प्रवासी समीर

घर में सबके सपने पूरे करने के लिए समीर विदेश जा बसा था ,बहुत मुश्किल था अपने को ढालना, वहां की आबोहवा में ।
जब समीर जा रहा था, तब मां को पक्का यकीन हो चला था कि अब मेरा समीर ऊंची ऊंची बिल्डिंग और पैसों के बीच में ऐसा खोएगा कि फिर दोबारा ना आ पाएगा ।
उसने देखा था ,या उसकी जिंदगी का तजुर्बा था जो एक बार विदेश गया ,वह वापस ना आ पाया ।
अपने देश की मिट्टी की खुशबू हर पल बुलाती है उसको, अभी मां की ममता की डोर जकड़न से निकल,जिम्मेदारियों का बोझ उसको विदेश खींच ले गया था ।
विदेश में सब कुछ था ,पर ना थे बचपन के संगी साथी, मां का आंचल ,पिता की डांट ,भाई बहनों के साथ मस्ती, पर फिर भी ना लौट पाया समीर ।
घुट घुट कर रेंग रेंग कर हरपल बढता आगे ।
मां की याद सताती तो ,बहन की शादी की जिम्मेदारी याद कर अपनी आंखों के पानी को छुपा कर आगे बढ़ता ।छोटे भाई को एक उच्च पद पर  पहुंचाने का सपना लिए ,फिर यादों को पीछे धकेलता, अपने साथियों के साथ की हंसी मजाक को याद कर यादों के डब्बे को खोलता कुछ हल्का महसूस कर यादों का डब्बा ढककर आगे चल रहा था ।
धीरे धीरे बढते हुए अब रास आने ही प्रवासी जिन्दगी ।
हर पल मां को याद करने वाली याद थोड़ी क्षीण हो चली है। दोस्तों के संग हंसी मजाक के पल, अब यहां के लोगों में ढूंढ लिए हैं समीर ने ।
त्योहारों की चमक अपने गांव जैसी तो नहीं ,पर यहां के जीवन में त्योहारों की मस्ती खोज ही ली समीर ने ।
मां की याद आती है तो मां की लोरी अपने आपको सुनाता है ।मां और बेटे के बीच यादों की डोरी मन के तारों से जुड़ी होती है ,बहुत याद आती है मां की ,पर मां यहां आ नहीं सकती, समीर व्यस्तता के कारण वहां जा नहीं सकता ,पर कितनी भी बड़ी पहचान विदेश में बन गई है, पर  समीर आज भी वहां प्रवासी ही कहलाता है। देखता है आसमान में उड़ते हुए पक्षियों को जो एक देश से दूसरे देश प्रभास के लिए जाते हैं और कुछ समय व्यतीत कर के अपने देश में वापस आते हैं तब मैं मन मसोस कर रह जाता है और सोचता है पक्षी जैसा आजाद मैं क्यों नहीं मुझसे अच्छे तो पक्षी हैं जो दूसरे देश से आकर वापस तो आ जाते हैं और अपनी मातृभूमि को याद करता रहता है ,और मन ही मन कहता है ,मेरे प्यारे देश मेरी जिम्मेदारियों के आगे मेरी यादें बौनी साबित हो रही है।

Comments

Popular posts from this blog

आज की मांग

आखिरी अदालत

सुनहरी यादें