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मंजिल दगा कर गयी ।

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करीब ही थी मंजिल जरासी  चंद सांसे कुछ दगा कर गयी । उस पार तलक थी साथ जरासी  जिने की वजह  दगा कर गयी । निगाह मे समाये असमान को वो सपने  जब दगा  कर गयी । बता किस दौर से गुजर रही वो उस पनाह से छाव दगा कर गयी । बारिशों के मौसम मे तडपती जो पलकोंतले बसीं आह दगा कर गयी । ओस की नन्हीं बूंद बनकर आयी जो  वो बरसात की आँधी दगा कर गयी । बेगुनाह अल्फ़ाज सता रहे यूही  वो हर अरमान से दगा कर गयी । वो भीगी रात अर्दास कह रही  जिंदगी से उम्र कुछ खफा हो गयी । तोहम्मते  लाख लगायी गयी जो जिंदगी के इरादे कुछ  दगा कर गयी । ✍@Sari  ©️®️सारिका ऐवले।

ना सोच की

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घिरी आज सावान की वो लडी बरसात है महक रही इन साँसो मै वो सुगंध बाकी है | जहां में एक मैं ही नही हर शक्स परेशान है सोच पर कर लू हासीले जित उसिमे उल्झी है| गहरी हुयी खायी की तरह हर गहरी सास बतियाती है रुकी हुयी धिमी चाल से राह भी दर्द सहलाती है| सोच  का वह भवरा कही सवाल किये है  बे गुनाह वो कसक दिल मै चूभन दिये जा रही है| कहा कुछ नही उन निगाह से निगाह कुछ पुछ  रही है  बेगाने ना थे वो  गिली दामन की छोर पुछ रही है  क्यों सोचू तिणके सा भी मतलब नही रहा जो  क्यों सहू इतना जब सोच पर अमल नही है बेहिसाब ही सही जिये जा जरासी ए जिंदगी  ना सोच की सोच का कोई सिरा नही रहा है  पल भर की एहसास में कई  दफन मायने है... अभी  सही तो अभी बुरा ठहरा रही है...  ✍@Sari  सारिका ऐवले.  @sarikaaiwale