मजदूर

पेट की आग बुझाने की खातिर हम बहुत मजबूर हैं
हमारा भी आत्मसम्मान है साहब ! क्या हुआ जो हम मजदूर हैं ।

हमारी फटी साड़ी से झांकते यौवन पर फब्तियां कसने वालों
पीठ पर बंधे बच्चे की चीख पर हंसने वालो
यह न भूलो कि हमारी मेहनत से कितने शहर मशहूर हैं
हमारा भी आत्मसम्मान है साहब! क्या हुआ जो हम मजदूर हैं!

दो कौड़ी फेंककर हमारी आबरू खरीदना चाहते हो
करके गंदे इशारे हमारे सब्र को थाहते  हो
जैसी होती हैं तुम्हारे महल में रानियां हम भी अपनी झोपड़ी का गुरूर हैं
हमारा भी आत्मसम्मान है साहब क्या हुआ जो हम मजदूर हैं व।

तुम जला देते हो झोपड़िया अपनी रोटी सेकने के लिए
हम तुम्हारे महल में काम करके अपना चूल्हा जलाते हैं
लगाए गए हैं कुछ इल्जाम हम पर, कैसे बताएं कि हम बेकसूर हैं
हमारा भी आत्मसम्मान है साहब! क्या हुआ जो हम मजदूर हैं।

स्वरचित : पिंकी मिश्रा
भागलपुर बिहार ।

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