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पांवों की थिरकन

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पांव भी तभी थिरकते हैं जब  दिल खुशी से ता ता थैया करता है  ये दिल का उत्साह ही तो है जो  पांवों को थिरकने पे विवश करता है  कोई भगवत् भक्ति में थिरकता है  कोई पेट भरने के लिए थिरकता है  कोई कोई तो अपने आका के लिए  बस, एक पांव पर ही थिरक लेता है  पांवों को थिरकने के लिए घुंघरुओं की नहीं  केवल आत्मिक खुशी की दरकार होती है जब मन में आनंद का सागर उमड़ता है तो  पांवों में भी सरगम की सी झंकार होती है  एक गृहणी के पांव दिन भर थिरकते हैं  पति और बच्चों की एक मुस्कान के लिए  वह अपने सारे शौक भूल के लगी रहती है  अपने छोटे से संसार की सार संभाल के लिए  जीवन का एक ही मंत्र है यारो  खुशी दो और बदले में खुशी लो  अब ये फैसला तुम्हें करना है कि  पांवों को थिरकने दो या समेट लो  हरिशंकर गोयल "हरि" 

भुतहा मकान : भाग 2 बिना सिर वाला भूत

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राजन बड़ा आश्चर्य चकित था उस भूत के पदचाप की रिकॉर्डिंग को सुनकर । उसके मुंह से बोल नहीं निकले । कहीं उसका इस मकान को किराये पर लेने का निर्णय उसके लिए घातक तो सिद्ध नहीं हो जाएगा ? अब तक उसने सुनी सुनाई बातों के आधार पर ही अपनी धारणा बनाई थी कि भूत प्रेत नहीं होते हैं पर यहां तो भूत की पदचाप की आवाज रिकॉर्ड होकर सुनाई भी जा रही है । अब तो मानना ही चाहिए कि भूतों का अस्तित्व है । बड़े असमंजस में फंस गया था राजन । अब तो मकान किराए का तीन महीने का एडवांस भी दे दिया था उसने । यदि अब वह इस मकान में नहीं रहता है तो तीन महीने का किराया जब्त हो जाएगा । इतना नुकसान उठाने की स्थिति में नहीं था राजन । अब तो कम से कम तीन महीने रहना ही पड़ेगा उसे इस भुतहा मकान में । वह अभी इसी उधेड़बुन में उलझा हुआ था कि रमा बोली "वैसे वह भूत इतना दुष्ट भी नहीं है । शुरु शुरू में तो वह केवल डराता है जिससे लोग मकान खाली कर जाएं । मगर फिर भी कोई अगर नहीं डरे और मकान छोड़कर भाग नहीं जाये तो फिर वह उस पर हमला करता है" । रमा की आंखों में भयानक भय व्याप्त था । डर के मारे उसकी आवाज भी लड़खड़ा गई थी ।   ...

अपना बना लो

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चूड़ी बोले कंगना डोले  मनवा क्यों खाए हिचकोले  हार सिंगार कुछ ना सुहाए  दिल में भड़क रहे हैं शोले  तुम बिन सजन मैं कुछ नहीं  ये ठंडी पवन क्या कह रही  रिमझिम सावन तड़पा रहा  काश कि तुम होते यहीं कहीं  बिजली बैरन अगन लगाए  कारे कारे बदरा मुझे डराए  मौसम बेईमान मन ललचाए  आंचल उड़ उड़ तुझे बुलाए  सब सखियों के कंत यहीं हैं  एक मैं ही विरहिन घूम रही  सावन के संग अंखियां बरसे  अंसुअन के मोती चूम रही  तुम बिन सूनी सेज पडी  राह तकूं मैं द्वार खड़ी  दिन गुजरे ना रैन कटे  दुख की बदली नाही छंटे  दो रोटी में सबर कर ले  कुछ तो मेरी खबर ले ले  विरह में यौवन गुजर ना जाये  ना जाने हाय, कब तू आये  कहीं सौतन तो नहीं कर ली  बैंया किसी की तो नहीं धर ली  आजा बैरी , उड़कर आजा  मोहिनी मूरत मुझे दिखा जा  चाहे फिर वापस चले जाना  सास ननद के सह लूंगी ताना  ऐ री पवन , पैगाम ले जाना  संग ही उनको लेकर आना  हरिशंकर गोयल "हरि" 

