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इक शाम अपनी संवार लें

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कुछ साथ लम्हे गुजार लें, इक शाम अपनी संवार ले। खामोश अहसास हो चले, चल फिर तुझे तो पुकार लें। इक  चोट तेरे  वजूद को,   इस राह पर है अगर मिली। ये तल्खियों की वज़ह ज़रा, दिल की जमीं से उतार लें। कुछ  चाहतें  हैं  पली हुई,  हो खूबसूरत सा आशियां। है ख्वाब दोनो दिलों का इक, इस जिंदगी से उधार लें। आंखों कि आंखों से बात हो, फिर प्यार की इक तो रात हो, आगोश  में भर के  चाहतें,   इक दूसरे को निहार लें। ये  नेमतें  इश्क  है  हमें,  दुश्वारियां  भी  जरूर हैं। ये मांगते हैं दुआ खुदा, उन मुश्किलों से उबार लें। "बेफिक्र" जज़्बात आज हैं, इक प्यास जगने लगी अभी। ये शबनमी रात की नमी, अपने लबों पे संवार लें। 221 22 1212 / 221 22 1212  ~रंजन लाल "बेफिक्र" ✍️

अहसास

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न आज के हालातों से कीजिए हाल अपने खस्ता। चलिए सजा ले आज एक अहसासो का गुलदस्ता। बहुत नाजुक दौर है अभी  हौसला जरूरी है रखना, किस मोड़ पड़ जाने जिंदगी बदल ले अपना रस्ता। हर अहसास  के लिए मौजूद फूल रंग बिरंगे कितने, गुलाब सुर्ख प्यार का कीमती पीला दोस्ती का सस्ता। आज एहसासे दर्द बयां करना सजा से कम नहीं है, जख्मों को कुरेद कर तो ये जहां है बहुत ही हँसता। आप हैं साथ मेरे हर कदम है काफी बस इतना सुकूं, कुछ एहसासों को छुपा कर मैने बंद का लिया बस्ता। "बेफिक्र" बहा करते रहे हैं एहसासों की नदिया में हम, मुस्कुराते रहे हैं चाहे कितने खंजर दिल में हो पैवस्ता। ~रंजन लाल "बेफिक्र"✍️

परदेश

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कुछ सुहानी यादों से द्रवित हुआ मन आ बसे परदेश अब छूटा घर आंगन कबूतरों के झरोखों से घर में रहने लगे चारदीवारी से घिरी बस एक छत मिली हम उसी छत को आंगन समझने लगे देश के आंगन की वो नीम की छांव कहां गई वो बड़ों की ममता की छांव परदेश में आकर वो मां का आंचल छूटा पुराने बचपन के साथियों से नाता टूटा कुछ बनने की खातिर ही तो देश छोड़ा नई पहचान ने अपनी पहचान को छोड़ा कसूर किसका रहा ये भी समझ न पाए एक खालीपन का बोझ हैं सर पे उठाए क्या खोया क्या पाया ये सोच भावुक मन एक टीस दिल में दबाए अश्रुपूरित हैं नयन प्रगति की कोशिश में बीता सारा यौवन सांझ सी ढली उम्र में याद आया बचपन फिर ’बेफिक्र’ यादों से द्रवित हुआ मन आ बसे परदेश अब छूटा घर आंगन ✍️रंजन लाल "बेफिक्र"

