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Showing posts with the label Renu Singh

रिश्तों की डोर हो रही कमज़ोर

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बदलते रिश्तों की आज बदल गई बिसात धीरे धीरे खुद हमने ही कर लिया बर्बाद मात पिता को भाते नही अब बच्चे हम दो हमारे दो से जो हो गए अब हम दो हमारे एक ही अच्छे बुजुर्गो से रहा नहीं अब मोह लगाव सबको अच्छा लगे सिर्फ मनोरंजन अपना घर में बड़े बड़े हो गए कमरे दादा दादी मगर वृद्ध आश्रम में रहते  भाई बहन की किसको अब जरूरत  ऑनलाइन बनाते मां ,बाप ,बहन घर की दीवार पर रंग लगाए अनेक छत मगर अनजान रहती हर लबरेज संग बैठे से होती नही अब कोई बात  दूर संचार पर होती बात हज़ार  समय बदला हो गए सब आधुनिक अपने आप बजा रहे अपनी अपनी बीन लडकी को चाहिए अब घर में  न सास न ननद न देवर  पिया संग वो रहे इतना हो प्रबंध भुल गए रिश्तों की सब मिठास नमक घोल कर पानी में कर रहे  मीठे फल की आज हर कोई आस ।।।। रेणु सिंह राधे  कोटा राजस्थान

सांझा चूल्हा

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सांझ ढले ही हो जाती है चहल पहल आज भी उस घर में आती है सहर  खुशबू मीठी नोक झोंक की आवाज़ बच्चो के लिए हो जाती हैं आज भी मोज हो गए लाख हम दो हमारे दो से परिवार मेरे घर में अभी भी कायम है वो प्यार सांझा चूल्हा जब मेरी मां जलती है  प्रेम ही तो है उनका वो मनुहार कर  एक एक को छक कर खिलाती है  चाचा चाची कभी नाक मुंह बनाते भी है एक मेरी दादी ही है जो डांट कर लाइन पर ले ही सबको आती है  मेरे पापा ने कभी मम्मी संग  कमरे में खाना नहीं खाया  सबके बीच आंगन में गप्पे लड़ाते हुए स्नेह का परम सुख ही पाया , मेरे घर में आज भी सांझा चूल्हा ही जलता आया...... ©रेणु सिंह राधे ✍️

योग

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कभी कभी नहीं करो तुम रोज़  काम का बहुत है भईया योग  तरोताजा महसूस होगा तुमको हर पल  आज को ठीक करो बेहतर होगा कल मनुष्य के शरीर में होती सात गर्न्थी एक एक को खोलो पा लो रोग से मुक्ति मृत्यु तो आनी है एक दिन आएगी  योग है जो अन्त तक स्वस्थ्य रख पाएगी पूरे विश्व ने माना आज यह अहसान भारतवासी तू भी कर ले अपना कल्याण  © रेणु सिंह राधे ✍️ कोटा राजस्थान

भीड़ से अलग

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भेड़ चाल में माना होती राह आसान भीड़ से अलग जो चलते ,दिखाते कमाल न ख़ुद का रास्ता न मंजिल की ख़बर पत्थर तोड़ निकलते ,वही पहुंचे शिखर कहने को आजाद है हर कोई आज यहां अपने किरदार को जीवंत करे, छू ले आसमां अलग अपनी हस्ती रख अलग अपनी पहचान ख़ुद के हौसलों से होती असली उड़ान  सौ रूकावटे माना रोकेगी तेरे अरमान  हर हार को जीत का प्यादा तू चल मान।। रेणु सिंह राधे कोटा राजस्थान

