खट्टी-मीठी यादें



दर्द  में भी होंठ मुस्कुरा देते हैं,
ज़हन में छा जाता है जब
मीठी सी तेरी यादों का मौसम; 
वो यादें नदी किनारे के झूलों की
वो यादें मेरे बालों में तेरे हाथ से सजे 
उन गजरों के फूलों की, 
वो कांच की चूड़ियाँ भी कितनी अनमोल थीं
कि इनके आगे सस्ते लगते हैं ये भारी से कंगन!
वो रेत के घरोंदे महलों से कम न थे,
कि सब सुनहरे सपने उनमें रहते थे,
यह महल भी सूने से लगते हैं, कि
टुकडों में बंट गए है दीवारें ऊंची होने से,
अपने अपने दायरों सिमट गए हैं हम!
तुम थे तो दुनिया अपनी सी लगती थी,
अब तो खुद के भी न रहे हम! 
हर ख्वाहिश भी अधूरी लगती है,
तेरी बेरुखी का ख्याल आए तो
भीग जाते हैं खुशी में भी नयन! 
तू ही तो था,सब रंगों से सजा था
जिससे जीवन, 
एक दीप था जिसका उजियारा
कर देता था हर अमावस भी रोशन।
सब कुछ सूना सूना है अब
बुझे से नयनों के दीपक
सूखे अधर, फीकी मुस्कानें, 
रंग सारे उड़े-उड़े से, 
खुशबुएँ उब हवाओं में बहती नहीं
कि सिमट गई हैं अत्तार में,
कोंपल अब फूटती नहीं कि 
एहसासों का पतझड़ है,
सावन भी नित बरसता है, 
भर जाता है मन में सीलन, 
जितना खाली हो रहा मन, 
बढती जा रही है घुटन,
कैसे समझाऊँ, इक तेरे जाने से, 
जाने कितना कुछ बदल गया है
खट्टा सा हो गया मीठा सा प्यार का मौसम!

शालिनी अग्रवाल 
जलंधर

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