एक टुकड़ा धूप का भाग १२

गतांंक से आगे

सिस्टर मारिया ने संयोगिता को अपने कमरे में जाते देखा, उन्होंने उसे आवाज लगाई लेकिन संयोगिता अपने ही खयालों में ही खोई हुई थी । उसने उनकी आवाज नहीं सुनी और अपने कमरे में आ गई। आज उसे पता नहीं क्यों बहुत थकान लग रही थी । शरीर की थकान तो इस बीमारी के साथ मिलती ही है लेकिन उसकी अंतरात्मा तो बचपन से ही उपेक्षा और दुर्व्यवहार से थक गई थी। संयोगिता अपने बिस्तर पर लेट गई और अपने बचपन में पहुंच गई। दो बूंद आंसू उसकी आंखों के किनारों से ढलक गए।

मां साहेब तो वापस अपनी दुनिया में चली गई थी बिना ये सोचे समझे कि हमारे बिना हमारे नवजात बच्चे कैसे रहेंगे। अब हम दोनों भगवान जी के ही भरोसे थे। भगवान जी हमें जिस हाल में रखेंगे हम उसी हाल में तो रहेंगे ना। लेकिन शायद हम थोड़ा सा गलत थे। मेरे भाई की देखभाल करने के लिए तो हवेली में  बहुत सारे लोग थे। लेकिन हमारी देखभाल करने वाला कोई नहीं था , पिता महाराज हमें बहुत प्यार करते थे लेकिन दादी सा उनको हमारे पास नहीं आने देती। उनका कहना था कि मेरे भाई को उनके लाड़ प्यार की ज्यादा जरूरत है । हम तो लड़की जात है हमें तो बस खाने खेलने से मतलब होना चाहिए। वैसे भी पिता महाराज  मेरे भाई जिसका नाम मानवेंद्र प्रताप सिंह रखा गया था को भी उतना प्यार नहीं करते थे। जब से मां साहेब चली गई थी तब से वो अक्सर घर के बाहर ही अपनी मित्र मंडली के साथ  रहते थे। और देर रात तक हम उनको नहीं देखते थे। दादी सा अक्सर उनको चिल्लाती रहती लेकिन वो अब उनकी बात नहीं सुनते थे।

जब हमें भूख लगती और हम रोना शुरू करते तो दादी सा को बहुत गुस्सा आता था।वो जोर जोर से सबके ऊपर चिल्लाने लगती।

"अरे कहां मर गई सबकी सब? ये छोरी कब से गला फाड़े जा रही है दिन भर टें टें लगाए रहती है लगता है इसका हम टेंटुआ दबा दे। छोटे राजपूत सो रहे हैं अभी उनको रो रो कर जगा देगी छोरी।"

दादी सा कितना झूठ बोलती है, हम तो जल्दी कभी रोते भी नहीं , बस जब भूख बिलकुल  भी बर्दाश्त नहीं होती तभी रोते हैं जबकि हमारा भाई मनु तो दिन भर रोता रहता है  उसे कुछ नहीं कहतीं वो। उसकी रोने की आवाज से ही वो तड़प जाती हैं और बेचारी माला दीदी को डांट लगाने लगती हैं ।

"अरे ओ माला..... कहां मर गई ? छोटे राजपूत  कब से रो रहे है लेकिन थारे कान में जूं ना रेंगी । हराम का पैसा लेवे है के? मारी हवेली में पैसों का झाड़ उगे है के? "

माला दीदी बेचारी  सर झुकाए हुए थर थर कांपती रहती हैं। वो कई बार दादी के गुस्से का शिकार हो चुकी थी। ये बात उन्होंने हमें तब बताई थी जब हम थोड़ा बड़े हो गए थे। मनु के लिए दादी सा बहुत सारे इंतजाम करके रखती थी उसे लोरी सुनाती। झूला झुलाया करती। दिन में कई कई बार मालिश करतीं । नए नए कपड़े पहनाती। पर हम जब  भूख से परेशान होकर रोते तो वो हमें चुप करने के लिए कुछ चटा देती जिसका स्वाद हमें बिलकुल अच्छा नहीं लगता। उससे हमारी भूख तो नहीं मिटती लेकिन हमें नींद बहुत अच्छी आती थी हम सारा सारा दिन सोते रहते।
ना हमें भूख की चिंता रहती ना प्यास की। दादी को हमारा कितना ख्याल था । वो हमारे आराम के लिए कितना परेशान रहती थी ना। एक बार माला दीदी को डरते डरते  हमने दादी से कहते हुए सुना था

