एक टुकड़ा धूप का १३
पांच साल की बच्ची भले ही कुछ ना समझती हो लेकिन दादी सा को सब पता था कि कि लड़कियों पर क्या क्या बंदिशें लगानी चाहिए। रजवाड़े खत्म हो चुके थे अंग्रेज देश छोड़कर कब का चले गए थे लेकिन दादी सा का रोब आज भी कायम था। मजाल था कि कोई भी गांव वासी बिना हवेली को सिर झुकाए वहां से चला जाता। हवेली अब जर्जर हालत में पहुंच गई थी। हजारों का कर्जा लदा हुआ था लेकिन बिना नौकरों की फ़ौज के अभी भी काम नहीं चलता था। ये बात अलग थी कि अब कई नौकर बेगार पर थे जो केवल दो वक्त की रोटी के लिए हवेली के गुलाम बन गए थे। दादी सा उन पर कठोर शासन करती थी, छोटी सी गलती हो जाने पर नौकर की शामत आ जाती थी। ये सब बड़े हो जाने पर हमें माला दीदी ने बताया था । माला दीदी ने अपनी आंखों से वो खौफनाक दृश्य देखा था । जब भयानक शीत के कारण हरी एक पेड़ की पतली सी डाल उनसे बिना पूछे उठा ले गया था । जब दादी सा को पता चला तो उन्होंने हरी की बेंतो से इतनी पिटाई की कि उसकी पीठ जख्मों से नीली पड़ गई। वो कई दिनों तक कराहता रहा। उसकी बीवी हल्दी चूना लगाती रही। पूरे पंद्रह दिनों तक वो बिस्तर पर पड़ा रहा।
हवेली में एक बहुत पुराने नौकर हैं प्रताप सिंह। जिनकी उम्र 85 साल है उनके बाल सन की तरह सफेद हो गए हैं लेकिन अभी भी वो झुक कर नहीं चलते। राजपूती शान उनके रग रग से छलकती है। लोग कहते हैं कि वो पहले नौकर नहीं थे इसी राजपूत परिवार के सदस्य थे। परंतु उनकी मां इसी परिवार की सेविका थीं जिनके प्रेमपाश में दादा सा के चाचा बंध गए थे।उन्होंने अपने परिवार को बिना बताए उनसे विवाह कर लिया था।जिसका पता चल जाने पर उन्हें इसकी कठोर सजा सुनाई गई थी उन्हें जंगल की ऊसर जमीन देकर खानदान से बहिष्कृत कर दिया गया था।रहने के लिए हवेली के सामने ही एक खंडहर नुमा मकान दे दिया गया था और वो लोग हवेली के सामने ही रहकर किसी प्रकार अपना जीवन यापन करते रहे। प्रताप के पिता ने बहुत कोशिश की कि वो ऊसर जमीन में कुछ पैदा कर सकें।लेकिन उन्हें इसका कोई अनुभव तो था नहीं , इसलिए वो असफल रहे। कभी कभी उनके पूरे परिवार को भूखा रह जाना पड़ता, समय के साथ उनके घर में प्रताप ने जन्म लिया। नन्हें से बच्चे प्रताप को देखकर दोनों पति पत्नी अपना सारा दुख भूल जाते। लेकिन जब उनका बच्चा भूख से रोता और उनके पास उसे खिलाने के लिए कुछ ना होता तो वो दोनों तड़प उठते। कमजोरी की वजह से प्रताप की मां को दूध भी नहीं उतरता था ।प्रताप के पिता काम की तलाश में इधर उधर घूमते लेकिन कोई उन्हें काम पर नहीं रखता। क्योंकि वो राजपूत खानदान से थे हवेली के छोटे मालिक थे । सब उनकी मदद करना चाहते थे लेकिन हवेली वालों के डर के मारे कोई आगे नहीं बढ़ता था ।