भुतहा मकान भाग : 1

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राजन का स्थानांतरण रामनगर में हो गया था । बड़ी समस्या थी कि राजन अपने परिवार को रामनगर शिफ्ट नहीं कर सकता था क्योंकि उसके बच्चे बोर्ड की परीक्षा दे रहे थे । इसलिये उन्हें डिस्टर्ब करना ठीक नहीं था । राजन की पत्नी सुनंदा बच्चों को छोड़कर राजन के साथ जा नहीं सकती थी । इसलिए राजन को अकेले ही रामनगर जाना पड़ रहा था ।  रामनगर में अब राजन को अपने लिए एक आशियाने की तलाश करनी थी ।रामनगर में मकानों का किराया बहुत ज्यादा था । राजन के लिए दो दो मकान अफोर्ड करना भारी पड़ रहा था लेकिन मजबूरी थी । राजन ने एक "टु लेट सर्विस" की सेवाएं ली । उसने राजन को बहुत से मकान दिखाए । मगर किसी में कोई सुविधा नहीं थी तो किसी में प्रॉपर वैन्टिलेशन नहीं था । जिसमें सब कुछ ठीक था उसका किराया बहुत ज्यादा था जिसे राजन अफोर्ड नहीं कर सकता था । बड़ी समस्या हो गई थी राजन के लिए । लगभग दस दिन हो गये थे मकान ढूंढते ढूंढते , मगर अभी तक कोई मकान फाइनल नहीं हो पाया था । दस दिनों से वह एक होटल में ठहरा हुआ था । उसका किराया और खाने पीने का खर्च भी बहुत ज्यादा था । राजन को जल्दी से मकान के बारे में कोई निर्णय क...

बहू पेट से है भाग 17 : प्रहसन

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आज लाजो जी ने ठान लिया था कि वह प्रथम और रितिका से बच्चे के बारे में बात अवश्य करेगी । अमोलक जी भी घर पर आ गये थे इसलिए उनके कंधे पर बंदूक रखकर दागी जा सकती थी । उन्होंने प्रथम और रितिका को शाम की चाय के लिए आवाज दी । दोनों जने डाइनिंग टेबल पर आकर बैठ गए और चाय सिप करने लगे ।  नीरवता भंग करते हुए लाजो जी बोलीं "दोनों जने बैठे हो एक साथ , इसलिए आज मुझे साफ साफ बताओ कि मुझे मेरा पोता कब मिलेगा" ? भारत में अभी भी लड़के का चार्म बना हुआ है । तालाब में जैसे किसी ने पत्थर फेंक दिया हो और कंपन हो रही हो । ऐसे में लहरें उठना तो स्वाभाविक है । आजकल बच्चों को लगता है कि उनके निर्णयों में किसी का दखल नहीं होना चाहिए । किसी कि मतलब किसी का भी   । आजकल माता पिता "किसी व्यक्ति" में तबदील हो गये हैं ।  लाजो जी कहने लगीं । दोनों जने ध्यान से सुन लो । शादी को पांच साल से भी ज्यादा हो गये हैं । मैं अब और अधिक इंतजार नहीं कर सकती हूं । इसलिए इसी साल मुझे एक बच्चा चाहिए  । आप भी तो कुछ बोलिए ना । मैं ही बकबक किए जा रही हूं" । लाजो जी ने अब अमोलक जी को बीच में घसीटते हुए कह...

मुझे माफ करना भारत मैं तेरा अपना बिहार हूं

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थोड़ा अराजक थोड़ा सा हिंसक थोड़ा लाचार हूं  मुझे माफ करना भारत मैं तेरा अपना ही बिहार हूं  मेरी संतति की बुद्धि पर पूरी दुनिया को नाज है  मेरे नौजवानों की आसमानों से ऊंची परवाज है  "नालंदा" जैसी ख्यातिप्राप्त संस्था का पालनहार हूं  मुझे माफ करना भारत मैं तेरा अपना ही बिहार हूं  मैंने जे पी आंदोलन भी देखा था जब आपातकाल था  दमनचक्र में पिसता यौवन जन जन जीवन बेहाल था  "मीसा" की चक्की में पीसा, मां भारती का श्रंगार हूं  मुझे माफ करना भारत मैं तेरा अपना ही बिहार हूं  मैंने इसे जंगलराज बनते हुए करीब से देखा है  अपहरण उद्योग से बर्बाद होते लोगों को देखा है  चारा चरने वाला बस मैं ही तो इकलौता परिवार हूं  मुझे माफ करना भारत मैं तेरा अपना ही बिहार हूं  "सुशासन बाबू" कब "कुशासन बाबू" बने पता नहीं चला  सत्ता के लिए जाति, धर्म, अगड़ा पिछड़ा सब खेल खेला  आज के हालातों का भैया मैं ही तो सूत्रधार हूं  मुझे माफ करना भारत मैं तेरा अपना बिहार हूं  हरिशंकर गोयल "हरि" 