"हुकुम , माफी चाहती हूं पर  आप इतनी ज्यादा अफीम इस मासूम बच्ची को मत दिया करें, वरना किसी दिन ये नन्ही सी  बच्ची मर ना जाए।  , भले ही छोरी है तो क्या हुआ?ये भी तो आपका ही खून है। हुकुम! दया करें अपनी पोती पर।"

तब दादी सा ने  मेज पर रखा फूलदान फेंक कर उसे मार दिया था । हे भगवान! माला दीदी का तो सर ही फट गया था और वो बेहोश हो गई थी। तब दादी सा ने डॉक्टर को बुला कर उनकी मरहम पट्टी कराई थी । चार टांके लगे थे उन्हें। दादी सा डर गई थी। तब से वो माला दीदी को ज्यादा कुछ नहीं कहती थी। और माला दीदी को हमारा ध्यान रखने के लिए कह दिया था उन्होंने। माला दीदी हमें दूध पिलाती हमारी सारी देख रेख करती।अब हमारी सेहत थोड़ी सी सुधरने लगी थी । पेट भरा होने की वजह से अब हम बिलकुल नहीं रोते, दिन भर खेलते रहते। दिन प्रतिदिन हम और सुंदर होते जा रहे थे , माला दीदी हमें जब गुलाबी रंग का  रेशमी झबला पहना देती और नजर लगने से बचाने के लिए  माथे पर एक काला टीका लगा देती तो हम बहुत सुंदर लगते थे । दादी सा माला दीदी को मना करती कि इसे काला टीका क्यों लगाती है। ये तो खुद ही राजपूत खानदान के लिए काला टीका बनकर आई है।
निगोडी मरती भी नहीं कि इससे जान छूटे। भले ही रूप रंग लेकर आई है , लेकिन है तो एक छोरी ही ना। ये भी राजपूत छोरा बनकर आती तो हम खुशी के मारे फूले न समाते ।

दादी ने हमें भगवान के पास भेजने के लिए बहुत प्रयास किए  बद्दुआएं दीं ।लेकिन शायद अब भगवान जी हमें पूरी तरह भूल चुके थे। और अपनी दुनिया का रास्ता हमारे लिए बंद कर चुके थे। हमने उनसे कट्टी जो कर ली थी ।
ऐसे ही समय बीतता जा रहा था । बिना किसी खास परवरिश और खानपान के ही हम स्वस्थ और सुंदर थे । हवेली के आंगन में हम जब ठुमक ठुमक कर चलते और माला दीदी हमारे पीछे पीछे हमें पकड़ने के लिए भागती तो हम ताली बजा बजा कर हंसते। हमारी खिलखिलाहट जब दादी के कानों तक पहुंचती तो उनका पारा चढ़ जाता। और अपना पान दान वहीं रखकर छड़ी लेकर हमारे पास आ जाती और एक छड़ी हमको जमा देती । और हम छड़ी की चोट से बिलबिलाकर माला दीदी के आंचल में छुप जाते।

"जब देखो चिड़िया की तरह इधर उधर फुदकती रहती है। एक जगह टिक कर नहीं बैठ सकती क्या छोरी। थारे पांव में पंख लगे हैं क्या ? चल जा कमरे में। छोरी है तू , बाहर ज्यादा मत निकला कर।"

अब हम पांच ही साल के तो थे। कैसे समझते कि छोरियों को बाहर क्यों नहीं निकलना चाहिए।

क्रमशः

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