ग़ज़ल



क़ाफ़िया :- अर 
रदीफ़ :- को चला 
पहले दोनों मिसरो मे क़ाफ़िया और रदीफ़ एक समान यानी जिसे मतला कहते हैं 

बर्बाद ए इश्क लिए आज इक सफर को चला 
आज फिर लौटकर मैं अपने घर को चला

इक आस थी की वो आएंगे पल दो पल के लिए 
यही उम्मीद लिए आज उनके दर को चला

मगर न वो आए न उनकी कोई उम्मीद आयी 
जब उनसे मिलने मैं आज उनके शहर को चला

अब तन्हा हूं मैं अब मेरा यहाँ कोई नही 
न जाने क्यूँ मैं इस अनजान सफर को चला

मैं बहता ही गया उससे दूर तलक "लखनवी" 
जब बेवजह रोकने मैं उस लहर को चला

Comments

Popular posts from this blog

आखिरी अदालत

आज की मांग

आवारा बादल (भाग 30) प्रयास