आज भी आँखों से तेरी ज़ुल्फ़ का साया नहीं जाता

आज भी आँखों से तिरी ज़ुल्फ़ का साया नहीं जाता 
 गुज़रा जो ज़माना मोहब्बत का लौटाया नहीं जाता

 तेरी यादों को सीने से लगाए बैठे हैं शाम-ओ-सहर
 धड़कने सदा देती है पर बेमतलब यूँ जिया नहीं जाता 

जुदा हो गए ज़िन्दगी के सबसे हसीन मोड़ पर हम 
ज़ख्म ऐसा हुआ कि अब मरहम लगाया नहीं जाता 

 मुलाकातें और भी बहुत हुई कई हसीन चेहरों से 
 लाख कोशिशों की अब दिल लगाया नहीं जाता

एक दौर गुज़र गया दिल-ए-आशिक हुए हमको 
मजबूर हूँ  वो पहली-सा इश्क़ भुलाया नहीं जाता
 स्वरचित एवं मौलिक 
सुनीता कुमारी अहरी
नई दिल्ली

Comments

Popular posts from this blog

आज की मांग

आखिरी अदालत

सुनहरी यादें