बहू पेट से है भाग 16 : लिफाफा संस्कृति

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"हरि अनंत हरि कथा अनंता" की तरह "लेडीज क्लब" की बातें भी अनंत होती हैं । कभी भी समाप्त नहीं होने वाले आसमान की तरह । इन बातों से पेट कभी भरता नहीं और भूख कभी मिटती नहीं । मगर समय की घड़ी तो टिक टिक चलती ही रहती है । जब शादियों की बात चल निकली तो भला लाजो जी कहां पीछे रहने वाली थीं । उन्होंने कहा "चाहे खाना खाओ या ना खाओ , लिफाफा तो देना ही पड़ता है । और सबसे बड़ी बात तो यह है कि चाहे शादी में जाओ या मत जाओ मगर लिफाफा भिजवाना ही पड़ता है । शादी का कार्ड आने का मतलब ही यही है कि लिफाफा भिजवाना है , चाहे आप आयें या नहीं । इसलिए मैं तो ऐसा करती हूं कि जब भी कोई कार्ड देने आता है, उसी को लिफाफा पकड़ा देती हूं और कह देती हूं कि 'भैया , अगर बन सका तो शादी में आ जायेंगे नहीं तो हमारा प्रतिनिधित्व ये 'लिफाफा' करेगा" । वह बंदा भी बड़ा खुश होता है कि भीड़ भी कम होगी और लिफाफा तो मिल ही गया है । कभी कभी तो लगता है कि लोग कोई भी आयोजन केवल लिफाफे के लिए ही तो नहीं करते हैं कहीं ? जिस तरह लिफाफों का चलन हर काम में होने लगा है उसे देखकर तो लगता है कि ...

बहू पेट से है भाग 15 : चलो, लेडीज क्लब चलते हैं

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लक्ष्मी जी को छमिया भाभी के बारे में होने वाली बातों में बड़ा रस आता था । दरअसल छमिया भाभी पर पूरे मौहल्ले के मर्द जान छिड़कते थे । बस यही बात लक्ष्मी जी को हजम नहीं होती थी । इसलिए वो गाहे बगाहे छमिया भाभी की बुराइयां करती रहती थीं । यहां पर छमिया भाभी उपस्थित थी नहीं इसलिए आज जी भरकर अपनी भड़ास निकाली जा सकती थी । मगर लाजो जी ने बात घुमा दी और वे इसे बच्चों पर ले गईं । इन बातों में लक्ष्मी जी जैसी औरतों को मजा नहीं आता था । उन्हें तो निंदा रस में ही मजा आता था । लक्ष्मी जी बात को घुमाकर छमिया भाभी पर ही लाना चाहती थीं इसलिए बोलीं  "ऐ जिज्जी, एक बात बताओ ? छमिया भाभी को गये तो कई दिन हो गये हैं तो उनके श्रीमान जी "भुक्खड़ सिंह" जी का खाना कौन बनाता होगा" ?  ललिता जी अब तक खामोश ही बैठी थीं । उन्हें छमिया भाभी से बहुत नफरत थी । नफरत ऐसे ही नहीं थी उसका कारण भी था । उनके पति दिलफेंक जी नाम के अनुरूप दिलफेंक ही थे । सुन्दरता में छमिया भाभी का कोई जवाब नहीं था । इसलिए दिलफेंक जी छमिया भाभी के सौंदर्य के जलवों में उलझ कर रह गये । छमिया भाभी के अप्रतिम सौंदर्य के...

