वृध्दाश्रम भाग- 8
पापा जी के मन को थोड़ी राहत मिली.. अमन को हमारे जाने से कोई एतराज नहीं है.! रक्षाबंधन नजदीक है.. वहाँ से अभिनव के साथ जाकर अर्चना के पसंद का गिफ्ट भी खरीद लूंगा..कितनी भोली है अर्चना..अपनी माँ जैसी..इतना स्वस्थ हूँ मैं..फिर भी उसे दूबला ही नजर आता हूँ.. यहाँ बाहर निकलने का कोई मार्ग नहीं नजर आता.. अमन बड़ा आदमी हो गया है.. उसके पास फूर्सत भी कहाँ है अब..इसमें बुरा ही क्या है..? मैं भी तो यही चाहता था..बहू- बेटे सुखी हैं इससे बड़ी खुशी और क्या हो सकती है !" पापा जी को अमन का बचपना याद आने लगा और चेहरे पर मुस्कान आ गई! फोन के रिंग ने अतीत से पुनः वर्तमान के धरातल पर ला दिया! अभिनव का फोन था.! पापा जी फोन रिसीव करते ही बोल पड़े - "हाँ बेटा! कैसे हो?" पापा जी की उत्साहित ध्वनि आई! "पापा जी प्रणाम!" "सुखी रहो बेटा!" "घर आ गए हो न?" "नहीं पापा जी! रानी को बेडरेस्ट की जरूरत है.. पिछले हफ्ते इसके मम्मी के पास लेकर आया हूँ.. डीलीवरी तक रानी यहीं रहेगी!" और मैं भी.. घर आता जाता रहता हूँ..आप भईया के पास हैं तो मुझे आपकी चिंत...