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अग्निवीर"(आखिर कब तक)

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             आजादी को 75 साल पूरे होने वाले हैं। सरकार ने कई सपने बुने कुछ पूरे हुए,कुछ अधूरे और कई सपने तो सपने ही रह गए।आख़िर क्यों??? कथनी और करनी सदैव एक सी नहीं होती। जब सरकार युवाहित के भविष्य के लिए कुछ योजनाओं का आगाज करती है तो उसके शुरू होने के पहले ही कहीं कोई छोटी सी चिंगारी, आग भड़काने को तैयार रहती है।एक विनाशकारी ज्वालामुखी की तरह सब तहस-नहस करने के लिए। आखिर कब तक हमारे देश में नवयुवकों को दिग्भ्रमित किया जाएगा। जो जोश व उत्साह अपने मातृभूमि के प्रति समर्पण व अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए होना चाहिए। वही युवावर्ग हिंसात्मक घटना में अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं। किसने भड़काया , किसने चिंगारी सुलगाई इन युवाओं के जेहन में????? इन सबसे परे,  सिर्फ़ हमें अब यही सोचना है कि हम सब सर्वप्रथम भारतीय हैं, जो हमारे हित में है, उसे हम सब मिलकर आगे बढ़ायेंगे , व कामयाब होने की कोशिश करेंगे। तू, तेरा और मैं, मेरा से नहीं......... यह संस्कारों, एकता ,सद्भभावों की भारत भूमि है। यहां सिर्फ और सिर्फ "हम और हमारा" ही होना चाहिए। तभी हमारा भा...

अग्निपथ की राह में अग्निवीर।

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भारत सरकार ने सेना में युवाओं की भर्ती के लिए 14 जून 2022 को अग्निपथ योजना लागू की है।इस योजना के आते ही पूरे देश में विरोध शुरू हो गया। आखिर क्या है ?ये अग्निपथ योजना ,जिसके विरोध में भावी अग्निवीरों ने राष्ट्रीय संपत्ति को अग्नि के हवाले कर दिया। इससे क्या साबित होता है ,जिसे अपने देश की परवाह नहीं वो खाक देश सेवा करेगा। आइए पहले जानते हैं क्या है ये अग्निपथ योजना _ _अग्निपथ योजना में सरकार युवाओं को 4 साल तक सेना के तीनों अंगों में से एक में सेवा का अवसर प्रदान कर रही है। _ इसमें भर्ती की उम्र 17.5 साल से 21 साल की है। 6 महीने की कड़ी ट्रेनिंग देकर इन्हें अग्निवीर बनाया जाएगा। _भर्ती की योग्यता_मेरिट बेसिस पर,कक्षा 10  से 12 तक के युवा। वेतन_ 30 हजार से 40 हजार तक के बीच होगा।  _यह भर्ती अधिकारी रैंक से नीचे के रैंक के  लिए होगी। _चार साल बाद सेवाकाल में प्रदर्शन के आधार पर मूल्यांकन कर 25% युवाओं को आगे की सेवा के लिए नियमित किया जाएगा।  _सेवाकाल में बीमा का भी लाभ दिया जाएगा,मृत्यु,विकलांगता सभी के लिए अलग अलग बीमा की राशि प्रदान की जायेगी। क्यों है विरो...

अग्निवीर

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आजकल सरकार की अग्निपथ नामक योजना  जिधर देखो चर्चा का विषय बना हुआ है ! सरकार की इस अग्निपथ योजना के खिलाफ कई विरोधी पार्टी मोर्चा खड़ा कर रही है ,सड़को पर नारे लग रहे हैं किंतु मैं तो कहती हूं  इस योजना को समझने की जरूरत है !इसे सफल बनाने में आगे कदम बढ़ाओ ये राष्ट्र हित के लिए सफल सिद्ध होगा ! आइए जानते है कि ये योजना क्या है ! सरकार द्वारा बनाई गई इस योजना को अग्निपथ का नाम दिया गया है !इस पथ पर जो भी चलेगा वो अग्निविर कहलाएगा! इसमे भारत के तीनो सेनाओं  थल सेना, नौसेना ,वायुसेना में इच्छुक सैनिकों की चार वर्ष की अवधि के लिए भर्ती की  अनुमति दी जाएगी ! और इन सेनाओं को अग्नि वीर नाम से संबोधित किया जाएगा! इनको बकायदे प्रशिक्षित किया जाएगा और वो सामान्य सेना की भांति ही देश की सेवा में सदा तत्पर रहेंगे ! चार साल की अवधि पूरा होने पर इनको 11.71 लाख रुपए का भुगतान एकसाथ किया जाएगा ! इनका 48 लाख का जीवन बीमा  कवर  भी मिलेगा! हर साल  ४५,०००से ५०,००० तक लोगो  की भर्ती होगी!इनमे से मात्र 25%=को ही  चार साल बाद पुनः 15साल के लिए भर्ती किया जा...

