मेरा गाँव


एक अरसा बीत गया अपने गाँव की, गलियों से पहचान किए
छूट गई सभी पगडंडियाँ पीछे कहीं,मेरे बचपन के निशान लिए

 नक्शा जन्मभूमि का आज भी,ज़हन में ताज़ा है मेरे 
डरता हूँ कहीं छूट न जाए यादें पीछे,वो शक्ल पुराने मकान की लिए

 छोड़ आया था अपनी धरोहर पीछे , महज़ नौकरी के एवज में
क़ामयाबी की राह में निकल पड़ा था, बस आँखों में शहरी होने के अरमान लिए

 आज उन्हीं राहों में दम घुटता है,शहर के शोरगुल में दिल अकेला रोता है 
फिर भी फिर रहा हूँ आज भी यहाँ, हथेली पर अपनी जान लिए

 गाँव की चाँदनी रात में,सूखी रोटी भी मन को बहुत भाती थी
 फिर भी भटक रहा हूँ यहाँ,शहरी होने का अभिमान लिए

 लौट जाना चाहता हूँ गाँव के, उसी पोखर तालाब के सुकून में वापस 
 जहाँ निपट जाता था वक्त भी,कभी मासूम-सी मुस्कान लिए

 गुज़ार दूँगा जल्द ही,सेवानिवृत्ति तक के चंद व्यस्त लम्हें भी यहाँ 
फिर लौट जाऊँगा अपने गाँव में, अपने बचपन की वहीं पहचान लिए 

दूर निकल आया था बहुत,अपनी तरक्की की चाह में
फिर चलूँगा उसी ज़मी पर,छोड़ा था जिसे मैंने कागज़ी दौलत के सुकून के लिए

आज सुकून नहीं रहा ज़िन्दगी में , याद आता है बहुत अपना गाँव
मेरा गाँव जो पल में अपना हो जाता, किसी भी अनजान के लिए

 स्वरचित एवं मौलिक
सुनीता कुमारी अहरी

Comments

Popular posts from this blog

आज की मांग

आखिरी अदालत

सुनहरी यादें