सपनो का घर
याद आती है मुझे, मेरी मां के घर की,
बीता था बचपन जिसमें, उस गुजरे सफर की,
लगता था मुझको,वो सपनो से भी सुंदर
वो मेरी मां का घर, मुझे लगता था मंदिर
सोचा ना था दिन ये,कभी बदल जाएंगे--
छूटेगा घर मां का, रिश्ते सब छूट जाएंगे--
बचपन की वो यादें, संग साथी सहेलियां--
छूट गए सब मेरे, लगती है अब पहेलियां,
वापस नहीं लौट कर,वो गुजरे पल आते हैं,
सच ही कहावत है रिश्ते सब बदल जाते हैं,
जी लो ये लम्हे जो पास अपने हैं,
बदलाव एक सच्चाई है,बन जाते सपने हैं,
जी लो उन लम्हों को जो आसपास है,
बदलेंगे एक दिन वो भी, जो अपने खास है,
बदलाव तो प्रकृति का नियम है दोस्तों--
जो आज है वह कल नहीं, यह सच है दोस्तों,
प्यार में वह ताकत है, मुट्ठी में बांध लो--
इधर- उधर ना भटको, खुश रहो खुशियों को थाम लो।
संगीता वर्मा✍✍
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