समाज के पिशाच

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न्याय है कहाँ।जिस तरह से हमारे देश मे एक के बाद एक बेटियो पर जुल्म हो रहे है । उनकी सुरक्षा पर प्रश्न उठ रहे हैं।हम यह सोचने पर विवश है कि हमारी बेटियां  सुरक्षित खान है । जो लोग लड़कियो  के साथ अमानवीय कृत्य करते हैं यह समाज के उन पिशाच की तरह हैं जिन्होंने  सभ्य मनुष्य का  मुखौटा पहना हुआ है लेकिन कृत्य उनके पिशाच की ही तरह हैं ।बेशक उनके लंबे लंबे दांत और नाखून नही हैं लेकिन उनकी सोच इतनी घृणित है कि बुराई भी इनके आगे कम पड़ जाती है। वह मानसिक रूप से बीमार है ।उन्हें किसी तरह की सजा का भी कोई भय नही है।और न ही उनके हाथ कांपते है ।इनकी आंखे एक लड़की को  देखते ही ऐसे घूरती है कि उसका  एक्स रा कर रहीं हों। बिना नाखून और लम्बे लम्बे दांतो के ही आंखो से ही उसके शरीर का सारा खून पी जाते हैं। ऐसे दरिंदे समाज में निर्भय हो घूमते रहते हैं। ना तो उन्हे सजा का भय है और नही समाज का। ।पहलेनिर्भया के साथ दरिंदगी की।उसे न्याय मिलने मे इतना समय लगा कि दरिंदो के मन से मौत का ख़ौफ़ ही चला गया। उन लोगो ने यह सोच लिया कि कोई हमारा कुछ नही बिगड़ सकता। अभी पिछले साल हैदरा...

अग्निपथ -अग्निपथ !!

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       वृक्ष हों भले खड़े,           हों घने हों बड़े,         एक पत्र छाँह भी,    माँग मत, माँग मत, माँग मत,     अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ। वैसे तो डॉ हरिवंश राय बच्चन जी की लिखी इन पंक्तियोन की तर्ज़ पर अग्निपथ फ़िल्म में महानायक अमिताभ बच्चन ने जब कहा तो इसकी गहराई सौ गुना बढ़ गई और यह जन- जन में लोकप्रिय हो गया। इतनी लोकप्रियता पाई की आज भारत सरकार की सैनिकों के लिए एक योजना को नाम मिला अग्निपथ और इस अग्निपथ पर जो चलेगा वह अग्निवीर कहलाएगा। जरा ठहरिए पहले जान तो लें कि लयह अग्निपथ योजना है क्या? भारत सरकार ने तीनों सेवाओं थल सेना, नौसेना और वायु सेना में सैनिकों की भर्ती के लिये अग्निपथ योजना का प्रस्ताव शुरू की है। इस योजना के अंतर्गत देशभक्त और देशभक्ति की कामना रखने वाले युवाओं को चार साल की अवधि के लिये सशस्त्र बलों में सेवा करने की अनुमति दी जाती है।इस योजना के तहत सेना में शामिल होने वाले युवाओं को अग्निवीर कहा जाएगा। इस नई योजना के तहत लगभग 45,000 से 50,000 सैनिकों की सालाना भर्ती की जाएगी...

