'कलम बना ले तो कैसा हो'
कलम की राह बदलने से अच्छा,
तुम्हें ही कलम बना ले तो कैसा हो।
चलो कुछ ख्वाब फिर से देख लें,
राहें कुछ नई चुन लें तो कैसा हो।
दर्द को बना कर वो चेहरे की हंसी,
किसी चेहरे पर सजा लें तो कैसा हो।
तेरी नजरों से घायल हैं जायें कहाँ,
दिल ही में घर बना लें तो कैसा हो।
लेकर आगोश में तुम्हें इक बार फिर,
थोड़ा हम भी इतरा लें तो कैसा हो।
ये होठों की कंपकपी बयाँ कर रही,
तुम्हें अपना ही बना लें तो कैसा हो।
कलम की राह बदलने से अच्छा,
तुम्हें ही कलम बना ले तो कैसा हो।
🙏⚘रंजन लाल ⚘🙏
Comments
Post a Comment