'घूरती निगाहेँ '



ये सीमाएँ है मेरी जिसे तय किया है मैंने
शायद आज आखिरी बार कुछ कहाँ है मैंने।

बेपरवाही का आलम रास आता भी नहीं 
इसी गहरी बात को महसूस किया है मैंने।

कदर मुझसे न होगी ये जानकर ही शायद
रिश्तों को अपने से बहुत दूर पाया है मैंने।

टूटे तो कोई न संभाल पायेगा यही जान 
सोच को जमाने से अलग बनाया है मैंने।

ज़मीर को मार  खुशियों को नहीं संवारा 
इन्हीं हाथों से तो सब कुछ गँवाया है मैंने।

रंगीनियाँ चाहत है जमाने भर की यहां पर 
घूरती निगाहों में लगाव कहाँ पाया है मैंने।

मेरी'आस'को जानने वाले भी यही कहते है
इतनी शिद्द्त से कैसे जीवन निभाया है मैंने।
स्वरचित
शैली भागवत'आस'✍️

Comments

Popular posts from this blog

आज की मांग

आखिरी अदालत

सुनहरी यादें