आम कितना खास

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हमारे देश के संविधान की व्यवस्था के अनुसार प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री विधायक सांसद महापौर पार्षद सरपंच आदि सभी को आम जनता ही चुनकर इन पदों पर बैठाती है ताकि यह उनकी आवाज बन सके ।यह सारे पद जनता की सुविधा प्रदाता के रूप में होते हैं ।जनता जनार्दन के जनादेश से तख्ता पलट हो जाता है लेकिन वर्तमान परिवेश में हम सभी अपनी ताकत को भूलकर राजनीतिक बिसात के मोहरे मात्र बनकर रह गए हैं ।हम आम आदमी की ताकत को पहचानना ही नहीं चाहते। आम कहलाना  हमें मंजूर ही नहीं हम तो बस खास बनकर झूठी में ही जीना जाते हैं। सिग्नल पर रुकना, टोल नाके पर रसीद कटाना हमारी शान के खिलाफ है। लंबी लाइन में लगकर इमानदारी से सही काम करवाने की बजाय अंदर वाले रास्ते से टेबल के नीचे से काम कराना सही समझते हैं ।आम आदमी बनकर अन्याय के खिलाफ लड़ना हमें गवारा नहीं ।आम आदमी सिद्धांतों पर जीता है शोषण के विरुद्ध खड़ा होता है पर हमें तो सबसे भले बनकर सिर्फ अपना हित साधना होता है ।हमने स्वयं आम आदमी की शक्ति को कमतर आंका है इसलिए हमारा आकलन दूसरों ने भी वैसा ही किया जबकि समय आ गया है यह बताने का कि जनादेश को नकारना किसी के वश में नहीं ...

हास्य-व्यंग्य : बरसात

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बरसात का जिक्र होते ही मन मयूर नाच उठता है । ऐसा लगता है कि जैसे जीवन में खुशियों की बहार आ गई है । पर ये बरसात भी बड़ी अजीब है । कहीं ज्यादा तो कहीं कम । कहीं बाढ़ ला देती है तो कहीं अकाल ।समझ में नहीं आता कि ऐसा क्यों होता है ?  प्यार भी बरसात की तरह है । किसी के नसीब में कम तो किसी के नसीब में ज्यादा । कोई कोई तो मरुस्थल की तरह तपता हुआ रेत का टीला बन गया है । बदलियां भी उसके आसपास आने से कतरातीं हैं। उसने ऐसा क्या अपराध कर दिया जो सारी बदलियां उसके चारों ओर मंडरा कर उसे चिढ़ाती हैं और प्यार की वर्षा और कहीं जाकर कर देतीं हैं ।  कुछ जगह ऐसी हैं जहां बदलियां मरी जा रहीं हैं बरसात करने के लिए । वो पहाड़ी अपने सौन्दर्य पर अभिभूत हैं और बदलियों को चुनौती देती है कि यदि तुम में सामर्थ्य है तो मेरे ऊपर से बिना बरसे निकल कर दिखाओ । लेकिन बदलियां हैं कि चैलेंज लेने को तैयार नहीं हैं ‌। वे तो पहाड़ी की हरियाली और सौंदर्य पर ही मर मिटी हैं और उसी पर बरस जातीं हैं। बाढ़ आ रही है वहां पर । पहाड़ी कहती हैं , बस करो देवियों मुझ पर । अब और कितना बरसोगी मुझ पर । बदलियां फिर भी बरस ...

काव्यरस भाग १

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काव्य रस के प्रकार नौ बताए गए हैं जिनमें वात्सल्य और भक्ति रस को जोड़ा गया है यह कुल मिलाकर 11 होते हैं काव्य रस के इन सभी प्रकारों को मनुष्य अपने शारीरिक हावभावों से अभिव्यक्त कर सकते हैं इनके अलावा कुछ पशु-पक्षी भी अभिव्यक्ति इसी माध्यम से करते हैं। इंसान भी दहाड़ते हैं शेर भी दहाड़ता है क्योंकि यहां पर वीर रस प्रभावी होता है। चिड़िया भी चहकते हैं और मनुष्य भी चहक चहक कर बातें करते हैं कहने का मतलब हंस-हंसकर..... काव्य के सभी रस अपने आप में सर्व सिध्द हैं पर हास्य रस की सिद्धि जिसे मिल जाए उसकी महिमा अपरंपार है मतलब नो आरग्यूमेंट, नो टेंशन...रश्मिरथी के धुरंधर हास्य कवियों ने आज रश्मिरथी पाठकों एंवम लेखकों को खूब हंसाया है।  हंसना जरूरी भी है इसीलिए तो हंसी को बनाया।  सोंचो-सोंचो अगर मुंह में ताले लगते तो कैसा लगता।।  गर गुस्से को हंसना और हंसना को गुस्सा कहते तो कैसा लगता।  बचपन में भाई की नर्सरी राइम में जो पढ़ा था उसे आपको भी पढ़ाते हैं हंड्रेड परसेंट गारंटी है इसे पढ़कर आप जरूर हंस देंगे हा हा हा हा हा  ही ही ही ही ही  हो हो हो हो हो  हौ ...

