अल्फ़ाज़ कहां से लाऊं,
रोता है दिल दर्द से,सुनाना चाहता हूं तरंग दिल की
पर साज कहां से लाऊं
मिटा दी मेरी हस्ती जमाने ने,और उनकी तोहमतों ने,
अब तुम ही बताओ मै खुशी का पैग़ाम कहां से लाऊं,
बहक गई हो तुम रकीबों की बातों में, तुम पर जाहिर
हो सके ऐसा राज कहां से लाऊं
अब कुछ करने के मन में नहीं हूं, तुमसे मोहब्बत में
हर चीज़ तो हार चुका हूं, अब जीने की चाह कहां से
लाऊं,
हो तुम फिर मेरी, अब शायद ख्वाबों में ही मिलना
लिखा है, जबसे तुम गई हो मेरे शरीर को छोड़कर
बिन रूह के जीने का हौसला मै कहां से लाऊं,
अब राह हीन हूं ख़ुद को खोकर, आगे चलने की
राह कहां से लाऊं......
"कुमार"
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