हमारी प्रेम कहानी
कालेज के दिनों में मैंने,
देखे अनेक रंगीन सपने।
प्रेम कहानियों की किताबें,
रट डाली मैंने तब कितने!
शेक्सपियर का रोमियो बनूं,
फिर जूलियट को मैं रिझाऊँ।
बसानियो बन वेनिस घूमूँ,
अपनी पोर्शिया को रिझाऊँ।।
पढ़ा था उपन्यास प्रेम -भरी,
गुलशन नंदा की कई मैंने ।
प्रेम बाजपेई की कितनी,
पढ़ी उपन्यास प्रेम कथा की ।।
कालिदास की मेघदूत भी,
कुमारसंभव भी पढी़ मैंने।
समझा स्वयं को यक्ष सा प्रेमी,
देखा हसीन सपने कितने!
वक्त बीतता ही चला गया,
अपने सपनों में मैं खोया।
प्रेम कहानी पढ़ते रहता,
नायक स्वयं को समझा करता।।
आया एक दिन रिश्ता मेरा,
हो गया पक्का यंत्रवत- सा ही।
धर्मपत्नी का तबसे गले पड़ना,
घोंट दी गला अरमानों की।।
देखा मैं हसीन से सपने,
चाहा इक सपनों की रानी।
पत्नी तोड़ दी सपने अपने,
यही हमारी प्रेम कहानी।।
-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती
" दिवाकर "
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