तिरंगे में लिपट कर आऊंगा मैं



इकलौता तारा हूं मां मैं तेरी इन बूढ़ी आखों का
तेरे जीवन  में  चांद  बनके  चमक  जाऊंगा  मैं

छोड़ दिया है मैंने बचपन गांव की उन गलियों में
सुनहरे  ख़्वाब  शहर  में  पूरे  कर  पाऊंगा  मैं

तेरे दूध का कर्ज़  अब मैं चुका ना सकूं शायद
वतन  की मिट्टी का मेरा हर फ़र्ज़ चुकाऊंगा मैं

बंदूक  लेकर  सरहद  पे  डटा  हूं  सीना  ताने
वतन  परस्ती  की  इबारत  लिख  जाऊंगा मैं

राखी पर आने का तुझसे मेरा वादा था बहना
अब तो बहना तिरंगे में  लिपट  के आऊंगा मैं


भूपेन्द्र चौहान “राज” रतलाम, 

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