चौदहवीं का चांद

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रीया आज पहली बार अकेले सफ़र कर रही थी ,उसे बी इड के पेपर देने दिल्ली अपनी बुआ के घर जो जाना था  गाड़ी के चलते चलते ही वो पहुंची थी। जल्दी बाजी में वह अपनी सीट भी नहीं ढूंढ पाई और जहां खाली सीट मिली वहीं बैठ गई। तभी एक युवक भागता भागता गाड़ी में चढ़ा और उसके पास वाली सीट पर आकर बैठ गया वह दोनों ही अपने सीट नंबर से गलत सीट पर बैठे हुए थे जैसे ही गाड़ी चली और टीटी आया उसने दोनों को वहां से उठाते हुए बोला कि यह आप दोनों की सीट नहीं है अगले कंपार्टमेंट में आपकी सीट है वहां जाइए दोनों ने ये सुनकर एक दूसरे की तरफ देखा और चल दिए दोनों की सीट वहां भी पास पास ही थी  दोनों एक दूसरे से बातचीत करने लगे और दोनों को एक दूसरे का साथ अच्छा लग रहा था  जयपुर से दिल्ली का सफर कैसे गुजर गया पता ही नहीं चला। दोनों के दिल में एक दूसरे के लिए भावनाएं जन्म ले रही थी जहां रिया बहुत ज्यादा सुंदर नहीं थी परंतु उसकी बड़ी बड़ी आंखें और सादगी, रोहन के मन को भा गई थी वही रिया को भी रोहन का हसमुख स्वभाव भा गया था  जैसे-जैसे दिल्ली पास आ रहा था दोनों को एक दूसरे से दूर जाने की बेचैनी हो रही थ...

प्रेम की निशानी

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एक कली मासूम सी  दुनियां के रंग से  अंजान सी रखा पहला कदम यौवन में  अपने ही आप में मग्न सी, दूर देश से आया कोई भंवरा हो गया देख उस कली को मुग्ध मोहित रख दिया दिल  रूप उसके पर मर मिटा विनती तरह तरह से करने लगा खाई कसमें और दी वादों की दुहाई पल पल की , देख भोली सूरत पिघल गई न मन में छिपी दुष्टता देख सकी, पी रस यौवन और इज्जत का उस गया न जाने कहा वो हरजाई, प्रेम की निशानी समझ पाल रही कोख में वो अपने प्रीतम की  दुनियां को लगे पाप किया है दुत्कार बारंबार लगातार रही , सोचती , लगातार समझती  एक स्त्री पुरुष का प्रेम मिलन  फिर कसूरवार अकेली वो कैसे बनी , युग दर युग बीत गए आई  बार समझ न आज भी ।।।।। © रेणु सिंह राधे ✍️

पर्यावरण बचाओ

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पेड़ पौधे लेते  रहे आकर जमीन का यही है विस्तार  काट काट कर पेड़ पौधे ऊंची ऊंची रिहायशी इमारतें  बना ली एक के ऊपर एक  न छोड़ा बाग , न छोड़ा खेत  पक्षी बेचारे ढूंढ रहे सहारा  कुछ तो रहने दो उनका सहारा  पर्यावरण संरक्षण गर करोगे अपने लिए ही अच्छा तुम करोगे  मत करो गंदा अपनें आस पास  जीवन जीने दो प्रकृति को भी आज एक संतान एक पीढ़ी तक तराएगी पेड़ को संतान मानो युगों युगों तक प्रताप इंसान को वो दिखाएगी  कर लो भाई इतना तुम काम  पर्यावरण को बचाओ ,  बचाओ खुद को आज  🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱 © रेणु सिंह राधे ✍️

सास बहू की जुगलबंदी

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आज नई बहू घर मेरे आई सास ने ले ली बड़ के बलाई सास यू बोली सुन ले रानी  घर मेरा है बेटा मेरा रहे  ध्यान ये तेरा । सासु जी सब बातें समझ मैं गई अब यह भी बता दो, रहूं के नहीं । ( सास )घर में  मेरी रहती सरकार  (बहू) आपका पूरा हो गया अब व्यवहार (सास) एक एक पत्थर जोड़ बनाया (बहू ) तो फिर दहेज़ किस लिए मगाया , (सास),बेटा मेरी तरफ ही रहेगा  ( बहू ) वो भरतार मेरा ,मेरा रहेगा , (सास ) दूंगी नहीं मैं घर की चाबी  (बहू)  दब के तो मां जी मैं न रहूंगी  (सास) तेरे ससुर ने गांव बसाया  ( बहू) मेरे पिया ने  उसको सजाया  (सास) सेवा मेरी करनी पड़ेगी  (बहू ) सुन बुढ़िया तू अब यहां न रहेगी  (सास) जोड़े तेरे दो दो हाथ  घर तेरा , बेटा तेरा ,रहने दे हमे साथ ।।। © रेणु सिंह राधे ✍️ कोटा राजस्थान

