नन्हा दीया

  ""माँ देख कैसा बना है मेरा दीया ?"
"बहुत अच्छा बना है बेटे ।"
माँ मैं और बनाऊंगा ।अब तो मुझे भी दीया बनाना आ गया ।" नन्हे दीपू ने चाक घूमाते हुए कहा ।
""हां बेटे जब तक तेरा मन हो बना ।धूप भी खिली हुई है ।जल्द सूख भी जायेंगे । भगवान ने चाहा तो दिवाली पर अच्छी आमदनी हो जाएगी ।" 
आंगन में  कुछ देर के लिये चारपाई पर सुस्ताने  बैठी माँ ने  प्यार से कहा।

माँ बेटे मिल कर दीये और खिलौने बनाते रहे ।दीपू दीये ही बना पाता था ।जब माँ कोई दूसरा काम करती दीपू चाक संभाल लेता ।जब काफी दीयेऔर खिलौने  इकट्ठे हो गये तो माँ ने भट्टी लगाई और दीये और खिलौने पकने रख दिया ।
दो दिन बाद जब  पक कर सब तैयार हो गये तो दीपू ने माँ से कहा ,"माँ तू यहॉं अपनी दुकान लगाना और मैं अपने दीये नुक्कड़ पर सड़क किनारे बेचूंगा ।इससे दो जगह बिक्री हो जायेगी।""

  माँ ने उसकी बात मान कर एक टोकरी में उसके बनाये दीये रखकर उसे भेज दिया और खुद घर के बाहर अपनी दुकान लगा ली ।

सड़क पर बैठा दीपू आने जाने वालों को बड़ी आशा से देखता और कभी आवाज भी लगा देता ,"माता जी !भाई साहब !यह देखो मैने बनाये हैं यह दीये ।बहुत अच्छे हैं ले लो ।" पर सब उसे बच्चा जानकर निकल जाते ।

     तभी एक हमउम्र बालक अपनी माँ के साथ खरीदारी करने बाजार जा रहा था ।उसकी नजर दीपू और उसके दीयों पर पड़ी  वह रुक गया ।उसने अपनी माँ से कहा ," मम्मी ,इसके दीये खरीद लो ।देखो यह मेरी तरह ही तो छोटा है ।"
पर मम्मी बोलीआगे खरीदेंगे ।इसके अच्छे नहीं हैं ।"
बालक ने जिद की ,""आप आगे भी खरीद लेना मुझे इसी से लेने हैं ।"
आखिर उसकी मम्मी को मानना पड़ा ।उन्हें दीये खरीदता देख दो चार और भी ग्राहक आ गये ।उन्होंने भी दीपू से दीये खरीद लिये । 
दीपू के सब दीये जब बिक गये तो वह  पैसे सम्भाल वापस मां के पास आया और  माँ को पैसे देकर बहुत खुश हुआ ।
"देख माँ तेरा दीपू भी अब बड़ा हो गया है ।"माँ ने भी दुलारते हुए उसे सीने से लगा लिया ।

दो जगह दुकान लगाने से अच्छी आमदनी हुई तो माँ बेटे दिवाली की पूजा का सामान और मिठाई खरीद  लाये ।दीपू बहुत खुश था।
दिवाली की रात दीपू ने अपने घर को अच्छी तरह साफ कर  खिलौने वाले रंगों से खूब सजाया । मिठाई ,खील बताशे और पूजा का सामान रखा ।लक्ष्मी गणेश की मूर्ति भी थी ।माँ पूजा शुरू करने ही वाली थी तभी दीपू ने कहा, " जरा ठहर  माँ ,मैं अभी आया ।"
वह घर के एक कोने में गया और जब वापस आया तो उसके हाथ में सुन्दर रंगों से सजी हटरी थी ।
"यह कब लाया दीपू ?" माँ के पूछने पर दीपू बोला यह मैंने बनाई है माँ ।जब तू दूसरे काम करती रहती थी मैं इसे बना कर सजाता रहता ।तू ही तो कहती थी न माँ कि दिवाली पर भगवान राम अयोध्या आये थे ।वह हमारे घर मे कहाँ रुकते तो मैंने उनके लिये यह छोटा सा घर बना दिया ।ऊपर रोशनी के लिए मैंने  एक दीया भी बनाया है ।अच्छा है न माँ!"
   माँ ने उसे गले लगाकर कहा ,"तू भी तो मेरा राम है ।"
"नहीं माँ, मैं तो तेरा दीपू हूँ ।अब दीया जलाओ माँ, भगवान की पूजा शुरू करो ।"

पूजा करने के बाद दीपू ने अपने दोस्तों को भी मिठाई बांटी ।फुलझड़ियाँ जलाईं । खुश खुश घर आकर भोजन किया और पूजा वाली जगह पर बैठ गया
  
राम के स्वागत में दीपू राम के महल में बने दीये में तेल डालता रहा और वह नन्हा दीया रात भर जलता रहा ।

रेनु सिंह
स्वरचित

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