अशांत मन

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मन में विचारों का तूफान सा उठा है  दिल में जज्बातों का कोहराम मचा है  दिमाग फंस गया है समस्याओं के भंवर में  झंझावातों से ये मन अशांत हो गया है  जीवन में आंधी तूफान जब भी आते हैं  ये अवश्य कुछ न कुछ तोड़ फोड़ जाते हैं  विचारों का ज्वार भी जब उठता है दिल में तब बेहिसाब तबाही के निशां छोड़ जाते हैं  अशांत मन से लिए गए निर्णय ठीक नहीं होते  दिलों में उठते तूफां किसी को सोने नहीं देते  जब मन में अन्तर्द्वंद्व का घमासान जारी हो  तब ऐसे हालात मंजिल तक पहुंचने नहीं देते  स्थिरचित्त मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है  गीता का सांख्य योग यही तो कहता है  सुख दुख में सम भाव , राग द्वेष से दूर  प्रभु की शरण में जाने से ही तो मिलता है  हरिशंकर गोयल "हरि" 

बहू पेट से है भाग 14 : गृहस्थ आश्रम सबसे कठिन तप है

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लक्ष्मी जी को अपनी कही हुई बात पर जवाब देते हुए नहीं बना तो यह कहते हुए बचने की कोशिश करने लगीं कि "एक बात बताओ जिज्जी कि पति के साथ घूमने में भी कोई आनंद आता है क्या ? अरे, एक ही सूरत देखते देखते बोर हो जाते हैं , एक की आवाज सुन कर कान पक जाते हैं । घर में भी वही और बाहर भी वही । अब आप ही बताओ जिज्जी कि क्या आप रोज रोज एक ही सब्जी खाते खाते बोर नहीं होती हैं " ?  लक्ष्मी जी की बात पर सब औरतें हंस पड़ी । ललिता जी कहने लगीं "तुमने गजब कर दिया लक्ष्मी जी । पति और सब्जी को एक ही तराजू में तोल दिया । सब्जी की तरह क्या पति भी सुबह शाम बदला जा सकता है ? फिर , सब्जियां भी ले देकर वही पांच सात होती हैं।  घूम फिरकर उन्हीं को बनाना पड़ता है" ।  "पांच सात तो होती हैं कम से कम । रोज तो एक ही नहीं खानी पड़ती है जिज्जी" । अब लक्ष्मी जी भी पूरे मूड में आ गईं ।  अब तक लाजो जी चुप बैठी थीं । अब उनसे चुप नहीं रहा गया । कहने लगीं "इतना तंग आ गई है क्या अपने पति से ? एक बार उनसे भी पूछ ले कि वे भी तेरे से तंग हैं कि नहीं । अगर मर्द लोग भी यही सोचें तो तुमको कैसा ...

फिर आया प्यार का मौसम

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आज फिर से सुनाओ ना  अपनी हसरतों का फसाना  नजरें चुराकर नजरों से  शरमाकर कुछ कह जाना  पलकों से पैगाम भेजकर  दिल के आंगन में बुलाना  खामोशियों की चादर ओढ  हाल ए दिल बतला जाना  चोरी चोरी नजरें मिलाना  बार बार मिलने से घबराना  हर आहट पर सिहर उठना  और पसीने में नहा जाना  दांतों तले पल्लू दबाकर  वो धीमे धीमे मुस्कुराना  बात बात पर खिलखिलाना  हौले हौले से गुनगुनाना  इश्क के आगोश में समाए  मंत्रमुग्ध से चलते जाना  कनखियों से ताक झांक कर  अंगड़ाइयों से आमंत्रण देना  किसी न किसी बहाने से  मेरे इर्द गिर्द चक्कर लगाना  मुझे कहीं नहीं पाकर वो तेरा  व्याकुल हिरनी सा भटकना  वो अहसास मचल रहे हैं, सनम  फिर से उन पलों को जीने के लिए  जो हमने बिताए थे इंतजार में  शाम के धुंधलके में मिलने के लिए  एक छुअन भर से जिंदा कर दो गर्म सांसों की आग में तपा डालो  बांहों की विजयमाल पहना कर  इस शाम को अमर बना डालो  हरिशंकर गोयल "हरि" 