तेरे जाने के बाद

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तेरे जाने के बाद  किसी को न अपना बनाया  जो तू नही रहा पास मेरे किसी को न इस दिल में बसाया । हवाओं में भी कोई न छाया  किसी का न पैगाम मन में बसाया किसी भी राह में गई मैं रास्ता तेरी गली तक ही सिमट आया। वो सूखा गुलाब जो था तुमने दिया किसी भी ताजा गुलाब से कम न हुआ काटे तो चुभाए उसने मगर उस सा इश्क किसी से न हुआ  आखों से आसूं अब आते नहीं किसी गम का असर अब न हुआ थाम लिया अब हाथ गर्दिशो का  चांद तारों से भी अब रौशन न हुआ । अरमान जो अटखेलियां करते थे किसी बात पर अब रश्क न हुआ तू जो गया मेरी ज़िन्दगी से "राधे " क्या बताए तुझे क्या क्या न सितम हुआ  रेणु सिंह राधे ✍️ कोटा राजस्थान

अपना शहर

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अपना शहर छोड़ कर      तेरे साथ चलें है ए ज़िंदगी अब फाके मिले राहों में      या तू दे दावतें ए ज़िंदगी  वो बस्ता , वो पेन ,वो कागज़      तब बोझ लगता था ए ज़िंदगी अब रोटी , कपड़ा और मकान    न जाने कितने ओर बोझ ए ज़िंदगी  रुकती , हाफती, तड़पती सांसे     तब जीए तो क्यू कर ए ज़िंदगी एक के बाद एक तोहमदे      न जाने कितने बवाल तेरे ए ज़िंदगी  मां मेरी थी तो बलाए लेती      तब छू भी न पाए तेरे सितम ए ज़िंदगी अब ख़ुद को कहां कहां से        बचा कर लाए बेखौफ बता ए ज़िंदगी  © रेणु सिंह राधे ✍️ कोटा राजस्थान

संस्कार

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अपने बुजुर्गो का जो करता सम्मान जग में उसका होता बंधु बड़ा नाम   नींव का एक एक पत्थर जिसने लगाया अपने प्रेम से परिश्रम से घर को घर बनाया  अनादर करना उसका होगा नहीं कल्याण अपने सर पर सदा महसूस करो आशीर्वाद  माता पिता का कर्ज़ उतार सकते नहीं  सेवा करो दिन रात यहीं जीवन आधार  आज करोगे तो कल मजबूत होगा  आने वाली पीढ़ी का बच्चा संस्कारवान होगा © रेणु सिंह "राधे " ✍️

प्यारी माँ

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मेरी प्यारी मां ,,,  सपनों सी न्यारी मां हो पास तू अगर  कुछ नहीं फ़िर चिंता है तेरे आंचल के तले  सब कुछ मुझे मिला है  किया बहुत परेशान तुझे सब यहीं बताते है बचपन के दिन तो याद नहीं पर गर्माहट लाड प्यार की आज भी महसूस कराते हैं,,,,,, मचा ढोंग जाने कैसा , कैसा राग अलाप है जग सारा आज पुज रहा आज सबको मां की दरकार है रोक रखा था अब तक किसने, जो आज ही मां संग फ़ोटो खिंचवाई है नैन बेचारे तरस गए पग निहारने को दो टुकड़े सुकूं के दिए नही कभी आज हाथ बड़े कैक खिलाने को  उसका कोई दिन कैसे होगा  जिसके होने से अस्तित्व तेरा है नहीं चाहती कोई दिन हो उसका एक एक पल तुमको पुकारती दो बोल सुबह शाम प्यार के बस इतना तोहफा वो चाहती  बस इतना तोहफा वो चाहती..... © रेणु सिंह राधे ✍️ कोटा राजस्थान