बेरुखी

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बेरुखी में इस तरह वो आजमाते  हैं मुझे। वो तड़प के और ज्यादा तोड़ जाते हैं मुझे।(१) चाहतों का देखिए तो ये मजा भी है जुदा, साथ हैं पर रोज तन्हा छोड़ जाते  हैं मुझे ।(२) खिलखिलाते से नजर आते रहे वो आज कल, कहर से अक्सर जमाने  के बचाते हैं मुझे ।(३) ये हुनर भी इक नया ही देखने को है मिला, पूछ कर मुझसे ही बातें तो बताते हैं मुझे ।(४) पूछ  लेते  हैं  कभी  वो  हाल  मेरा  भूल से  , चोट खाकर भी मगर मरहम लगाते हैं मुझे।(५) राह की वो धूल इक समझा  कभी था जो हमें भी, आग बन  के खाक में  अक्सर मिलाते हैं मुझे ।(६) बेरुखी कुछ बेबसी कुछ कश्मकश है कुछ दिखी, नाम  मेरा  रेत  पर  लिख कर  मिटाते  हैं मुझे।(७) वक्त तेवर ही बदलता है नया इक रूप ले, रोज ही इल्जाम से इक तो सजाते है मुझे ।(८) वो जरा बहके हुए से कुछ नजर हैं आ रहे, इक कहानी भी जुदा ही अब सुनाते हैं मुझे।(९) आज बेगानी छुवन सी है निगाहों में तेरी, कौन है  जिसके लिए वो भुलाते  हैं मुझे।(१०) जिंदगी "बेफिक्र" तन्हा बीत ना जाए कही, छोड़ दो जिद यार इ...

आइना बन जाऊं मैं

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क्या_बोले_तस्वीर ********************* और थोड़ा सा तो वक्त बचा है,  जरा इंतजामें सफर कर लूं। जो जिंदगी गुजरी है अब तक,  वो लम्हें फिर से बसर कर लूं। थोड़ा सा रुककर अभी जरा,  एक बार सुस्ताने तो दो मुझे, सबकी फिक्र में कटी जिंदगी,  अब अपनी फिकर कर लूं। बंद आंखों में देख लूं  फिर से ,  अपनी दास्तां के खास पल , जरा पूरी जिंदगी के किस्सा ही,  इक छोटी सी खबर कर लूं। टिक टिक करती घड़ी और,  रुक रुक कर चलती सांस मेरी, समय से बंधी सांस की डोर पे,  मजबूत अपनी पकड़ कर लूं। पके हुए फलों की तरह जो,  बिखरे हैं जमीन पर ”बेफिक्र", तेरे मेरे कुछ ख्वाबों को थाम,  दोनो की एक डगर कर लूं।  ********************** ~रंजन लाल "बेफिक्र"✍️ **********************

सफर जारी है अभी

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😊🙏 एक मुसल्सल गजल 😊🙏 तुझी से आशना मेरा तुझी पे ही फना हुआ, ये एहसास ना कहा हुआ न ही सुना हुआ।(१) ये महफिलों की रौनकें पुकारती जिसे शमां, फकत उसी निगाह का मुझे निहारना हुआ।(२) नज़र नज़र की जुस्तजू बुला रही तुझे यहां, उसी हसीं  सुरूर से मेरा युं  सामना  हुआ।(३) सुनो कि अब  गले लगा के फासले मिटा हि दो, ये छत पे तो बहुत ही चांदनी को ताकना हुआ।(४) किसी तरह जुदा न हों मना तो अब करो नहीं,  फकत  यही खयाल रोज ही संवारना हुआ।(५) लगे मुझे बिना तेरे बसर हो अब जो जिंदगी, कि जिस तरह किसी सुरों के साथ साज ना हुआ।(६) पुकार लो मुझे तो अब ना इस तरह सताइए निगाह का मिला के फिर से क्यों समेटना हुआ।(७) जाने कहां हवा मुझे उड़ा ले जा रही बता,  इसी डरो में  दामनों को यूं लपेटना हुआ। (८) जो कशमकश नजर में दिख रही हैं बारहा मुझे, ये दिल की बात लिख के हर दफा सुधारना हुआ(९) तुम्हें किसी तरह तो ‘लाल’ ये हुआ यकीन है, मेरे जुनूं से नूर ये तेरा निखारना हुआ।(१०) मापनी : 1212 1212 1212 1212 🙏🌹रंजन लाल🌹🙏 #तेरेहीइश्कमें

