रुकने का मतलब नहीं
रुकना भी कहीं जीवन है?
क्या समय रुका है कभी,
नदिया रुकी या धरती ही?
कभी ग्रहों का चाल रुका है?
सूरज का उगना भी रुका है?
आना बसंत का कभी रुका है?
पंछी का कलरव कभी रुका है?
दिन- रात का चक्र चलता रहता,
ऋतुओं का यह चक्र सदा चलता।
नव पल्लव का सृजन तब होता,
नवजीवन का संचार है होता।।
जल रुकता तो काई हो जाती,
पल रुकता तो प्रलय हो जाती।
जीवन रुकता तो मृत्यु हो जाती,
पथिक रुके मंजिल न रह जाती।।
चलते रहना ही जीवन है,
रुकना तो जीवन का अंत है।
तुम रुकोगे जग आगे बढ़ जायेगा,
फिर वह तेरा ही उपहास करेगा।।
तुम रुकोगे तो जग रुकेगी नहीं,
तेरे लिये भी कोई रुकेगा नहीं।
सृष्टि में अब तक कुछ रुका नहीं,
फिर तेरे रुकने का मतलब नहीं।।
-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती " दिवाकर"
(यह मेरी मौलिक रचना है। सर्वाधिकार सुरक्षित।)
Comments
Post a Comment