मजदुर दिवस

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मजदूर हूं मजबूर नही  करता हूं मेहनत जी हजूरी नही ,,,, अपने हाथो पे बस भरोसा  किस्मत तो मेरी रंगीन नहीं ,,,, लाखों के मैं महल बनाऊँ मेरे लिए माना  कोई घर नहीं ,,,, करो न गुरूर अपनी दौलत पर सोचना तुम कैसे होते ,होते हम नहीं,,, देश से लेकर दुनियां तक हम हैं हीरा भी न निकलता खोदते हम नही,,, अपनी दुनियां में कुछ जगह रखो  रुकते सारे काम , करते काम गर हम नहीं,, रेणु सिंह राधे कोटा राजस्थान

सब से पहले पूजो

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आज कल का जमाना यही है भाई सबसे पहले पूजो  तुम लुगाई  घर के सारे काम करो  देवी जी को खुश रखो  वो हुई नाराज तो समझ लेना अच्छी खासी शामत तुम्हारी है आई  उसको खिलाओ दूध और मेवा तब समझो मिले तुम्हे कलेवा  ज्यादा ऊंची जो तुमने आवाज लगाई समझो बेटा तुम्हारी फिर राम दुहाई  वो कहे सर दबाओ वो कहे तो पैर उसको रखो खुश , नही तो समझो  सब से अब होगा बैर  मां बहन अब तुम्हे याद आई करती थी जो सदा तुम्हारी अगवाई अब बेटा बारी तुम्हारी आई  सबसे पहले पूजो तुम लुगाई  सब से पहले पूजो तुम लुगाई .... रेणु सिंह राधे  कोटा राजस्थान

दूर अब न वो रात है

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खेल खिलौने दुनियां के      न कोई दिल बहलाने का सामान है मिट्टी से बने हैं बेशक       न मिट्टी के खिलौने न उसके समान है स्त्री होना सुन ए दुनियां       बिल्कुल भी न समझना आसान है  कठोर तपस्या है जीवन        हर दीन जैसे उठता कोई तूफ़ान हैं कठोर हूं मैं पाषाण सी      पुष्प सी फिर भी मेरी पहचान है  जानें कहां से लाऊं वो दिल       जो माने राम (पति)आज भी महान है  खेला रौंदा फिर फेंक दिया       स्त्रीत्व का न कोई तुझे ध्यान हैं हर दिल में खौफ पैदा कर देगे    सुन,,, दिन वो दूर न दूर अब वो रात हैं रेणु सिंह ’राधे ’ कोटा राजस्थान

आधियांँ

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आज के दौर में,,, अपनापन चाहते हो पागल हो क्या,,, धूप में छावँ चाहते हो  अपने भी जब ,,,,, अपने न रहे " राधे "  ऐसे अपनों से,,,, बेकार ही स्नेह चाहते हो रंग होली के ,,,, बदले न ऐसा चाहते हो भेष में शैतान,,, आवरण उतारना चाहते हो लगी द्वेष की,,, अंतर्मन झूठ लाना चाहते हो कल जिसे खोना ,,, उसे ही  पाना चाहते हो आधियाँ रोक ले,,, ऐसा दीपक जलाना चाहते हो रख हिम्मत अब,,,,देखना होगा वहीं जो तुम चाहते हो © रेणु सिंह राधे,✍️ कोटा राजस्थान

नारी तू महान

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तेरी मुस्कुराहट से होता घर में मान नारी तू महान , नारी तू महान , नारी तू महान सास बहू , मां बेटी बन रहे एक जान  उस दिन नारी तू महान , नारी तू महान गेरो की संस्कृति के लिए न कर अपमान अपनी धरोवर पर हो कुर्बान तब नारी तू महान विज्ञापन का नंगा नाच बंद कर , उठा आवाज अपनी बात रख बेहिसाब , तब नारी तू महान अत्याचारी , बलात्कारी का कर वहीं हिसाब  न रोना , न धोना तब नारी तू सचमुच महान आन पर आईं काली का रूप ले धार एक बार फिर देख अबला नारी तू महान , नारी तू महान नर नारी दो ही बगिया के फुल यह  पहचान भेद मिटा यह ,उस वक्त नारी तेरी जय जय कार हाथ पकड़ एक दूसरे का हो जाए नैया पार नारी तू महान , नारी तू महान , नारी तू महान © रेणु सिंह राधे,✍️ कोटा राजस्थान

