पिता से तो मैं हूं ना
पिता से ही सीखा जीवन के सांचे मे ढलना...
पिता से ही सीखा जीवन क़ी सच्चाई से गुजरना.
पहले तो लगते कठोर सभी शब्द पिता के
बाद मे होता सच्चा ज्ञान,
पिता ने ही सिखाया समाज मे विचरना,
पिता शब्द मे छिपा गूढ रहस्य.
ना समझ पाया जिसे कोई आज तक..
पिता का योगदान जीवन मे कोई ना समझ पाया है..
जिसने चाहा समझना वह और ही उलझता गया है..
पिता जैसे गुफा मे छिपा ज्ञान है..
पिता से तो धड़कन का अभिमान है.
पिता से ही तो जीवन मे एक पहचान है..
पिता को समर्पित मेरा यह नाम है..
नहीं लगाया मैंने पति का नाम...
"ज्योतिका ऋतु प्रकाश " मे आता प्रकाश तो..
मेरे पिता का ही नाम है..
Comments
Post a Comment