हड़ताल का परिणाम


भैया आप हमेशा मेरी राखी को अपने हाथों से बांधते हो,इस बार मेरे हाथ से राखी बंधवाकर ही घर वापस जाना। क्यों भाभी मैं ठीक कह रही हूं न?"
"ठीक है मेरी प्यारी बहना जैसा तुम चाहती हो वैसा ही होगा लेकिन पहले इस अस्पताल ले तो छुट्टी मिले।"
भाई बहन की बातों को सुनकर भाभी मुस्कराए बिना न रह सकी।
भाई अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान नई दिल्ली में एडमिट थे।
दूसरे दिन मैं अपने भाई के लिए सुपाच्य खाना बनाकर अस्पताल ले गई। भाभी कह रही थी कि अस्पताल में डॉक्टर्स की हड़ताल हो गई है।
केवल एक दो जूनियर डॉक्टर ही आ रहे हैं। भाई को सीने में पाइप लगा था उनके सीने में पानी आ गया था अतः डॉक्टरों ने पानी निकालने के लिये पाइप लगाया था।
हड़ताल खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था अतः सबलोगों ने निर्णय लिया कि भैया को घर ले जाते हैं वहीं पर किसी अच्छे अस्पताल में इलाज कराएंगे।
आज मैं  भैया को विदा करने स्टेशन आई थी। ट्रेन के चलने का समय हो गया था। मैं बहुत उदास थी न जाने क्यों मुझे लग रहा था कि मैं अब भैया को नहीं मिल पाएगी।
मेरी इस साल भाई को अपने हाथों से राखी बांधने की इच्छा अधूरी रह गई थी। 
मैं  बार बार फोन करके भैया का हालचाल पूछती थी। 
माँ ने कहा कि भैया अब ठीक हो रहे हैं। पाइप अब थोड़ा ऊपर करके लगा दिया है।
पिता जी महामृत्युंजय का जाप करवा रहे थे। उन्होंने भैया के हाथ में एक मंत्रसिद्ध अंगूठी पहनाया था कि इससे भैया का कुछ अहित नहीं होगा।
इस तरह कुछ दिन बीते ।
एक दिन अनहोनी हो ही गई। भैया वॉशरूम जा रहे थे ।उस समय अंगूठी उनके हाथ में नहीं थी । उन्होंने ने किसी दुर्घटना ग्रस्त मरीज को देख लिया था और उन्हें अटैक आ गया-----उन्हें एक झटका लगा पाईप ऊपर होने की वजह से निकल गया और------😭😭
पूरे घर में कोहराम मच गया। भाभी की दशा देखकर कलेजा फटता था।  जिसने भी सुना सब स्तब्ध हो गए। हम छोटे भाई बहन एकदम अनाथ जैसे हो गए। माँ-पिताजी की स्थिति को याद करके बहुत तकलीफ होती थी। जीवन एक भयानक मोड़ पर आकर ठहर गया था।

आज भी मैं राखी के त्योहार पर भैया को याद करते हुए सोचती हूँ "आखिर क्यों होती है हड़ताल"?
मुझे लगता है यदि हड़ताल न हुई होती आज भैया हमारे साथ होते।
कहते हैं समय बड़े से बड़े घावों को भी भर देता है। मैं  भी भाई की यादों के साथ जीवन का सफर तय कर रही थी। कोरोना काल मे जब बाहर आना-जाना बंद हो गया तो मैं  लेखन की तरफ उत्सुक हुई और थोड़ा बहुत लिखने लगी। पिछले साल राखी में  अपने छोटे भाई को राखी बांधने मायके गई तो बड़ी भाभी  ने मुझे भाई की कविताओं की डायरी दी। मुझे लग रहा था कि  रक्षाबंधन का इससे अमूल्य तोहफा कुछ हो ही नहीं सकता।
अब  मैं भाई की कविताओं को ऑनलाइन मंचों पर प्रकाशित करवाती हूँ। प्रतिलिपि पर आप उनकी कुछ रचनाएँ कॉलेक्शन ऑफ " P.S.pandey "के नाम  से पढ़ सकते हैं।रश्मिरथी पटल पर भी उनकी।कुछ कविताएँ हैं  रश्मिरथी द्वारा उन्हें सर्वश्रेष्ठ रचनाकार का सम्मान भी मिल चुका है। अब उनकी रचनाएँ दी ग्राम टुडे पर देती हूं।प्रतिलिपी पर तो देती ही हूँ।
इससे मुझे  बहुत सुकून मिलता है और भाई सदा मेरे साथ रहते हैं अपनी कविताओं के रूप में। मैं अपने भाई की कविताओं का एक काव्यसंग्रह (पुस्तक) प्रकाशित करवाना चाहती है। यदि कोई अच्छा प्रकाशक आपकी नज़रों में हो आप ज़रूर बताइयेगा।

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'

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