एक टुकड़ा धूप का भाग १७
मिशेल जैसे ही गाड़ी से उतरी उसका पहनावा देखकर संयोगिता को विश्वास नहीं हुआ कि वो मां साहेब की बेटी हैं , मिशेल लगभग उसी की हम उम्र थी लेकिन उसने स्लीव लेस टॉप और मिनी स्कर्ट पहन रखी थी। हाई हील के जूते , कंधे पर लटकते हुए दो बैग। दो बैग दोनों हाथों में लिए , आंखों में ब्लैक गॉगल्स लगाए वो पूरे कॉन्फिडेंस के साथ चली आ रही थी। उसके सिल्की भूरे बाल हवा में उड़ रहे थे। मां साहेब जितनी सादगी पसंद थी मिशेल उतनी ही ज्यादा आधुनिक। दोनों में कहीं कोई मेल नहीं था। मिशेल बिलकुल अंग्रेज लगती थी और मां साहेब इंडियन । मां साहेब क्रिश्चियन तो कहीं से भी नहीं लगती थी । पूरी तरह हिंदुस्तानी संस्कृति में रची बसी उनकी आत्मा प्रभु यीशु को जितना मानती थी उतना ही भगवान राम और मोहम्मद साहब को भी। वो अपने ईसाई फेस्टिवल्स जितने प्रेम से मनाती उतने ही प्रेम और सदभाव से होली दीवाली और ईद भी। उनके आश्रम में धर्म ,जाति, संप्रदाय को आधार मानकर किसी बेसहारा औरत को प्रवेश नहीं मिलता था बल्कि हर दुखी और जरूरतमंद स्त्री उनके आश्रम में रह सकती थी।
मिशेल को भारतीय संस्कृति से नफरत थी । वो अपनी मां की धार्मिक सहिष्णुता से नाराज रहती थी। और केवल ईसाई धर्म को ही मानती थी। भारत में रहते हुए भी वो भारतीयता से कोसों दूर थी। जब तक वो यहां अहमदाबाद में पढ़ती थी तब तक उसकी क्लास मेट सृजन उसकी बेस्ट फ्रेंड थी। वो अक्सर उसे समझाती थी। उसे मोरल वैल्यू की इंपोर्टेंस बताती थी और मिशेल भी तब बहुत ही अच्छी थी वो अपनी मां की हर बात मानती थी। हर धर्म को मानती थी। शालीन कपड़े पहनती थी। और एक संस्कारित विनम्र लड़की के रूप में जानी जाती थी। उसके टीचर्स और फ्रेंड्स उसकी हमेशा तारीफ करते थे। सृजन और मिशेल की दोस्ती पूरे स्कूल में फेमस थी। सृजन वैसे तो इलाहाबाद की रहने वाली थी लेकिन उसके पापा का अहमदाबाद में साड़ियों का व्यापार था इसलिए उसका पूरा परिवार अहमदाबाद में रहता था। वहीं पर उसने बचपन से पढ़ाई की थी। मिशेल और वो हाईस्कूल तक एक साथ एक ही स्कूल में पढ़ते थे। लेकिन मिशेल हाईस्कूल के बाद अपने दादा जी के पास गोवा चली गई थी । वही के एक फेमस कॉन्वेंट स्कूल में वो पढ़ती थी। और वहां के अल्ट्रा मॉडर्न कल्चर और मॉर्डन क्लासमेट्स की सोहबत में रहकर वह भी पूरी तरह मॉर्डन बन चुकी थी। अब वो पहले की तरह विनम्र नहीं थी। बल्कि खुलकर अपनी बात कहती थी और पाश्चात्य सभ्यता को पूरी तरह अपना चुकी थी।
मिशेल के इस परिवर्तन के पीछे भी एक कारण था ,असल में उसके दादा विलियम एक अंग्रेज थे और उसके पिता रिचर्ड भी । जब भारत आजाद हो गया था तो उसके दादा वापस लौटकर नहीं गए ।वो यहीं गोवा में ही बस गए। मिशेल के पापा रिचर्ड ने एक भारतीय महिला से शादी कर ली थी और धर्म परिवर्तन करके उसे क्रिश्चियन बनने पर मजबूर कर दिया था।और मालती सिस्टर मारिया बन गई। मालती को मारिया बनने से कोई परेशानी नहीं हुई क्योंकि उसके लिए यीशु मसीह, भगवान शिव, और मोहम्मद साहब में कोई अंतर नहीं था। उसके लिए ये केवल ईश्वर के विभिन्न रूप थे। वो सभी धर्मों को बराबर सम्मान देती थी। और उनके आदर्शो को लेकर चलती थी।
