डाकिया डाक लाया




वह दौर था जब लिखना-लिखाना
पढ़ना-पढ़ाना बहुत खास होता था

डाकिया आया शब्द कानों में पड़ते ही
बदला हर घर का माहौल होता था

ख़ाकी वर्दी में साइकिल पर शहर-शहर 
डाकिए और डाक का भी अपना ज़माना होता था

अपनों से होती थी अनूठी मुलाकात अकसर 
चिट्ठियों से सबका हाल पलभर में बताना होता था

लंबे इंतजार के बाद आती थी चिट्ठियाँ 
उनसे ही सबको अजब-सा इश्क या याराना होता था 

डाकिए के थैले में सिमटे रहते थे कई जज़्बात
जहाँ गम और ख़ुशी का भी अपना ही तराना होता था

भले ही किश्तों में मिलती थी ख़बरें 
फिर भी उनका इंतज़ार कभी न पुराना होता था

पल में होती थी सैर सरहदों की
लिखावटों से ही कभी यूँ सफ़र सुहाना होता था

 कभी रंगीन कभी बेरंग होती थी दुनिया
बताती हर हाल हरेक अक्षर का अपना एक फ़साना होता था

बदलतें इस दौर में अब कैसे लौटा लाए वो पुरानी यादें 
कि अब अपने ही शहर में  मुश्किल डाकिया देखना-दिखाना  होता है

Comments

Popular posts from this blog

आज की मांग

आखिरी अदालत

सुनहरी यादें