आरक्षण की बैसाखी

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आरक्षण का जिन्न बोतल से बाहर क्या निकला कि ,इसने अपनी मन मानी चाल से क‌ई नस्लों को बर्बाद कर गया ...।  जिन्होंने आरक्षण की सौगात देश को दी थी उन्होंने सोचा भी नहीं था कि, ऐसा दिन भी आएगा प्रतिभाएं दमन की राह पकड़ लेगीं ,इन प्रतिभाशालियों युवकों का पलायन  अपने ही देश से हो जाएगा ..। उस समय कमजोर ,पिछड़े वर्ग की दशा सोचनीय थी ..। इस बिल को संशोधित कर केवल कुछ समय अवधि के लिए लाया जाना स्वीकार्य किया गया था .. क्योंकि, सामाजवाद दृष्टि कोण से हमारा राष्ट्र समाज वाद का पक्षधर रहा है सभी को बराबरी का अधिकार है ,वर्ण व्यवस्था होने से दलित वर्ग के पास सुअवसर नहीं थे । इसलिए,इस नीति को उनके उत्थान के लिए पेश किया गया था ..।   लेकिन, इतने समयकाल से चल रहा आरक्षण हमारे देश विकास की राह पर आरक्षण ही सबसे बड़ा रोड़ा है ..।  यदि, हम समान नागरिक समान अधिकार  की बात करते हैं तो जातियों और धर्म को पूछते क्यों हैं..? कोई स्कूल या प्रतियोगिता का फॉर्म भरते समय जाति और धर्म के नाम का बंटवारा क्यों हो जाता है ..?  क्या यह हमारी शिक्षा की त्रासदी नहीं कि उसे इस दानव...

आरक्षण कब तक

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आरक्षण एक ऐसा मुद्दा है ,जो राष्ट्रीय पटल पर हमेशा से ज्वलंत मुद्दा रहा।कुछ इसके विरोध में तो कुछ इसके समर्थन में अलग अलग सबकी दलीलें। शुरुवाती दौर में इसे लागू करना जरूरी था ,वर्ण भेद के कारण निम्न वर्ग के लोग ज्यादातर निरक्षर और पढ़ाई लिखाई से वंचित थे। समाज को बराबरी में लाना था ,उनके उन्न्यन के लिए उन्हें आर्थिक और शैक्षिक आरक्षण अत्यंत जरूरी था। लेकिन आज जब देश अपनी आजादी की 75 वी सालगिरह मना रहा है ,तो क्या आरक्षण पर विचार करने की आवश्यकता नहीं? आज आरक्षण के कारण प्रतिभा का पलायन हो रहा,माता पिता अपने बच्चों को उच्च शिक्षा में दाखिला दिलाने विदेश भेज रहे हैं। सरकारी नौकरी में आरक्षण के कारण प्रतिभाएं प्राइवेट सेक्टर में जा रही हैं। अच्छे डॉक्टर विदेशों में सेवा दे रहे हैं। इस मुद्दे पर अपने वोट बैंक बनाने वाले नेता ,सदन में समानता का अधिकार नहीं देते ,वहां दलित, एससी, एसटी की संख्या बहुत कम है। उपराष्ट्रपति की बेटी आरक्षण का लाभ उठा बड़े पद पर बैठ सकती है ,लेकिन एक आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण को कोई सुविधा नहीं। फिर भी आज के दौर के युवाओं ने आरक्षण को टक्कर दिया है अपने दिम...