बिखरते_अहसास

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🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 एक दूजे के दिलों का अहसास नहीं हम, प्रेम से ही बुझ जाए वो प्यास नहीं हम, रेल की पटरी सी बन गई जिन्दगी अपनी साथ रहकर भी क्यूं देखो साथ नहीं हम। जिन आंखों में बसती रही प्यार की कशिश  गले लगकर भी नजर का विश्वास नहीं हम। सबकी आंखों में दो जिस्म एक जान बने है खुद की नजरों का वो हंसीं अरमान नहीं हम। चल कदम फिर साथ बढ़ाएं पहले की तरहा, अरे कल ही की तो बात है इतिहास नहीं हम। ये फासले हैं सिर्फ खामोशी की वजह से हैं, चलें फिर कुछ बात करें बेआवाज़ नहीं हम। 🌹रंजन लाल🌹 #तेरेहीइश्कमें

दास्तान ए इश्क 🌹

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क्या सुनाएं दास्तां उस शोख से दिल लगाने की खुद ही तीर चलाने की, खुद ही चोट खाने की अब जो बेसाख्ता आ ही गए हो इस दिल में तो जरूरत ही क्या है किसी और को आजमाने की मैं तो अपने आप में हूं एक मुकम्मिल मुहब्बत बेकार ही ख़ाक छानते हो आप यूं जमाने की नजरों का कसूर बन गया देखो ताउम्र का गिला ना बात अब हकीकत की रही ना अफसाने की ये निगाहें ही बयां कर देती हैं तेरा पूरा वज़ूद  जरूरत ही क्या है तुम्हें रूख से पर्दा हटाने की अपनी बेबसी पर परेशान भी हैरान भी है ' लाल ' किसी सूरत में नहीं रिहाई अब इस कैदखाने की 🌹🌹रंजन लाल 🌹🌹🙏🙏

⚘कैसे ना याद आएगी।⚘

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खुशबु बनके कुछ यूँ बिखर जाएगी, हर शय, हर खयाल में नजर आएगी।  दिलों में रहना तो शौक है हमारा,  कैसे ना तुम्हें हमारी यूँ याद आएगी  ज़रा कोशिश तो कर अलग होने की,  हर तरफ मेरी परछाई नजर आएगी।  पढ़ के देख लेना कभी भी तुम बेखौफ,  जिंदगी मेरी खुली किताब बन जाएगी।  ख्वाबों के चमन में जो छुपा के बैठे हो,  खुशबु को उसकी कैसे कैद कर पायेगी।  क्या ज़रूरी तुम्हें आईने में संवरने की,  मेरे लफ़्ज़ों में तेरी तस्वीर दिख जायेगी।  ये जो कशमकश की सिलवटें माथे पर,  गर कर लो ऐतबार, यूँ ही उतर आयेगी।  आजमा के देख ले किसी भी मोड़ पर,  हर जगह हमें साथ अपने खड़ा पायेगी।  🙏🙏😊😊🙏🙏 स्वरचित व मौलिक  रंजन लाल  इन्दौर, मध्यप्रदेश

🌷जवाब आ गया है। 🌷

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मेरे हर सवाल का बनके, वो जवाब आ गया है। इन होठों पे मुस्कान,  हाथों में गुलाब आ गया है। मुद्दतों से फिरता रहा मैं, जिस तलाश में दरबदर, उन आंखों देखिये आज, वही ख्वाब आ गया है। थरथराते हुये लबों पर,  ये दबी दबी सी हंसी, प्यार मुझपर आज उन्हें,  जैसे बेहिसाब आ गया है। उठा कर नजरों को जो,  यूँ गिरा लेते हो अक्सर, नजरों से नजरों को,  जैसे आदाब आ गया है। जो फूल भेजा था उन्हें,  इन ज़ुल्फों पे सजा हुआ देख, हसरतों का मेरे भीतर, इक इन्कलाब आ गया है।  ⚘रंजन लाल⚘