बहू पेट से है भाग 13 : अपने पति के साथ घूमने में क्या आनंद है

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लाजो जी का मन कहीं लग नहीं रहा था । मन लगता भी कैसे ? जबसे चौधराइन ने "खुशखबरी" सुनाई है तब से लाजो जी की नींद हराम हो गई है । पड़ौस में तो किलकारियां गूजेंगी मगर यहां "ताने" मारे जायेंगे । आजकल जमाना ऐसा है कि बहू से कुछ कह नहीं सकते । अगर कुछ कह दिया तो दहेज प्रताड़ना के मामले में अंदर करा सकती है वह । इसलिए जिनको जेल की चक्की पीसनी हो , जेल की अधजली रोटियां खानी हो , पानी वाली दाल सुड़कनी हो तो बहू से कुछ कहने की रिस्क ले सकता है कोई । मगर लाजो जी को तो जेल से बहुत डर लगता है । फिर आजकल की बहुएं एक के बदले चार सुनाती हैं । बेचारी सास को ही चुप होना पड़ता है वरना बहू का "तूम्बा" तो बजता ही रहता है । लाजो जी कुछ भी सुनने और सुनाने के मूड में नहीं थी फिलहाल ।  दिल में लावा उठ रहा था उनके लेकिन वह बाहर निकल नहीं पा रहा था । किस पर निकाले ? टीया सेमीनार में थी । लाजो जी का ध्यान टीया की ओर गया "कितनी देर हो गई है उसे ? इतनी देर चलती है क्या सेमीनार" ?  लाजो जी ने टीया को फोन लगाया तो वह स्विच ऑफ आया । सेमीनार में तो फोन बंद ही रखना पड़ता है...

इश्क

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दिल के बजाय जिस्म से इश्क करने लगे हैं लोग  जिस्म के गहरे समंदर में इश्क ढूंढने लगे हैं लोग  किसी जमाने में इश्क इबादत हुआ करता था "हरि" अब इश्क को कमीना, कमबख्त कहने लगे हैं लोग  इश्क का जुनून कुछ इस तरह से चढने लगा है  दिल तेरी मुहब्बत में हद से आगे बढने लगा है  दीवानगी का आलम कुछ ऐसा छाया है मुझ पर कि दिल तेरे इश्क का अब कलमा पढने लगा है  इश्क आवारा सा घूमता है भटकते चांद की तरह  दिल दीवाना सा धड़कता है "यमन" राग की तरह  नजरें तेरी चौखट पे जाकर लौट आती हैं खाली सी  फैल रही है चाहत फिजां में फूल ए गुलाब की तरह  हरिशंकर गोयल "हरि" 

बहू पेट से है भाग 12 : मैं अकेले तो बच्चे पैदा नहीं कर सकता हूं न

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अमोलक जी को लगा कि लाजो जी ताना मार रही हैं कि प्रथम को पांच साल हो गए हैं शादी किए मगर अभी तक कोई बच्चा नहीं लगा रितिका को । लाजो जी को समझाते हुए वे कहने लगे "आजकल बच्चे बहुत समझदार हो गए हैं । वे अपनी मर्जी से बच्चे पैदा करते हैं , भगवान भरोसे नहीं बैठा करते , जैसे हम बैठे रहते थे" ।  "हां, ये बात तो सही कही आपने । वैसे आप सही बात कभी कभी ही कहते हो वरना तो ऊटपटांग ही बकते रहते हो" ।  अमोलक जी ने भृकुटियां टेढी करते हुए लाजो जी को देखा तो लाजो जी सकपका गईं । लाजो जी की एक खासियत और थी कि वे अमोलक जी को चाहे कुछ भी कह लेती थीं मगर उन्हें पता था कि आज जो "स्टेटस" वे एनजॉय कर रही हैं वह अमोलक जी के रुतबे के कारण ही है । इसलिए जब भी कभी अमोलक जी टेढी नजरों से देखते थे तो लाजो जी एक बार तो सिहर जाती थी । तब समर्पण करते हुए वह बोली  "मेरे कहने का मतलब है कि हमारे जमाने में तो बच्चे भगवान की देन ही समझे जाते थे । इसलिए प्रथम तो शादी के 11 महीने बाद ही पैदा हो गया था । अब देखो , प्रथम को कितने साल हो गये हैं शादी किए मगर बच्चे के बारे में कोई चिन्त...

