दिखा नंगा बता दिया  नारी ने जो ललकारा इस दानव प्रवृत्ति को  जिह्वा निकाल रक्त प्रिय काली बना दिया  रक्त से सीच अपने बचपन जवा किया  पिता का नाम हर जगह चिपका दिया गया । उर्मिला तिवारी  देवरिया

सत्य कभी झुकता नहीं

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सत्य कभी रुकता नहीं सत्य कभी झुकता नहीं सत्य की राहों में  आती बाधाएं अगणित  सत्य रहा निश्छलता  से भावों से निर्मित सत्य सुखद है स्वप्न नहीं ,  सत्य कहीं परिपक्व नहीं  सत्य सुधारस पान करें,  आख्यानों का गुणगान करें सत्य समर्थक कम होते, मिथ्या के राह सुगम होते  सत्य नहीं आसान यही  संकल्प जगत में न्यारा है  सत्य राह कंक्रीट बना  फिर भी प्राणों से प्यारा है सत्य शहद सा मधुर  नहीं,कड़वाहट का बंजारा है  आश्रयदाता है  सत्य अटल , संवाहक है सतत अविरत  परिभाषित जीवन द्वीप सिंधु,  को जगमग करता ज्योत अनल सत्य अविरलता की भाषा  निष्पक्ष भाव की परिभाषा सत्य है संकट का शीर्ष घना  तरु की किसलय सम ठना- ठना सत्य है जीवन का किस्सा  निज अंतर्वेशन का हिस्सा अनुमोदित धारा का तरंग स्वप्निल फेरों का लय सुभंग  नैराश्य नहीं, नुक्ता नहीं  सत्य कभी झुकता नहीं!!

दर्द शहीदों का

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जब जब वीरों की कुर्बानी से वशुन्धरा विभुषित होगी  दिग्गज डगमग हो डोलेंगे, गाथा स्वर्णिम निर्मित होगी  जननी का होता अहोभाग्य! जिसने सुत ऐसा जन्म दिया भारत की लाज बचाने को  भारत माता को सौंप दिया  भारत माँ की रक्षा में जो नतमस्तक हो कर जीते हैं  अमरत्व प्राप्त होता उनको यह अमर सुधा जो पीते हैं  हो देश प्रेम का जज्बा तो जीवन साधक बन जाता है बाधक बनता है गर कोई जो मिट्टी में मिल जाता है  मलयानिल वायु सुवासित है मनहरने वाली आभा सी  हृदयंगम जननी जन्म भुमि पावन अवनी की अभिलाषी  धरती के कण कण में सोना बरसाती आवेशित मेघा  तरु के उपवन में छाई है मकरंद सुरभि सी जिज्ञासा  भारत माँ की गोदी पाकर आह्लादित होता अन्तर्मन ध्वज तीन रंग का अमर हुआ अंतर में गुंजा जन गण मन इस  देश प्रेम की खातिर जिस वीरों ने प्राण गवाया है ध्वज कफन तिरंगा ओढ़ लिया वह वीरगती को पाया है  आंसू का  गिरा एक कतरा माँ की ममता फिर बोल उठी  चिरनिद्रा सोजा लाल मेरे भारत  माँ  का है  गोद सही  कांधे पर रखकर बड़ा बोझ वह पुत्र प्रेम में ...

हमारे वीर सैनिकों

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आपकी वीरता और कर्तब्य निष्ठा को सत सत नमन। आपकी कुशलता के लिए हम सभी भारत वासी परमपिता परमेश्वर से प्रार्थी बने रहते हैं।आपको किस पद का सम्बोधन दे;मन भाव विभोर हो जाता है,आप ही तो हैं जिसने मां की सिन्दूर को सलामत रखा है ...एक बहन की राखी का लाज रखा है ....मां अपने सुत को गले लगाने को आतुर हो जाती है,किन्तु इन सबका श्रेय आपको जाता है ....हे वीर शिरोमणी! आपकी त्याग की गाथा हम सुनते और देखते हुए आ रहे हैं। प्रति पल प्रति छड़ आप मुसीबतों का सामना करने के लिए कटिबद्ध रहते हैं ...तभी तो हम नागरिक अपने घर में अपने परिवार के साथ आनंद पुर्वक रहते हैं। हे वीर शिरोमणि वो मां धन्य हैं जिसने तुम जैसे वीर को जन्म दिया है।नमन करते हैं उस पिता को जिसने तुम्हारे बाजुओ मे सौर्य भरा ...नत मस्तक हैं उस परिवार के समक्ष जिसने आपको देश की रक्षा के लिए समर्पित किया ...हे वीर!माँ को तो इस बात की खबर भी नहीं होती ,की मेरा लाल जो वर्दी पहन के शुशोभित है,वह वर्दी में आएगा या तिरंगे में ..?यह लिखते हुए मेरी आंखे सजल हो रही है पर वो हिन्दूस्तान की देवी तनिक भी विचलित नहीं होती हैं ...और एक मां की गोद से दूर...

