पार नज़रों के एक सूरज ढलता है
जीने का इच्छुक मगर कौन सहारा है
उसका, ख़ुद में वह कहां संभलता है!
ख़ुद से ख़ुद में जलकर आग्नेय हो चलता है,
रोना आता है पर रोता नहीं ख़ुद में वो कहां
पिघलता है,,
पार नज़रों के एक सूरज ढलता है!
देखती उन्मुक्त गगन को आंखे उसकी,
पाती जहां के पैमाने, ढूंढता है खुद को
उनमें, बरबस,... उसे बस
दलदल ही मिलता है,,
पार नज़रों के एक सूरज ढलता है।
यादें बहुत है ताजा तकदीरों की और उनकी
तदबीरों की,पर बहती उन परछाइयों से भी
वह कहां मिलता है,
पार नज़रों के एक सूरज ढलता है💔
® कुमार
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