किसान की दुल्हन


लहलहाती ये फसल किसान की
नहीं दिखती दुलहन कहीं से कम।

पीले खिलते है सरसों के ये फूल
लटक रहे जैसे कानों से कर्णफूल।

घूँघट सी हैं उठती गिरती 
जब भी ये गेहूँ की बालियां।

लगता है जैसे बैठी हो घेरकर
दूल्हे की सैकड़ों ही सालियां

लहराते है पवन के झोकों से
मक्के के सुनहले फूल ऐसे।

गोरे मुखड़े से लटक रहे हो
गोरी के घुंघराले बाल जैसे।

हिलती हैं बाजरे की ये
कुछ गदरायी सी बालें ऐसे।

लगता है नवेली दुल्हन ने
दिया हो स्वीकृति मौन जैसे।

मूंग-उड़द की सूखी फलियां
करती है जब भी चन-चन।

आंगन में चलती दुल्हन की
पायल बजी हो छम-छम।

जब पीले-बसंती फूलो से
प्रकृति खुद को सजा रही हो।

लगता है जैसे दुल्हन कोई
अब महावर लगा रही हो।

स्वरचित-सूर्येन्दु मिश्र

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