रोटी कपड़ा और मकान

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उम्र बीत जाती पाने को.. अपनी छोटी सी पहचान बड़े यत्न से मिल पाता है, रोटी कपड़ा और मकान.. !  ईमानदारी की निति अपना कर  सर से पांव पसीने में डुबाकर करता जाता अगणित काम मूलभूत आवश्यकताओं को  करना है पूरा, रह जाता कई  ख्वाब भी अधूरा. खुद को तराशते. हालात को संभालते मुश्किलों से उबरते  ढुंढ लेते हैं अपना मुकाम  हार जीत जीवन का हिस्सा लिखते जाते अपना किस्सा कौन कहाँ किसको दे पाता बिन रोटी के अतुलनीय ज्ञान कहाँ ठौर मिलता है जमीं पर गर ना हो अपना एक मकान? अनगढ कहानियों की तरह  उलझा है इंसान ..  प्राप्त करने को "रोटी कपड़ा और मकान" !!

युगप्रवर्तक स्वामी विवेकानंद

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पथप्रदर्शक, मार्गदर्शक..  कर रहे तुझको नमन्!  हो प्रणोता ज्ञान के  युवाओं के आधार स्तंभ!  १२ जनवरी १८६३ को जन्मा  इक ज्वाला प्रचंड!  बालक बने "नरेंद्र नाथ" गुरु राम कृष्ण परमहंस! माता "श्रीमती भुवनेश्वरी जी" परमधर्मगति ज्ञानी थी!  पिता  "विश्व नाथ दत्त" जिनकी पुत्र प्रेम में सानी थी!  हुआ विसम संयोग प्रबल  सान्निध्य तात का छूट गया!  हंसता गाता बालक वो दायित्व बोध में टूट गया!   अतिथि सत्कार में पारंगत आपकी छवि अनुपम थी!  स्वप्नदृष्टा आप ..  किर्ति आपकी सघन विरलतम थी!  जातिवाद को किया परे अध्यात्म वाद में समरसता!  मानवतावादी धारा में रमे हुए थे , दूर किया पाश्चात्य सभ्यता!  राजयोग, भक्तियोग, कर्मयोग के संवाहक आध्यात्मिक गुरु आप हुए  राम कृष्ण मिशन के संस्थापक!  संभाषण अमेरिका में  आपका परचम लहराया!  "मेरे अमरिकी भाईयों बहनों " श्रवण श्रव्य उर में छाया!  ४ जुलाई  १९०२ को डुब गया  अस्तांचल में एक सितारा !  अमर हुआ जन के मन में  पर हिम्मत कभी न हारा!...

हो हमारे अन्नदाता तुम किसान हो

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वसुंधरा की आन तुम धरती के भगवान हो  तेरी काया वज्र जैसी तेरे कायल समीर पावक  तु नही विचलित कभी है पशु संग में और शावक  तेरी घोर तपस्या से मिलता है अन्न सुअन्न   आसमान सा लगता तुझको छोटा सा भूखंड सर्दी की ठिठुरन तेरी है, तपती सांझ दोपहरी  भादो का बरखा तेरे संग मिल गाता स्वर लहरी  दिवस है तेरे श्रम का संगी रजनी का तु प्रहरी  धीर अधीर होय ब्याकुल सा तु मानव का सहचर  श्रम अनुरूप परिणाम न मिलता दशा ब्यथित कर देती  धरा सुवासित तेरे दम विकल चित्त कर देती  हे धरती के  देव तुम्ही हो जग के पालनहार  तुझ सा कोई नृप नहीं होगा तू है तारणहार.!