तुम्हारी आहट

इंतज़ार होती थी हसीन
जब एक आहट तुम्हारी होती थी
खिलखिला उठती थी वादियां
जब घूंघरु दौड़ बालकोनी
पर आ रुकती थी
इन प्यासी निगाहों को
बस तुम्हारे दीदार से चैन
आ जाता था
रुक जाते थे शब्द और
आंखें भर आता था 
इश्क का तो पता ना था
पर देख लूं तुम्हें तो
बस चैन आ जाता था
कोई रिश्ता ना था
पर मन तो तुम तक जाता था
इजहार ना था
पर सुकून तो था
पाया ही नहीं,
पर खोने का कैसा डर था?
इंतजार होती थी हसीन
क्योंकि उसमें तुम्हारी आहट तो था
बेवजह की बातें,
पर मुझे प्रिये ,क्योंकि उसमें 
तुम्हारी एक शब्द वाले 
आवाज तो था
खुलती थी मेरी खुशीयों
का दरवाजा 
दूर से देखूं तुम्हें ,
वैसा ही सही 
पर दीदार तो था
लंबी ही सही पर
इंतज़ार होती थी हसीन
क्योंकि उसमें तुम्हारी आहट तो था

प्रिया ✍️❤️

Comments

Popular posts from this blog

आखिरी अदालत

आज की मांग

आवारा बादल (भाग 30) प्रयास