गलती भाग ३० अंतिम भाग
दिन पर दिन गुजरते गये। घर में दया मात्र एक कमरे में सिमट गयी। बार बार अपनी ही गलती सुनते सुनते वह खुद को गलत भी मानने लगी। हाॅ... ।सच में मैं गलत क्यों नहीं हूँ। क्या पैसे की चकाचौंध में मैं अंधी नहीं हुई थी। जिस तरह आज मेहनत कर अपनी बेटी का पालन कर रही हूँ, उस समय नहीं कर सकती थी। मैं क्यों उस अनुचित का विरोध नहीं कर पायी, जिसका विरोध करना अति आवश्यक था। मुझे आखिर लगा ही क्यों कि शुचि के भविष्य के लिये मुझे किसी पुरुष के सहारे की आवश्यकता है। और वह पुरुष भी कौन... । वही जिसके बहशीपन का मैं खुद शिकार थी। पक्का तो नहीं, पर संभव है कि वही शुचि का वास्तविक पिता है। सही ही है कि मुझे ऐसे धूर्त के खिलाफ मुंह खोलना चाहिये था। फिर गलती तो मेरी ही है। इसमें असत्य कहाँ..। जाड़े आ गये। दया सुबह सुबह काम के लिये निकलती। काफी समय से अभ्यास की कमी और कुछ उम्र का भी प्रभाव, सर्दी की चपेट में आ गयी। फिर भी रोज का काम करना चलता रहा। खुद के लिये लापरवाही बढती गयी। और एक दिन वह बिस्तर पर ऐसी लेटी कि फिर दिन भर न उठी। सौम्या आतुर थी कि कब दया कमरे से बाहर निकले और उसे आज के हिस्से का ...