बहू पेट से है भाग - 11 : ईर्ष्या की आग

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जब से लाजो जी ने सुना था कि चौधराइन की बहू मेघांशी "पेट से है" उनके दिमाग में लावा सा दौड़ने लगा । एक कहावत है न कि "पाड़ौसन खावे दही तो मो पै कब जावा सही" । जब पड़ौसन की बहू जो कि अभी दो साल पहले ही आई है , वह मां बनने वाली है और लाजो जी की बहू रितिका को पांच साल हो गए इस घर में आए हुए । मगर उनकी झोली तो अभी तक खाली है । अब आप ही बताओ गुस्सा नहीं आयेगा क्या ?  लाजो जी को भयंकर गुस्सा आ रहा था । चौधराइन से तो वे बड़ी मीठी मीठी बातें कर रही थीं मगर मन ही मन सैकड़ों गालियां भी बके जा रही थीं । ऐसा ही होता है जब हमारे किसी परिचित,  रिश्तेदार या मित्र मंडली में ऐसी खुशी का कोई समाचार जो हमारे यहां आने से पहले उनके यहां आ जाये तो हमारे सीने पर सांप लोटने लग जाते हैं । कितना ही अजीज क्यों न हो कोई , उसके घर कोई अच्छा सा समाचार आता है तो हमारे सीने में जलन होना शुरू हो जाती है और स्थान विशेष से धुंआ निकलना चालू हो जाता है ।  सीने पर पत्थर रखकर , मुंह में मिसरी घोलकर और होठों को एक इंच फैलाकर जिस तरह हम उसे बधाइयां देते हैं उसके उलट मन ही मन में उसे उतना ही या उससे ...

बहू पेट से है भाग 10 : सेमीनार

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अमोलक जी घाट की राबड़ी का आनंद लेने लगे । उनकी इच्छाओं का भी ध्यान रखने वाला कोई तो इस दुनिया में है यह जानकर उन्हें बहुत खुशी हुई । उनके मन में शीला चौधरी के लिए कितना सम्मान है, कोई उनके हृदय में उतर कर देखे तो पता चले । एक वही तो हैं जो उनका इतना ध्यान रखती हैं । उन्हें मान सम्मान देती हैं । वर्ना तो लाजो जी , उनकी इच्छाओं के एकदम उलट काम करती हैं । जरा सा कुछ कह दो तो बात का बतंगड़ बनाकर पूरा मौहल्ला सिर पर उठा लेती हैं । ऐसे हालात में समझदार आदमी बस एक ही काम करता है , वह चुपचाप बैठ जाता है । अमोलक जी भी यही करते हैं । बला से पीछा छुड़ाने का एक यही राम बाण है तरीका है । पूरा आजमाया हुआ । लाजो जी की बेटी टीया अभी एम बी ए कर रही है । दिन भर अपने कमरे में ही घुसी रहती है । आजकल ऑनलाइन क्लासेज होती हैं इसलिए कमरे में ही क्लासेज अटेंड करती है और कमरे में ही होम वर्क कर लेती है । किसी को पता ही नहीं चलता है कि वह ऑनलाइन क्लास अटेंड कर रही है या ऑनलाइन इश्क के पेंच भी लड़ा रही है । हर्ष से उसकी पहचान सोशल साइट्स पर ही हुई थी । उसका व्यक्तित्व टीया को पसंद आ गया था । वह उसे अपना द...

पथ का पत्थर

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पथ में पत्थर बहुत मिलेंगे  विघ्न रास्ता हर पल रोकेंगे  पत्थरों से बचकर चलना है  इन्हीं पत्थरों से पुल बनाना है  यहां सब रोड़े अटकाने बैठे हैं  पराया माल सटकाने बैठे हैं  कोई किसी का मददगार नहीं  स्वार्थ का द्वार खटखटाने बैठे हैं  खुद को पथ का पत्थर ना बना  हर कोई दे ठोकर ऐसा ना बना  जो ठोकर मारे उसे लहुलुहान कर खुद को निर्बल, निरीह ना बना  खुद को किस्मत के हवाले मत कर  उठ, खड़ा हो, कुछ परिश्रम कर  पथ के पत्थरों से इमारत बना ले  आगे बढ़, एक नई शुरूआत कर  हरिशंकर गोयल "हरि" 

