मांँ !मैं फिर मिलुंगी
मायके में मांँ ने समझाया था
पराए घर जाना है,
संस्कारों की पोटली को
धैर्य की झोली में,
सहेज पर रखो।
मान और मर्यादा को,
आचार और विचारों को,
परवरिश की डोली के,
पर्दे में रखो ।
मैं सदैव नहीं रहूंगी
तुम्हारी परछाई बनकर,
मेरी नसीहतों को
हृदय के ताले में रखो।
तब मांँ की बातें
बकवास लगती थीं,
मांँ तो बस बोल -बोल
कर थकती थी ।
ओ मांँ!काश तू फिर से बोले,
दिल के हर राज़ तू खोले,
वह वक्त न वापस आएगा
इतिहास पुनः दोहराएगा।
जब मैं मां बनकर,
संस्कारों की पोटली ,
फिर से सिलूंगी
मांँ, मै फिर मिलूंगी।
हांँ! जब मैं भी मांँ बनूंगी
परवरिश के मर्म को,
खुद ही समझूंगी
मांँ! मैं फिर मिलूंगी।
मीनू 'सुधा'
स्वरचित
पूर्णतया मौलिक रचना
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