युवाओं में नशे की बढ़ती लत

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 आज का युवा उच्च शिक्षा प्राप्त तेज व पैने दिमाग का धनी, आधुनिक तकनीकी का ज्ञाता ,प्रतिभा संपन्न व तेज रफ्तार से दुनिया के साथ भागता हुआ युवा है ।अगर उसमें कमी है तो सिर्फ धैर्य और सहनशीलता की। त्वरित परिणाम की आकांक्षा रखना और नकारे जाने को सह ना पाना यह दो कमजोरियां उसे दिग्भ्रमित कर रही हैं ।मेहनती तो है पर परिणाम की आतुरता है ।नकारे जाने पर टूट जाता है। पाश्चात्य संस्कृति और आधुनिकीकरण में भी लिप्त है ।नौकरी न मिलने ,पर, माता-पिता  से पर्याप्त देखभाल ना मिलने पर ,प्यार में धोखा खाने पर बहुत जल्दी हताश हो जाता है और फिर नशे की अंधी दुनिया में खो जाता है। संगत के कारण, कभी एडवांस बनने की होड़ कभी पैसों की कमी तो कभी पैसों की अधिकता युवाओं को नशे के मकड़जाल में फंसाने के लिए जिम्मेदार है अभिभावकों को आधुनिकता की अंधी दौड़ में अव्वल आने का शौक है युवाओं को आवश्यकता से अधिक छूट देकर वे तो स्टेटस मेंटेन कर लेते हैं पर उनके बच्चों को ड्रग माफियाओं के शिकंजे में कब और कैसे धकेल देते हैं खुद भी नहीं समझ पाते ।नशे की लत उन्हें अपराधी बना देती है या तो वे जान ले लेते हैं या जान गवा ब...

सफलता का मूल मंत्र

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हर व्यक्ति अपने जीवन में हमेशा सफलता पाना चाहता है। लेकिन इसी चाहत में उसे कैसे क्या करना है अक्सर वो भूल जाता है। तो सफलता प्राप्ति के लिए जीवन में हमेशा एक लक्ष्य होना चाहिए। कुछ लोग बहुत सारे लक्ष्य लेकर बैठ जाते हैं और उनके ध्यान हर तरफ बंटे रहने की वजह से  किसी एक चीज को हासिल करने में नाकामयाब रहते हैं। तो अब जब एक ही लक्ष्य है , अब बढ़ते हैं सफलता की और। सफलता पाने के लिए पहले ये जानना ज़रूरी है की कौनसे रास्ते पर चल कर हम उसे पा सकते हैं।फिर उसी रास्ते पर चलना चाहिये। हमारी सफलता के पथ में बहुत सारी द्विधाएं आयेंगी। और हमें उन सबको हरा कर आगे चलना चाहिये। मन में ईश्वर प्रेम के साथ साथ बहुत सारा संयम भी जरूरी है। कहीं पर अगर हम गिर जाते हैं तो फिर से खड़े होने की हिम्मत रखना चाहिये। सफलता किसी को भी आसानी से प्राप्त नहीं होती है। उसके लिए कठिन परिश्रम करना चाहिये। एक बार हार जाए तो बार बार कोशिश करते रहना चाहिए। मन से डर को एक दम से दूर कर देना चाहिए। लोग मेरे बारे में क्या कहते हैं , ये बिलकुल भी सोचना नहीं चाहिए। सामने से आनेवाली हर मुसीबतों का डट कर सामना करना चाह...

"सफलता के सूत्र"

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जीवन में प्रत्येक व्यक्ति सफल होना चाहता है, लेकिन सफलता का मार्ग आसान नहीं है तो असंभव भी नहीं है। देखने में  आता है कि कठिन परिश्रम के पश्चात भी कई बार लोग सफलता हासिल नहीं कर पाते हैं। सफल जीवन हर व्यक्ति का पहला सपना होता है। यह सपना आसानी से पूरा नहीं किया जा सकता। इसे हासिल करने के लिए व्यक्ति को एक मूल्य चुकाना पड़ता है। जी हां ,सफलता हासिल करने के लिए व्यक्ति को कुछ विशेष सूत्र अपनाने होते हैं। जीवन में सफल होने के लिए प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमतानुसार  प्रयास करता ही है।फिर भी कई लोग अपने प्रयासों में विफल हो जाते हैं। ऐसे में मैं यहाँ पर अपने अनुभव एवं विचाराधारा कुछ ऐसे सूत्र बता रही हूँ ।संभव है कि सफलता मार्ग के लिए कारगर साबित हो सकें।  1. हमेशा खुश रहें दूसरों को भी खुश रखें- जीवन में सफलता हासिल करने के लिए दूसरों को खुश रखना जरूरी होता है। चाणक्य कहते हैं कि जो व्यक्ति खुद भी खुश रहता है और दूसरों को भी खुश रखता है, वह जीवन में जल्दी सफलता हासिल करता है। 2. कार्य पूरे उत्साह और लग्न से करें- कहते हैं कि इंसान को जीवन में सफलता हासिल करने के लिए काम को पूर...

