परतें
एक बार चलो, फिर से अजनबी बनकर देखे !
किये वादे और कस्मों को बदल कर देखे!!
अब न उम्मीद रखो तुम, किसी अपनेपन की!
चलो अपनो के लिए, फिर से लुटाकर देखें!!
चंद सिक्के ही वजह बन गयी, सैलाब आने की!
अगर वो तलब थी, तो बुझ गयी, उसको बचाने में!!
गया वो वक्त जो दे गया था, दाग मलमल पर!
जो रूठे है, अब नही जरूरत है, मनाने की!!
न आऐगा कोई भी वक्त, वो गर्दिश के तारो का!
है "किरणें अम्बर तक फैली, बचा न कुछ गंवाने का!!
चलो अब बांध ले मुट्ठी, फिर न फिसले तकदीरें!
समंदर बह गया सारा, रहा न कुछ रूलाने को!!
हम वो पाषाण है, जो अब किसी मौसम से न डरते!
कोई आंधी हो तूफां हो, गर आऐ मिटाने को!!
रीमा महेंद्र ठाकुर वरिष्ठ लेखिका,
सहित्य संपादक"
रानापुर झाबुआ मध्यप्रदेश भारत"
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