बाबुल का आंगन


बाबुल का आंगन जब से छूटा है,
बचपना दिल का भी जैसे टूटा है,
अब बस जिम्मेदारियों का बोझ है,
ना वो प्यार दुलार अब अनूठा है,
बाबुल का आंगन जब से छूटा है।

जब तक उनकी छांव में पली थी,
मर्जी मानों बस मेरी ही चली थी,
कभी बगिया थी मैं भी किसी की,
अब बांध दिया जैसे कोई खूंटा है।
बाबुल का आंगन जबसे छूटा है।

चाह कर भी अब मैं आ नहीं पाती,
फर्ज़ अपना कभी निभा नहीं पाती,
बेचैन से दोनो ओर बैठे हम तुम,
जैसे किसी ने अपना कुछ लूटा है।
जबसे बाबुल का आंगन छूटा है।

पूजा पीहू

Comments

Popular posts from this blog

आज की मांग

आखिरी अदालत

सुनहरी यादें