पर्यावरण और हम!

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पर्यावरण का अर्थ है प्रकृति का आवरण- यानि, प्रकृति का हरा-भरा रूप, जहाँ प्रकृति के हर जीव को बराबर का महत्व रखता है-चाहे वह पेड़-पौधे हों, या पशु-पक्षी या फिर मानव!  मगर, मानव ने हर काल में थोड़ा थोड़ा विकास कर, प्रकृति में बाकी जीवों के बजाय अच्छा और सुविधाजनक जीवन जीने की चाह को पूरा किया है! बदलते परिवेश के साथ मनुष्य की ज़रूरत, लालच और अहंकार, सब बढता गया और अब मनुष्य ने विकास का नाम ले कर प्रकृति पर अपना पूर्ण अधिकार करना शुरू कर दिया है, जिसके कारण प्रकृति का अपना संतुलन बिगड़ गया है।  आज, 5 जून को गर्म लू के थपेडे खाते हुए शायद हमे पेडों की ठंडी छ्या आ रही होगी; शायद हर दिन कटते- घटते वृक्षों से होने वाली हानि का आभास हो रहा होगा।  आखिर, यह हमारी प्रगति का परिणाम ही तो है!  इसका एहसास तो होना ही चाहिए! अपने लालच की पूर्ति के लिए हमने हमारे पर्यावरण का इतना शोषण जो किया है!  वैज्ञानिकों के अनेक अनुसंधानों में पर्यावरण की अनदेखी हुई और फिर हर कदम पर, ज़रूरत के नाम पर प्रकृति पर निर्भर रहा और इसी का शोषण भी करता रहा है! गंदगी और प्लास्टिक के अत्याधिक प्रयोग स...

पर्यावरण-संरक्षण में आवश्यक है साझेदारी"

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समाज में रहने वालों की पर्यावरण के प्रति सभी की साझा जिम्मेदारी होती है। जब हम लाभ लेने में कभी पीछे नहीं रहना चाहते तो फिर उसी के प्रति अपने उत्तरदायित्व उठाने में ही क्यों और कैसे पीछे रहते हैं? यह अत्यंत ध्यातव्य और विचारणीय विषय है। सब जानते हैं कि वृक्ष हमारे पर्यावरण सी सर्वोत्तम ईकाई है। केवल उसका रोपण कर तस्वीर खिंचवा लेना पर्याप्त नहीं है ,तो आइए जानते हैं कि क्या और कब करना चाहिए  -:     जुलाई माह पौधारोपण/ वृक्षारोपण की दृष्टि से सर्वोत्तम माना जाता है।सभी स्कूलों,कॉलेजों,संस्थाओं और सार्वजनिक स्थानों पर बड़े जोर शोर से वृक्षारोपण होता दिखाई भी देता है पर उनकी बढ़वार मुश्किल से दस प्रतिशत ही मिलती है।कारण स्पष्ट है - सही प्रकार से देखभाल न होना। अतः पौध लगाने के साथ साथ उनकी समुचित देखभाल परमावश्यक है। आइए इसी विषय में कुछ ख़ास जानकारी प्राप्त करते हैं।  • कौन सी नई पौध लगाने का समय? 1. जुलाई महीने की शुरुआत में गुलदाउदी की कटिंग लगा सकते हैं। इसकी तीन से चार इंच लंबी कटिंग पानी में भिगोकर विशेष रूप से तैयार की गई मिट्‌टी में लगाएं। 2. इसी मौसम में डहेलिया...

