मेरे हिस्से का खुला आसमान

  खुला आसमान है मेरे पास, 
इच्छाओं के पंख भी 
हैं मेरे पास 
उडना है 
उडकर 
उडती हुई चिडिया के 
पंख को छूना भी है, 
मेरी इच्छा है, यह ।
पर मेरी इच्छा, 
मेरी इच्छा क्यों नहीं बनती ।
कब बनेगी मेरी इच्छा मेरी, 
उस कब और क्यों का इन्तजार,
अब और 
इंतजार नहीं रखना चाहती हूं ।
(जया शर्मा प्रियंवदा )

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