बागों में बहार है

बागों में बहार है,
रंगबिरंगे फूल खिले हैं,
फूलों पर तितली मंडराते,
भौंरे मधु का पान हैं करते,
लोग सभी खुशियों से झूमे।।

तरह तरह के वृक्ष खड़े हैं,
वृक्षों पर फल फूल लदे हैं,
पंछी कलरव करते रहते,
डाल डाल पर बसेरा करते,
दूर गगन में उड़ उड़  कर फिर वे,
अपने नीड़ को फिर कर आते।।

कहीं  प्रफुल्लित बच्चों की ,
किलकारियां हैं गूंज रही।
कहीं प्रेमी युगल अपने ही,
सपनों की दुनियां मैंं है खोये,
दूर तरु की छाया में बैठे,
वृद्धजन अपनी बातों में खोये,
एक अकेला व्यथित हृदय कहीं,
बहारों में मन की शांति को खोजे।।

बागों में बहार ऐसी है,
जो सबको खुशियाँ देती है,
सबके दुख को हर लेती है,
और खुशियां दे जाती है।
पर इस बाग के बहार के पीछे,
हाथ है किसका कोई सोचा है?
सींचकर अपने श्रम के पसीने से,
वह निर्विकार बागवान बैठा है!


यह ब्रह्मांड इक बगिया ही है,
अनगिनत तारे,ग्रह , फूल हैं इसके,
आकाशगंगा अनगिनत सरिता इसके।
यह अद्भुत बाग बनाया किसने?
देख जिसे हम अंगुली दबाते दातों तले,
कौन है जो इसका पालन करता ?
कौन है बागवान इस बाग का,
जो निर्विकार छुपकर बैठा है?

बागों की बहार सब देखते,
पर बागवान को बिरले ही पूछे,
बागवान यदि न होता तो,
बागों में बहार क्या होते?
ब्रह्मांड यह अनगिनत रहस्यों भरा है,
पर इसका सूत्रधार कौन है?
सृष्टि को हम सब देखते, 
पर सृष्टिकर्ता को कौन जानते?
बाग की बहार सब देखते, 
पर बागवान को अनदेखा करते।।
-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर"
(यह मेरी मौलिक रचना है। सर्वाधिकार सुरक्षित।)

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