नमन स्वर कोकिला

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एक नन्ही कली आस्मां से आईं मग्न हो भाई बहनों में खुशियां पाई समय का ऐसा भयानक रूप देखा  ज्यादा कुछ समझ कहां वो  पाई  बड़ी थी छोटी उम्र में बड़ी जिम्मेदारी उठाई रख अपने को पिता की जगह करने लगी कमाई करती क्या काम कुछ ना था गीतों की दुनिया में आई आवाज में उसकी लगता जैसे सरस्वती खुद उतर आई एक के बाद एक  उसने कर दी गीतों की अगुवाई आएगा आने वाला से सफ़लता का बिगुल बजाई ए मेरे वतन के लोगों से जवाहर लाल जी की आंख भर आई सात दशक तक जिनके गीतों ने धाक जमाई  हुनर खटका आंखो में कर दी धीमे जहर से रुसवाई हार फिर भी मानी नहीं ऐसी हिम्मत थी पाई हर आवाज में लाखों लोगों के दिलों में छाई अनगिनत सम्मान खुद छोटे थे जिनके सामने ऐसी महान स्वर कोकिला ने आज देह छुड़ाई आत्मा की आज उस परमात्मा से होगी मिलाई  शत शत नमन स्वर कोकिला लता मंगेशकर जी को 💐💐🙏🙏🙏 © रेणु सिंह राधे कोटा राजस्थान

मेरी बिंदिया रे

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जब चमकती है चमचम  मेरी बिंदिया  चांदँ सूरज जैसे मुखड़े पर सजे  आती है लाज मुझको  साजन  जब जब तू प्यार से आलिंगन करें  कानों की बाली चूमे गाल  बालों की लट झूम झूम इतराएं  गले में जब हो तेरी बाँहे  मेरा रोम रोम खिल जाए  नजरों से तेरी जब मेरी नज़रे मिले  हो समय वो रंगीन प्रिय  जब तू मेरे साथ हाथ पकड़ कर चले  सारी दुनिया हो मेरे साथ प्रियतम  जब तेरे क़दमों से मेरे कदम मिले  मेरे सोलह श्रृंगार तुम से  तुम से ही मेरी सुहाग की मांग सजे तुम धूप , तो मैं तेरी छाया साजन  तुम से ही तो मेरे सातो जन्म खिले ,,,, © रेणु सिंह " राधे " ✍️ कोटा राजस्थान

आख़री ख़त

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सुन मांँ, आज लिखने को एक ख़त  दिल बड़ा बेचैन है ,,, आई ख़बर सरहद पर देश की घात लगाए बैठा दुश्मन है,,, रोज़ सुबह सिमरन प्रभु का शाम को यादों में मुलाकात है,, गर्मी सर्दी बरसात की कोई फिक्र हर मौसम अपने लिए ख़ास है,,, ख्वाब देख बहुत तेरे बेटे ने भी बेरंग , रंगीले ख्वाबों के अहसास बुलाती है मुझको भी वहीं अपने पास आना चाहता हूं छोड़ कर यह वीरानी फ़र्ज़ रोक लेता है हर बार यहीं,,,, हो जाए चैन ओ अमन चारों तरफ़ जान मेरी चली जाए कल या परसों और कितने ही बेटे तैयार है ,, दुख़ किसी बात का मनाना मत मां लिख रहा हूं ख़त याद तुझे कर सीने से लगा फ़िर सुला देना  आऊ चाहे पैरों पर या अर्थी पर गर्व से माथा चूम सहला देना मां ,,,,, © रेणु सिंह राधे  कोटा राजस्थान