आम से राजा बनने की कहानी

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गर्मी बड़ी परेशान थी । धूप से सारा बदन झुलस रहा था उसका । सिर से पैर तक वह पसीने से नहाई हुई थी । जो मेकअप किया था उसने वह सब पसीने से पुंछ गया था । जब मेकअप पसीने से पुंछ जाता है तो चेहरा बहुत वीभत्स सा नजर आने लगता है । उस चेहरे को देखकर सामने वाले को उबकाई सी आने लगती है । गरमी ने अपना चेहरा आईने में देखा तो उसे देखकर वह खुद ही डर गई।  मगर गर्मी कर भी क्या सकती थी । वह तो खुद अपने "जेठ" से ही परेशान थी । ये जो उसकी हालत बनी हुई थी, यह "जेठ" की बदौलत ही तो थी । उसने "जेठ" से बहुत अनुनय विनय की कि इतना रौद्र रूप भी ना दिखाओ कि उसके नाम से ही डर लगने लग जाये । मगर जेठ तो जेठ है । शायद सभी "जेठ" ऐसे ही होते हैं । रौबीले, खड़ूस, पर पीड़क, गुस्सैल । इसीलिए तो छोटी बच्ची "छाया" जेठ को देखकर किसी पेड़ के पीछे छिप जाया करती है । मगर इससे जेठ को कोई फर्क नहीं पड़ता है । वह अपने दोस्त "सूरज" को कहता है कि वह और तेज चमके जिससे धरती पर रहने वाले सभी जीव जंतु , वनस्पति सब परेशान हों । किसी आदमी की प्रवृत्ति ऐसी होती है कि वह औरों...

वो अधूरी सी बात

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वो सुबह कभी तो आयेगी । मैं यह गाना गुनगुनाते हुए सिटी बस स्टॉप की ओर जा रहा था । मैं आज थोड़ा लेट हो गया था । इसलिये जल्दी जल्दी चलने लगा । आज तो बॉस की शायरी सुननी ही पड़ेगी । बॉस ने नियम बना रखा था कि जो भी स्टाफ लेट आयेगा वह बॉस की शायरी सुनेगा । बॉस की शायरी भी ऐसी कि उसे सुनने के बाद कोई भी आदमी एक महीने तक कुछ भी सुनना नहीं चाहता है । और बॉस सुनाते भी पूरी हैं । वैसे तो कोई सुनता नहीं मगर जब कोई हत्थे जढ जाता है तो सारा एक बार में ही वसूल कर लेते हैं । इसलिए कुछ लोग तो शायरी सुनने से बचने के लिए उस दिन की छुट्टी ले लेते हैं । मैं तो कहता हूं कि बॉस को तो पुलिस में चले जाना चाहिए । जो अपराधी किसी भी तरीके से कुछ नहीं बता रहा हो , बॉस की शायरी सुना दो , बस फिर देखो । सात जन्मों के भी अपराध बता देगा ।  सोचते सोचते बस स्टॉप आ गया । एक लड़की वहां पर पहले से ही खड़ी थी । मैं भी उसकी बगल में जाकर खड़ा हो गया । उसकी महक से मैं मदहोश हो गया । न जाने कौन सा परफ्यूम लगाकर आई थी कि दिल बाग बाग हो गया था । मेरी नजरें अनायास ही उसकी नज़रों से टकरा गई । हाय , मेरा दिल । एक झटका सा ल...

धारावाहिक : बहू पेट से है भाग - 8 : खुशखबरी

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जब लाजो जी ने कहा कि बिल्ली दही पर जमी मलाई चट कर गई है और लाजो जी उस दही को चौधराइन को भिजवाने को कह रही है । तो चौधराइन को बड़ा बुरा लगा । मगर उन्होंने कुछ कहा नहीं । मन मसोस कर ही रह गई  । पर उन्हें आश्चर्य हो रहा था कि लाजो जी ने अभी तक यह नहीं पूछा कि यह "घाट की राबड़ी" किस उपलक्ष्य में बनाई है । लगता है कि लाजो जी बातों बातों में भूल गई हैं । पर जब तक वे कारण सुना नहीं दें तब तक उनके पेट में "आफरा" आता ही रहेगा । इसलिए चौधराइन ने कहा  "तुमने यह नहीं पूछा कि ये "घाट की राबड़ी" किस उपलक्ष्य में बनाई है" ?  "अरे दीदी ! साॅरी, साॅरी । बातों बातों में मैं तो भूल ही गई थी । अब बताओ कि क्या खास बात थी कि जिसे "घाट की राबड़ी से सेलिब्रेट किया आपने" ?  शीला चौधरी ने चहकते हुए कहा "बात ही कुछ ऐसी है कि तुम भी सुनोगी तो खुश हो जाओगी" ।  "तो जल्दी से सुना दो ना दीदी । इतना सस्पेंस क्यों जनरेट कर रही हो ? बेटी का रिश्ता तय कर दिया है क्या कहीं पर" ?  "अरे कहां लाजो जी , वो तो मानती ही नहीं है अभी । कहती है...