उत्सव प्रिया प्रकृति
नन्ही कली गुलाब की बिन परवाह किए कांटों की फूल बन इठलाती है , तब प्रकृति उत्सव मनाती है । जब निर्मल जल निष्ठुर पत्खरों में भी, बनाकर रास्ता , झरना बन सौंदर्य का , जादू बिखेरता है, तब प्रकृति उत्सव मनाती है । बारिश की बूंदों को अपनी बाहों में समेट धरती जब सौन्धउठती है , तब प्रकृति उत्सव मनाती है । घनघोर बारिश में , जब बादल एक दूसरे को पकड़ने की चाह में , धमाचौकड़ी मचाते हैं , तब प्रकृति उत्सव मनाती है । ओस की बूंदे , जब पत्तियों पर बिखर मुस्कुराती हैं , तब प्रकृति उत्सव मनाती है । रंग बिरंगे फूलों को , आंचल में समेटकर प्रति आकर्षण और फूलों को सुला देती है तब । प्रकृति उत्सव मनाती है कल कल की आवाज सुना कर , धारा को और लंबी बनाती नदी को देख प्रकृति उत्सव मनाती है । आम की बोर को देख कूकती कोयल को सुन चहचाहती चिड़ियों का कलरव सुन प्र...