हम थोड़े बदनाम हैं।

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युं मेरे शब्दों में अपना जीवन जीते हैं, खुशी में खुश, गम में गमगीन होते हैं। तुममें हममें बहुत फर्क नहीं है यारों, क्युं हमें लोग अजीब नजरों से देखते हैं। हम थोड़े से बदनाम हैं इस जहाँ में कि, बेहिचक हम हाले दिल बयां कर देते है। खयाल सबके दिलों में रहते हैं साहब, अरमान वहाँ पर भी सुलगते हैं साहब। बस, आप शराफत का चोला पहने हुए, खयालों को दिल में छुपा कर रखते हैं। हम थोड़े से बदनाम हैं इस जहाँ में कि , बेहिचक हम हाले दिल बयां कर देते है। लफ्ज़ों को छाने, पर्दा नहीं रहा अब तो, परखे जो, वो आइना नहीं रहा अब तो, हमारे शब्दों मे हमारा जीवन ना खोजिये हम तो यूँ ही बहुत से खयाल कह देते हैं। हम थोड़े से बदनाम हैं इस जहाँ में कि, बेहिचक हम हाले दिल बयां कर देते है। वो दिल कहां, जिसे कोई अच्छा ना लगे सामने उनके आते ही, बैठने सा ना लगे ये और बात है दिल ही दिल में अक्सर, सभी घुटते हुये मन मसोस कर रहते हैं। हम थोड़े से बदनाम हैं इस जहाँ में कि, बेहिचक हम हाले दिल बयां कर देते है। 😊🙏⚘रंजन लाल⚘🙏😊

शाम सुहानी बनाई जाए

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तस्वीर आंखों में फिर से एक सजाई जाए, फिर कोने मे दिल के इक जगह बनाई जाए  यादों के पन्नों से कुछ लम्हे चुराकर कर , चलो अहसासों की इक माला बनाई जाए । कुछ ख्वाब फिर देखें खुली आखों से  कुछ दिल्लगी हो जाए फिर अरमानों से कि आगोश में चाँद हो और इक तन्हाई  इक शाम तो फिर से सुहानी बनाई जाए।  फिर देखो एक आहट पर मचलने लगे है, गिरते गिरते देखो जरा संभलने लगे हैं। दबी हुई जो इक अरसे राख के ढेर तले, हवा देकर वो चिंगारी, फिर जलाई जाए । 🙏रंजन लाल 🙏        इंदौर

शिखर की ओर बढ़ती नारी की वेदना

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ये मत समझना आज लोगों,  कि कोई कथा लिख रहा हूँ, शिखर की ओर बढ़ती नारी के, हृदय की व्यथा लिख रहा हूँ। अक्सर उनकी कला को बस, एक ही पैमाने पर परखा सबने, उनको सम्मान देती नज़रो ने भी, क्या क्या ना नज़र में रखा सबने। उन नजरों में छुपी भावनाओं की वो ही मानसिकता लिख रहा हूँ। शिखर की ओर बढ़ती नारी के, हृदय की व्यथा लिख रहा हूँ। अपने भीतर कला, कलाकार बनकर, वो सामने क्या गई जमाने को दिखाने, कूछ लोग भी आगे बढ़े, कूछ सोचकर, अवसरों के सब्जबाग लगे जो दिखाने। उसके बदले उन पर जो हक चाहते हैं  मन की वही नीचता लिख रहा हूँ । शिखर की ओर बढ़ती नारी के, हृदय की व्यथा लिख रहा हूँ। आई है लोगो में , तो कूछ लोगों की अब क्या वो निजी सम्पत्ति लगती है। जिस नज़र में सम्मान खोजती रही वो जिस्म के उतार चढ़ाव देखती है। उस नारी की मुस्कान में छुपे हुए  दर्द की वो गम्भीरता लिख रहा हूँ। शिखर की ओर बढ़ती नारी के, हृदय की व्यथा लिख रहा हूँ। वो तो शुक्र है कि इस भीड़ में भी कूछ तो निर्मल हृदय भी विचरते हैं। इन प्रतिभाओं को प्रोत्साहित और, हृदय से सम्मानित भी सदा करते हैं । दिल से नमन है उन्हे साथियों कि, अब बदलती सी ...

