वो खिलाड़ी है


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वो खिलाड़ी है,खेलते रहते है,
मैं दर्शक हूँ,देखता रहता हूँ,
अटूट संबंध है दोनो का,
एक दूजे के बिना,दोनो अधूरे है,
वो हर दाव पेंच में माहिर है,
मैं उनके दाव पेंच के अंदाज पर फिदा हूँ,
वो चाल चलते है,मैं जिज्ञासु बनता हूँ,
वो मात देते है,मैं खुश हूँ जाता हूँ,
उनके इस हुनर पा फिदा रहता हूँ,
मैं दर्शक हूँ,देखता रहता हूँ।
न जाने कितने दर्शक,
मेरी तरह ही,खेल में मशगूल है,
खेलते तो कुछ ही, 
बाकी दर्शक बन,नशे में चूर है,
जब तक समझ आता है,
काफी वक्त बीत चुका रहता है।
वो खिलाड़ी है..................
         (सुशील कुमार पांडेय)

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