हॉ मैं नारी हूँ।।

बड़े भाग्य से मैंने नारी तन है पाया, 
अलग -अलग रूप लेकर मैंने जीवन को है बचाया।।

कभी वकील तो, 
कभी शिक्षिका बनकर
जीवन को है सवारा।।

 कभी मालिन बनकर,
 तो कभी मॉ बनकर,
 मैंने सृजन का भार उठाया।।

विधाता की मैं रचना अनुपम,
समंदर सा हृदय रखती हूँ,
सब के अवगुणों को अपने 
 भीतर छुपा लेती हूँ।।

पत्नी बनकर सदैव 
पति से दो कदम पीछे ही चलती हूँ,
लडखडाते है कंदम जहा उनके,
मैं आगे बढ़कर सँभाल लेती हूँ,।।

कभी मंत्री बनकर,
उत्तम सलाह देती हूँ,
तो दासी बनकर,
घर सवार हूँ।।

जीवन मे सब आगे बढे ,
मैं सर्वदा यही प्रयत्न करती हूँ,
सब को आगे बढ़ाने में 
मैं खुद पीछे रह जाती हूँ।।

अपनो की तरक्की देखकर मै,
खुद हो क़ामयाब मान लेती हूँ,
हॉ मैं नारी हूँ ये बात मैं गर्व से कहती हूँ।।
सुमेधा शर्व शुक्ला 
    हरियाणा

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