पत्रकारिता की बेड़ियां

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वह दिन दूर नहीं जब आम जनता पत्रकारों को पकड़ पकड़ कर पूछेगी।     झूठी खबरें क्यों दिखाते हो? खबर में कितनी सच्चाई है? आजकल पत्रकारिता ऐसी ही हो गई है। मीडिया लिबरल  की अब पोल भी खुल रही है। छ्द्म माहौल बनाने में हमेशा मीडिया आगे रहता है।  इस तरह खबरों को दिखाते हैं कि सच्चाई उसमें होती ही नहीं है। किसी हिंदू ने  कोई गलत काम कर दिया तो उस पर बड़े-बड़े लेख,  हेड लाइन मुख्य पृष्ठ पर आएंगी। और किसी हिंदू के साथ गलत काम हो गया तो उसे मीडिया कवरेज नहीं देगा। हर अपराधिक समाचार को जातीय रंग देता है टाइम्स ऑफ इंडिया  अभी हाल ही में राजस्थान जालौर के एक मंदिर में प्रवेश ना कर देने की एक फेक न्यूज़ छपी और शिकायत के आधार पर राजस्थान सरकार ने मंदिर के पुजारी को गिरफ्तार भी कर लिया। जब जांच में बाद में पता चलता है कि दंपति ने मंदिर में पूजा पाठ कर ली थी ,लेकिन वे गर्भ गृह में नारियल जलाने जा रहे थे, तो पुजारी ने उन्हें बाहर जाकर नारियल जलाने को कहा था। और सत्य सामने आने के बाद भी टाइम्स ऑफ इंडिया या किसी अन्य समाचार समूह ने अपने पाठकों को यह बताने की आव...

राजा राममोहन राय

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"केवल ज्ञान की ज्योति द्वारा ही मानव मन के अंधकार को दूर किया जा सकता है" -राजा राममोहन राय यह कथन राजा राम मोहन राय द्वारा दी गई है। सर्वप्रथम हमें राजा राम मोहन राय द्वारा दी गई ,इस कथन का आशय समझ लेना चाहिए। इस कथन का आशय यह है की सृष्टि के प्रारंभ से लेकर आज तक मनुष्य ने जो प्रगति की है उसका सर्वाधिक श्रेय मनुष्य की ज्ञान चेतना को ही दिया जा सकता है। मनुष्य में ज्ञान चेतना का उदय शिक्षा द्वारा ही होता है! बिना शिक्षा के मनुष्य का जीवन पशु तुल्य होता है। शिक्षा ही अज्ञान रूपी अंधकार से मुक्ति दिलाकर ज्ञान का दिव्य आलोक प्रदान करती है। हमारे भीतर अज्ञान का तमस छाया हुआ है।वह ज्ञान के प्रकाश से ही मिट सकता है। ज्ञान दुनिया का सबसे बड़ा प्रकाशदीप है। जब ज्ञान का दीप जलता है तब भीतर और बाहर दोनों आलोकित हो जाते हैं। अंधकार का साम्राज्य स्वतः समाप्त हो जाता है। ज्ञान के प्रकाश की आवश्यकता केवल भीतर के अंधकार में मोह- मूर्छा को मिटाने के लिए नहीं, अपितु लोभ  और अशक्ति के परिणाम स्वरुप खड़ी हुई पर्यावरण प्रदूषण और अनैतिकता जैसे भारी समस्याओं को सुलझाने के लिए भी जरूरी है।...

