आन्टी बहनजी


पचमढी की शीतल वादियों में जहाँ कण-कण में शिव बसते हैं।हर चट्टान पर शिव वासुकी नजर आते है।बहुत खूब नज़ारा झरने अप्सरा बिहार का देखने को मिलता है तो दूसरी ओर जटाशंकर में अथाह शान्ति।
मेरे पिताजी का तबादला कैन्टोनमैन्ट बोर्ड के छावनी अधिशासी अधिकारी पद पर।छोटे ही थे हम सब भाई बहन।
एक प्राइमरी स्कूल की टीचर जो कि ईसाई थी वे शुक्लाजी के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने जाने लगी।सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था कि तभी शुक्लाजी और मैडम का झुकाव एक दूसरे के प्रति बढ़ने लगा और एक दिन अचानक उन्होंने शादी कर ली।शान्त वादी में जैसे भूचाल ही आ गया।सभी लोग तरह तरह की बातें करने लगे।शुक्ला जी के घर......एक तूफान!!बच्चे समझ नहीं पा रहे थे .....ये सब क्या हुआ वहीं मिसेस शुक्ला ....अंदर तक हिल गयीं और उनकी मनःस्थिति दिन पर दिन बिगड़ती गयी।धीरे-धीरे लोगों ने उनके रिश्ते को स्वीकार कर लिया अब मिसेज शुक्ला 2आंटी बहिनजी कहलाने लगी।बच्चों से माँ की हालत देखी नहीं जाती थी पर कर भी क्या सकते थे,शायद ईश्वर सहन शक्ति के साथ समझदारी देकर अपनी कृपा दृष्टि रखते हैं।बड़े बेटे ने खूब मन लगाकर पढ़ाई की और बहन को पढ़ाया संभाला।इसी बीच शुक्लाजी के दो बेटे और दो बेटी हो गयी वे अपनी नई पत्नी और बच्चों में व्यस्त हो गये।समय का चक्र चलता गया और दोनो बच्चों ने उच्च शिक्षा प्राप्त की बेटे की सरकारी नौकरी लग गयी वो बड़ी कम्पनी में इन्जीनियर हो गया।समय के साथ बम्बई में बहन और माँ को ले आया।अच्छे डाक्टर से उनका इलाज करवाया।अब वे पूर्णतः स्वस्थ्य हो गयी।उन तीनों का जीवन सुखमय हो गया।बहन की नौकरी और शादी कर दी।बेटे की भी अच्छी लड़की से शादी हो गयी।
वहीं शुक्लाजी की तबियत खराब रहने लगी और कुछ समय बाद वे दुनिया से बिदा हो गये हाँ खबर की गई पर न मिसेज़ शुक्ला और न ही बेटा बेटी पचमढी लौटे।
आंटी बहिनजी अपने बच्चों को पाल रही थी पर कर्म तो साथ साथ चलते हैं,बहरहाल बच्चे कुछ खास न पढ़ पाये।एक बेटा कपड़े की दुकान पर सेल्स मेन है तो दूसरा बेटा किसी की टैक्सी का ड्राइवर।बेटियों की शादी की तो एक के पति को अटैक आया और वह बिस्तर से लग गया।दूसरी बेटी कम उम्र में विधवा हो गयी।
करीब तीस साल बाद उनसे मुलाकात हुई तो बड़ा दुःख हुआ उनकी हालत देख कर।पर मन ने कहा जो दूसरों के घर तबाह करता है कैसे खुश रह सकता है।उस स्त्री की बद्दुआ उन मासूम बच्चों की हाय तो असर दिखानी ही थी जिनसे पति और पिता को छीना।
शायद इसीलिए कहते हैं---हर कर्म का प्रारब्ध लौट कर आता है।भाग्य हमारे अपने कर्म ही होते हैं।
सुन्दर भाव ,सुन्दर कर्म,सफलता की सीढ़ी है।
-----अनिता शर्मा झाँसी
-----मौलिक कथा

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