दिन भर इधर से उधर भूखे प्यासे घूमकर जब शाम को प्रताप के पिता घर आते तो कभी कभी उन्हें कुछ खाने को देने के लिए उनकी पत्नी के पास कुछ ना होता। शर्म की वजह से वो उन्हें हाथ मुंह धोने के लिए पानी देने में भी संकोच करती कि जब हाथ मुंह धोने के बाद उनका पति कुछ खाने के लिए उनकी ओर आशा भरी नजरों से देखेगा तो वह क्या करेगी। प्रताप के पिता एक गिलास पानी पीकर चुपचाप टूटी हुई खाट पर लेट जाते और सोच में डूब जाते ।जब उनकी पत्नी ने अपने पति को निराश अवस्था में देखा तो उन्हें खुद पर घृणा होने लगी। उन्होंने सोचा कि राजपूत की इस हालत की जिम्मेदार वही तो है।ना वो उनके जीवन में आती और ना ही राजपूत घर से बेघर होते। अगर वो यहां से कहीं दूर चली जाए तो हो सकता है कि हवेली वाले इन्हें और प्रताप को हवेली वापस बुला लें। आखिर कुछ भी हो ये हैं तो उन्हीं का खून ,तब प्रताप और इन्हें भूखा तो नहीं रहना पड़ेगा ।ऐसे ही अंतर्द्वंद्व में उलझ कर वो एक दिन रात में सबको सुलाकर जंगल की ओर चली गई और वही अपने जमीन के पास वाली बावड़ी में छलांग लगा दी।सुबह जब प्रताप के पिता जगे तो वह अपनी पत्नी को आवाज़ देने लगे लेकिन उनकी पत्नी तो सदा के लिए खामोश हो गई थी तो कैसे बोलती। प्रताप के पिता पूरे गांव में उन्हें तलाशते रहे जब वो बावड़ी के पास पहुंचे तो उन्होंने अपनी पत्नी की धानी चूनर वहीं बावड़ी के पास पड़ी हुई देखी वो सब समझ गए और एक ठंडी सांस लेकर उसी बावड़ी में छलांग लगा दी । नन्हा सा बच्चा प्रताप अनाथ हो गया। तब हवेली वालों ने प्रताप को अपने खानदान का खून समझकर हवेली बुला लिया। लेकिन उसके साथ वो नौकरों से भी बदतर सलूक करते थे हवेली वालों ने उन्हें परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । छोटे से बच्चे प्रताप को दूध के लिए भी तरसना पड़ता। उनको बचपन से ही यहां नौकर के रूप में रखा गया हैं जब दादी सा का गौना हुआ था तब ये दादी सा को बुलाने गए थे ।दादा सा ने कभी उनको नौकर नहीं समझा । हमेशा उनको अपना हमराज अपना दोस्त समझा। दादा सा अपनी हर अच्छी, खराब बात उनसे बताते थे। ये बात दादी सा को पता नहीं क्यों अच्छी नहीं लगती थी। वो उन्हें कभी पसंद नहीं करती थी। जब संयोगिता यानि मैं थोड़ा और समझदार हुई और दादी सा या पिता महाराज से प्यार ना पाकर प्रताप दादू के साथ बैठने लगी और उनसे कहानियां सुनने लगी तो भी दादी सा को अच्छा नहीं लगा और उन्होंने उसे अपने कमरे में ही रहने को कहा।
अरे छोरी, थारे को अपने खानदान की इज्जत की बिलकुल परवाह ना है। नौकरों के साथ घुस कर बैठती है।जाने का करेगी अपनी जिंदगी में ? अरे हम लोग मालिक है और वो लोग नौकर। उनकी और हमारी क्या बराबरी?चुपचाप से अपने कमरे में बैठकर खेल। बाहर निकली तो टांगे तोड़ दूंगी ।
हमें समझ में नहीं आया कि दादी सा क्यों नाराज हो गईं?......
क्रमशः
लेखिका
संगीता शर्मा "प्रिया"
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