इक हसीना थी, इक दीवाना था।⚘



एक तस्वीर यादों के पन्नों से 
यूँ सामने आई , 
कि दिल की गहराइयों से 
आवाज है आई,
क्या उमर थी, क्या समां, 
क्या जमाना था, 
इक हसीना थी, और इक दीवाना था।

सपने बुनती आँखों में, 
इक नई चमक लिये,
सुर्ख लबों पर बेताब 
इक मुस्कुराहट लिए, 
अपने ही खयालों में 
शर्माती खिलखिलाती,
लगे जैसे किसी का
 दिल में आना जाना था।
क्या उमर थी, क्या समां,
 क्या जमाना था, 
इक हसीना थी, और इक दीवाना था।

हर आहट पर मचलने लगे 
अचानक यूँ ही,
किन खयालों में गिरते 
संभलते रहे यूँ ही, 
अनछुये इश्क की तपिश में
 पिघलते रहे यूँ ही, 
बाहों में खुशियों और 
कदमों में जमाना था। 
क्या उमर थी, क्या समां,
 क्या जमाना था, 
इक हसीना थी, और इक दीवाना था।

इक शरारत सी रहा करती ,
 नजरों में जहाँ, 
आज मैंने फिर से ढूंढा, 
पर ना मिली वहाँ, 
वो शोख़ी,  वो अल्हरपन,
 जाने खो गई कहाँ, 
चंचलता जिसकी पहचान
 मिज़ाज शायराना था।
क्या उमर थी, क्या समां, 
क्या जमाना था, 
इक हसीना थी, और इक दीवाना था।

🙏रंजन लाल 🙏⚘⚘😊😊

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