ना सोच की


घिरी आज सावान की वो लडी बरसात है
महक रही इन साँसो मै वो सुगंध बाकी है |

जहां में एक मैं ही नही हर शक्स परेशान है
सोच पर कर लू हासीले जित उसिमे उल्झी है|

गहरी हुयी खायी की तरह हर गहरी सास बतियाती है
रुकी हुयी धिमी चाल से राह भी दर्द सहलाती है|

सोच  का वह भवरा कही सवाल किये है 
बे गुनाह वो कसक दिल मै चूभन दिये जा रही है|

कहा कुछ नही उन निगाह से निगाह कुछ पुछ  रही है 
बेगाने ना थे वो  गिली दामन की छोर पुछ रही है 

क्यों सोचू तिणके सा भी मतलब नही रहा जो 
क्यों सहू इतना जब सोच पर अमल नही है

बेहिसाब ही सही जिये जा जरासी ए जिंदगी 
ना सोच की सोच का कोई सिरा नही रहा है 

पल भर की एहसास में कई  दफन मायने है...
अभी  सही तो अभी बुरा ठहरा रही है... 


✍@Sari 
सारिका ऐवले. 
@sarikaaiwale

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