⚘गज़ल लिख रहा हूँ⚘
एक शोख चेहरे को कमल लिख रहा हूँ,
कविता को ही जैसे गज़ल लिख रहा हूँ।
मुस्कुराती खिलखिलाती हुई सुबह को,
लहराता हुआ वो आंचल लिख रहा हूँ।
मेरे मन के दर्पण के उस ओर जो छुपा है,
उस चितचोर पर मन ये आकर रुका है।
क्या लिखुं पाती में उलझनें बढ़ गई हैं,
शब्दों को यूँ बदल बदल लिख रहा हू।
रात सपनों में आकर, बेकरार करते हैं,
मुझे मेरे ही खयालों से बेज़ार करते हैं।
मुस्कुरा कर इज़हारे वफ़ा यूँ ही कर गये
कि उनकी ही बात हरपल लिख रहा हूँ।
एक शोख चेहरे को कमल लिख रहा हूँ,
कविता को ही जैसे गज़ल लिख रहा हूँ।
आपका अपना #रंजन लाल#
🙏🙏⚘⚘
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