अपना एक घर हो


अपना एक घर हो कहीं भी,
दूर प्रकृति की गोद में  बसा।
वन, पर्वत हों, बहती हो नदी,
पंछी के  कलरव  गूँजे जहां।।

मेरी इक  छोटी कुटिया हो,
जहां शांति और संतोष रहे।
वहाँ एक  छोटी  बगिया हो,
साथ जीवन संगिनि हो मेरे ।।

चाह नहीं मुझको महलों की,
गज अश्व धेनु  या सेवकों की।
चाह  नहीं  है धन -दौलत की,
या   झूठे  शानोशौकत  की ।।

मेरी   कुटिया  में  बना   रहे,
सुख शांति और चैन सदा ही।
वहाँ  अशांति  या चिंता न रहे,
न  आशा आकांक्षा  ही  कोई ।।


मेरी  कुटिया  प्रभु  ऐसा   हो
स्वच्छंद सदा पवमान वहाँ हो।
पुष्प  सुगंधित  उपवन भी  हो, 
उन  फूलों  से  प्रभु  पूजन हो ।।

प्रभु तुम मुझको इतना कर दे,
तेरी   सदा   हमें   याद   रहे।
जितने  भी  हो स्थान तुम्हारे,
अपना  घर  एक  रहे   उनमें।।


-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती   "दिवाकर " 

Comments

Popular posts from this blog

आज की मांग

आखिरी अदालत

सुनहरी यादें