रिमझिम फुहारें प्रीत की⚘

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मेरे अन्तर्मन को छुआ है, सरगम सी बिखर रही है, रिमझिम फुहारें वो प्रीत की, मेरे मन पर बरस रही है। कोई आजकल खुद से भी ज्यादा  क्युं इतना हमें प्यार कर रही है।  हर पल मेरी निगाहें ढूंढा करें, वो प्यार बन कर आया है, एक मीठी सी कसक लिये आज, मन के भीतर जा समाया है। आंख मिलने से बचती रही और चोरी से वो आँखे चार कर रही है। कोई आजकल खुद से भी ज्यादा  क्युं इतना हमें प्यार कर रही है। बन्द आंखो में साफ नज़र आता मुझे, आंख खुलते ही धुआँ  सा होता है, तन्हाई में जो नज़र आता है हर सूं  बस भीड़ में ही तन्हा सा होता है। सुबह की भीनी महक सी कहीं, हर पल मन को सरोबार कर रही है, कोई आजकल खुद से भी ज्यादा क्युं इतना हमें प्यार कर रही है। 🙏⚘ रंजन लाल⚘🙏

एक अधुरी तलाश

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ये जिन्दगी बिन तेरे अब,  क्युं अधूरी सी लगती है, ये कौन सी तलाश थी जो, हुई तुम पर पूरी सी लगती है। ये नयना ये काजल,  ये जुल्फें ये लहराता आंचल, ये सब बेकार की बातें भी,  अब बहुत जरुरी सी लगती है। दिल के बहुत अंदर घर अब, कर गई है नजरों के रास्ते, ये जिस्मों की दुरी भी अब, क्यों नहीं दुरी सी लगती है। रस्मों रिवाजों के भंवर से, आज बहुत दूर निकल आये, तेरे पहलु में हर रात रोशन, हर शाम सिन्दूरी सी लगती है। एक नाज था हमें जो खुद पर, बस टूट ही गया तुमसे मिलकर, गाफिल ना हुये नशे में कभी जो, तेरी याद भी सुरुरी सी लगती है। ये जिन्दगी बिन तेरे अब,  क्युं अधूरी सी लगती है, ये कौन सी तलाश थी जो,  हुई तुम पर पूरी सी लगती है। आपका #रंजनलाल# ⚘⚘🙏🙏⚘⚘

⚘गज़ल लिख रहा हूँ⚘

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एक शोख चेहरे को कमल लिख रहा हूँ, कविता को ही जैसे गज़ल लिख रहा हूँ। मुस्कुराती खिलखिलाती हुई सुबह को, लहराता हुआ वो आंचल लिख रहा हूँ। मेरे मन के दर्पण के उस ओर जो छुपा है, उस चितचोर पर मन ये आकर रुका है। क्या लिखुं पाती में उलझनें बढ़ गई हैं,  शब्दों को  यूँ बदल बदल लिख रहा हू। रात सपनों में आकर, बेकरार करते हैं,  मुझे मेरे ही खयालों से बेज़ार करते हैं। मुस्कुरा कर इज़हारे वफ़ा यूँ ही कर गये  कि उनकी ही बात हरपल लिख रहा हूँ। एक शोख चेहरे को कमल लिख रहा हूँ, कविता को ही जैसे गज़ल लिख रहा हूँ। आपका अपना #रंजन लाल# 🙏🙏⚘⚘