उसने रिचर्ड से प्रेम किया था इसलिए उसकी खुशी के लिए वो सब कुछ करती थी। लेकिन रिचर्ड तुच्छ मानसिकता का था वो चाहता था कि मालती उर्फ मारिया ईसाई धर्म के अलावा किसी और धर्म को ना माने। इसी बात को लेकर धीरे धीरे उन दोनों में दूरियां बढ़ती चली गई। और मिशेल के इस दुनिया में आते आते रिचर्ड उससे बहुत दूर हो चुका था। मारिया को धीरे धीरे यह अहसास हो रहा था कि रिचर्ड उसके साथ धोखा कर रहा है। अक्सर वो रातों को गायब रहने लगा और जब घर आता तो शराब से बुरी तरह धुत रहता। मारिया अगर विरोध करती तो वो उस पर हाथ उठाने से भी संकोच नहीं करता। एक दिन मारिया को पता चला कि रिचर्ड एक अंग्रेज लड़की को लेकर इंग्लैंड चला गया। मारिया मिशेल के साथ अकेली पड़ गई। रिचर्ड के पापा विलियम ने रिचर्ड के जाने के बाद मारिया को भी घर से निकाल दिया। बहुत मिन्नतें करने के बाद उन्होंने मिशेल को उसके साथ आने दिया वो भी इस शर्त पर कि बड़ी हो जाने के बाद मिशेल उनके पास गोवा में ही रहेगी। लेकिन मारिया को वो किसी कीमत पर नहीं रखना चाहते थे। मारिया मिशेल को लेकर अहमदाबाद अपने मायके आ गई । लेकिन उसके मायके वालों ने भी उसका साथ नहीं दिया और उसे दूसरे धर्म का कहकर अपने घर में घुसने भी नहीं दिया। हारकर मारिया मिशेल को लेकर सिस्टर मार्था के पास चली गई। जो रिचर्ड की दोस्त थीं। सिस्टर मार्था को रिचर्ड के बिहेव के बारे में जानकर बहुत दुख हुआ। उन्होंने मारिया को अपने घर में रख लिया। मिशेल जब एक वर्ष की हुई तब तक मारिया को अहमदाबाद के विधवा आश्रम में नौकरी मिल गई थी और अपनी मेहनत और ईमानदारी के बल पर बहुत जल्द ही उसे आश्रम की संचालिका बना दिया गया।
मिशेल ने अहमदाबाद में ही रहकर हाई स्कूल तक पढ़ाई की इसके बाद उसके दादा ने उसे शर्त के मुताबिक गोवा बुला लिया। जहां उसने आगे की पढ़ाई की।पढ़ाई पूरी करके उसकी जॉब भी वहीं लग गई थी।और वह कभी कभी छुट्टियों में ही अपनी मां के पास आ पाती थी।
लेकिन सृजन ने यहीं अहमदाबाद में ही अपनी पढ़ाई पूरी की और यही पर जॉब करना शुरू कर दिया था। बीच बीच में वो सिस्टर मारिया के आश्रम भी आ जाती थी और उनके साथ समाजसेवा भी करती थी। सृजन मिशेल के बारे में जानकर बहुत दुखी होती थी। मिशेल कभी भी अपनी मां से मिलने आती तो सृजन उससे जरूर मिलने आती लेकिन मिशेल पहले की तरह उससे गर्मजोशी से नहीं मिलती। मिशेल की रूडनेस सृजन को बुरी तरह हर्ट करती। लेकिन वो मिशेल से हर बार मिलने जरूर आती ।
सिस्टर मारिया ने जब सृजन को बताया कि इस बार जन्मदिन के बाद मिशेल भी उनके साथ आएगी तो सृजन को बहुत खुशी हुई। सृजन अगले दिन ही आश्रम जा पहुंची। उसने मिशेल को गले लगाना चाहा तो मिशेल ने हाथ के इशारे से उसे रोक दिया .....
क्रमशः
लेखिका
संगीता शर्मा "प्रिया"
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