आयुर्वेद

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हमारा भारत देश प्राचीन काल से ही औषधियों पर जोर देता रहा हैं..। रामायण काल में भी लक्ष्मण जी के मुर्छित होने पर संजीवनी बुटी का इस्तेमाल किया गया था..। आयुर्वेद और औषधि की खान हैं हमारे देश में..।  नीम .. बबुल .. अश्वगंधा ... हल्दी .. मुल्तानी ..ब्रंगराज..रीठा...आंवला...ना जाने कितनी ही ऐसी जड़ी बुटियां हैं जो हमारे शरीर के लिए  बहुत फायदेमंद हैं..।  प्राचीन काल में हकीम और वैध ही हर बड़ी से बड़ी बिमारी का इलाज इन जड़ी बुटियों से करते आए हैं..।  लेकिन आधुनिक समय में हमने पाश्चात्य संस्कृति को अपना लिया हैं..। हमने हमारे वैधो के महत्व को दरकिनार कर दिया हैं..। हम इन जड़ी बुटियों की महत्वता को भूला चुके हैं..।  आज हम बाहरी अंग्रेजी दवाईयों पर ज्यादा भरोसा करते हैं..। हम इन दवाईयों के आदि हो चुके हैं..। एक दिन दवाई ना ले तो हमारा बी.पी . हाई हो जाता हैं.. शुगर बढ़ जाता है ... । ये दवाइयाँ सिर्फ हमें क्षणिक राहत देते हैं.. जबकि आयुर्वेदिक दवाइयाँ और जड़ी बुटियां बिमारी की जड़ को खत्म करने की क्षमता रखते हैं..। उनका असर थोड़ा धीमी गति से जरूर होता हैं.. पर को...

आयुर्वेद बनाम एलोपैथी

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   आयुर्वेद और एलोपैथी की जंग सदियों पुरानी है,लेकिन कोरोना काल ने इस बहस को और बढ़ा दिया था। लोग एलोपैथी दवा के साथ साथ काढ़ा,इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए हल्दी का दूध,गिलोय,और अदरक का खासा सेवन कर रहे थे। 16 वीं शताब्दी से पहले भारत में आयुर्वेद से इलाज होता था। उस समय वैद्य,आचार्य,हकीम होते थे,जो जड़ी बूटियां पीस कर खिला कर इलाज करते थे। हमारे वेद में 114 प्रकार की बीमारियों का वर्णन है ,ऋग्वेद,युजुर्वेद,में क्रमशः 67,और 82 प्रकार की औषधियों का भी उल्लेख है,जबकि सामवेद में मंत्रों द्वारा बीमारी का निदान दिलाने का उल्लेख है। एलोपैथी आधुनिक ,वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति मानी जाती है ,सर्वप्रथम एलोपैथी शब्द का प्रयोग  होम्योपैथिक के जनक सर हैनीमैन ने किया था।एलोपैथी एक ग्रीक शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ  अलोस का अर्थ अदर मतलब दूसरा , पैथो का अर्थ बीमारी । होम्योपैथी पर भी एलोपैथी हावी रही।  16वीं सदी में पश्चिम भारत के तटीय रास्ते से जब पुर्तगाली व्यापार के लिए आए ,तो वे अपने साथ डॉक्टर भी लेकर आए।अंग्रेजों के आने के बाद धीरे धीरे एलोपैथी दवाइयों और इलाज का चलन बढ...

"आयुर्वेद बनाम ऐलोपैथी"

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चिरकाल से चिकित्सा के क्षेत्र में अनन्य मार्ग देखने में आते रहे हैं जैसे कि-: ऐलोपैथी,आयुर्वेद  यूनानी पद्धति, होम्योपैथिक पद्धति तथा।प्राकृतिक।चिकित्सा पद्धति। जिसमे सबसे प्राचीन आयुर्वेद ही माना जाता है। वेदों,पुराणों और प्राचीन ग्रन्थों में इसी की चर्चा मिलती है।जिसमें जड़ी- बूटियों के माध्यम से ही किसी न किसी तरह इलाज किया जाता है।      यहाँ पर हम बहुप्रचिलित आयुर्वेद बनाम ऐलोपैथी पर चर्चा करने जा रहे हैं।  आयुर्वेद किसी बीमारी की उत्पत्ति का पता लगाता है और फिर इसे रोगी से पूरी तरह से समाप्त कर देता है जबकि एलोपैथी रोगी को रोग के कारकों को समाप्त करके तत्काल राहत देता है।         हम सभी जानते हैं जिस चीज़ में जल्दी होती है आगे चलकर वह मुसीबत बनती है।कहा भी गया है जल्दी का काम मुसीबत की जड़ है ठीक इसी तरह एलोपैथी कम समय में इलाज तो कर देती है लेकिन आगे के लिए यह और रोग पैदा कर देती है। जबकि इसके मुकाबले आयुर्वेद बीमारी का इलाज करने में वक़्त तो लेता है लेकिन बीमारी का इलाज परमानेंट कर देता है। भविष्य में फिर किसी भी रोग की आशंका नही...