प्रणय प्रभाती

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भोर की भीनी भीनी महक बनकर, अक्सर महकाती रही मेरा जीवन  तुम्हारी यादों की मन में आहट  जैसे मीठे स्वप्नों की हो करवट मेरे अन्तर्मन को सदा बहलाती है। ऐसे ही हर पल तुम्हारी याद आती है। पंछी की तरह कलरव करती वो रोम रोम पुलकित करती एक हंसी, हर रात का अन्तिम सुकून और बनकर हर सुबह की पहली खुशी, खुद में ही हँसती खिलखिलाती है। ऐसे ही हर पल तुम्हारी याद आती है। अहसास हर पल यही सपने सजाये तुम्हें निहारें और बस तुम में खो जाएं  ना खोनें का डर, ना पाने की खुशी रहे कुछ इस तरहा एक दूजे के हो जाएं, यही आकांक्षा मन की प्रणय प्रभाती है। ऐसे ही हर पल तुम्हारी याद आती है। ⚘😊रंजन लाल😊⚘

⚘आहट इश्क़ की⚘😊

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शोख़ नजर की शरारत दिलकश लाजवाब,  गुस्ताख लबों पर छाया जैसे हसीन ख्वाब। यूँ जो अनछुये सवाल लिये तकते हो मुझे  कहीं बन ना जाये ये सवाल ही खुद जवाब।  कि बहुत दूर तलक अब आ पहुंची है नजर , पढ़ने लगी है गौर से मेरे दिल की किताब। । हलचल सी मच गई है,खयालों में इस कदर, किसी तुफान की जोर से दस्तक है जनाब।  मेरी तन्हाई भी अब तो पूछने लगी मुझसे, ये कौन आया है मुझे मिटाने को है यूँ बेताब। ⚘रंजन लाल ⚘😊

'कलम बना ले तो कैसा हो'

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कलम की राह बदलने से अच्छा,  तुम्हें ही कलम बना ले तो कैसा हो। चलो कुछ ख्वाब फिर से देख लें,  राहें कुछ नई चुन लें तो कैसा हो। दर्द को बना कर वो चेहरे की हंसी,  किसी चेहरे पर सजा लें तो कैसा हो। तेरी नजरों से घायल हैं जायें कहाँ,  दिल ही में घर बना लें तो कैसा हो।  लेकर आगोश में तुम्हें इक बार फिर, थोड़ा हम भी इतरा लें तो कैसा हो।  ये होठों की कंपकपी बयाँ कर रही,  तुम्हें अपना ही बना लें तो कैसा हो।  कलम की राह बदलने से अच्छा,  तुम्हें ही कलम बना ले तो कैसा हो। 🙏⚘रंजन लाल ⚘🙏

इक हसीना थी, इक दीवाना था।⚘

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एक तस्वीर यादों के पन्नों से  यूँ सामने आई ,  कि दिल की गहराइयों से  आवाज है आई, क्या उमर थी, क्या समां,  क्या जमाना था,  इक हसीना थी, और इक दीवाना था। सपने बुनती आँखों में,  इक नई चमक लिये, सुर्ख लबों पर बेताब  इक मुस्कुराहट लिए,  अपने ही खयालों में  शर्माती खिलखिलाती, लगे जैसे किसी का  दिल में आना जाना था। क्या उमर थी, क्या समां,  क्या जमाना था,  इक हसीना थी, और इक दीवाना था। हर आहट पर मचलने लगे  अचानक यूँ ही, किन खयालों में गिरते  संभलते रहे यूँ ही,  अनछुये इश्क की तपिश में  पिघलते रहे यूँ ही,  बाहों में खुशियों और  कदमों में जमाना था।  क्या उमर थी, क्या समां,  क्या जमाना था,  इक हसीना थी, और इक दीवाना था। इक शरारत सी रहा करती ,  नजरों में जहाँ,  आज मैंने फिर से ढूंढा,  पर ना मिली वहाँ,  वो शोख़ी,  वो अल्हरपन,  जाने खो गई कहाँ,  चंचलता जिसकी पहचान  मिज़ाज शायराना था। क्या उमर थी, क्या समां,  क्या जमाना था,  इक हसीना थी, और ...